Friday, September 11, 2009

शाही ठाठ की प्रतीक हवेलियां बनी कमाई का जरिया

राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र अपनी अन्य विशेषताओं के साथ जिस लिए जाना जाता है वह है वहां की भव्य नक्काशी के साथ बनी हवेलियां। कॉलेज में पढ़ाई के दिनों में मैंने इन प्राचीन धरोहरों को करीब से देखा है, लेकिन हाल ही में वहां जाने का मौका मिला तो मैंने देखा कि पुराने जमाने में शाही ठाठ और अमीरी का प्रतीक रही ये हवेलियां तेजी से कमाई का जरिया बन रही हैं। दुनिया भर से पर्यटक इन हवेलियों को निहारने आते हैं और अब तो वे ठहरते भी इन हवेलियों में ही हैं। दरअसल अब इन हवेलियों को भव्य होटलों का रूप दे दिया गया है। पुराने तौर तरीके का शाही स्वागत और परंपरागत खाना न केवल विदेशी बल्कि स्वदेशी पर्यटकों को भी खूब लुभाता है। नए निर्माण के साथ कोई भी भव्य होटल बना लिया जाए, लेकिन इन परंपरागत होटलों की अपनी अलग पहचान है। यहां की हवेलियां मुख्य रूप से दो वर्र्गों से संबंधित रही हैं। पूर्व रजवाड़े और सामंत और दूसरा मारवाड़ी वर्ग जो भले ही आज देश और दुनिया भर में प्रमुख कारोबारी समुदाय के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनकी असली पहचान यहीं से जुड़ी है। पूर्व शाही घरानों ने मौजूदा होटल व्यवसाइयों के साथ मिलकर हिस्सेदारी में इन हवेलियों को होटल का रूप देकर 'चोखी कमाईÓ का जरिया बना लिया है। वहीं, देशभर में आज दिखने वाले कॉरपोरेट जगत के कई दिग्गजों के पूर्वजों की हवेलियां भी इस क्षेत्र में हैं। गोयनका, पोद्दार, सिंघानिया, रुइया, बिरला आदि सरनेम वाले बिजनेस घरानों की जड़ें इन हवेलियों से जुड़ी हैं। इनके पुरखों की हवेलियां अब भी शेखावाटी क्षेत्र में मौजूद हैं। ये लोग देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों में बड़े कारोबारी बन गए हैं, लेकिन ये जब भी लौटते हैं तो अपने पुरखों की इन हवेलियों को जरूर निहारकर जाते हैं। पुराने जमाने की यह विरासत आज के युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार देने का जरिया बन गई है, क्योंकि यहां का पर्यटन उद्योग महलों, किलों और हवेलियों पर ही टिका है।

Thursday, September 10, 2009

सबके पास केवल 24 घंटे ही होते हैं

किसी सज्जन ने सही ही कहा है 'समय का कोई विकल्प नहीं होताÓ। यदि ऐसा होता तो लोग समय को बचाकर रखते और उसकी जगह पैसे आदि खर्च करते रहते। नौकरी करते समय मुझे भी ऐसा लगता है कि मेरे पास बहुत सारे ऐसे काम हैं जिनको करने के लिए मेरे पास समय ही नहीं है। लेकिन क्या इसमें सच्चाई है, मुझे लगता है नहीं। क्या मैं महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, बिल क्लिंटन, नंदन नीलेकणी, बिल गेट्स आदि से भी ज्यादा व्यस्त हूं। इन सभी ने अपने व्यस्त जीवन में से समय निकालकर कुछ ने लोगों और देश का नेतृत्व किया और कुछ महत्वपूर्ण पदों पर अब भी काम कर रहे हैं। इन सबके बीच इन्होंने ऐसी महत्वपूर्ण किताबें लिखीं जिनको पढ़कर आज सभी कुछ न कुछ सीख रहे हैं। ऐसे में यह तो साफ है कि किसी के पास भी एक दिन में 24 घंटे ही होते हैं, इसी समय में किसी ने ऐसा काम किया कि दुनिया याद करती है। यानी मुझे भी समय से समय निकालना होगा कि कम से कम अपने ब्लॉग को तो रोज अपडेट कर सकूं।

सकारात्मक सोच के साथ ही जमीनी हकीकत को भी रखें याद

जिंदगी में सभी कुछ पाने के लिए सकारात्मक सोच और दूर दृष्टि को जरूरी मानने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। जबकि यह सच्चाई नहीं है कि सिर्फ सकारात्मक सोच और दूर दृष्टि ही जिंदगी में सफलता दिला सकती है। जमीनी सच्चाई को समझना और उसके अनुरूप कदम उठाना भी उतना ही जरूरी है, जितना सकारात्मक दृष्टिकोण और दूर दृष्टि।कई लोग नेपोलियन हिल की किताब 'थिंक एंड ग्रो रिचÓ का जिक्र करना नहीं भूलते, जिसमें उन्होंने सफलता के गुर बताए थे। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि हिल अंतिम दिनों में दिवालिया हो गए थे। यदि उनका दोस्त डब्ल्यू क्लेमेंट स्टोन समय रहते उन्हें मदद नहीं देते तो हिल की बातें लोगों तक नहीं पहुंच सकती थी। यह स्टोन के जमीन से जुड़े कई निर्णय थे जो हिल के लिए लाभदायक सिद्ध हुए।स्टोन ही था जो हिल की बातों पर काफी विश्वास करता था पर यह भी कहता था कि सिर्फ सोचना ही काफी नहीं है। इसे करना भी उतना ही जरूरी होता है। हिल ने इस विचार को जन्म दिया पर स्टोन ने इसे कार्य रूप दिया।अमीर बनने के लिए लिखी गई ज्यादातर रचनाओं में दूर दृष्टि के साथ उसे अपनाना भी जरूरी बताया गया है। पिछले कुछ समय से कार्य रूप में अपनाने की बात कम होती जा रही है और सकारात्मक सोच और दूर दृष्टि इसका स्थान लेते जा रहे हैं।अमीर बनने के लिए एक और तथ्य ऐसा है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। सिर्फ सकारात्मक सोच और दूर दृष्टि ही इसके लिए जरूरी नहीं हैं। कई अमीर अपनी जलन की भावना, नाखुश रहने की प्रवृत्ति और प्रतिस्पद्र्धा की भावना के चलते ही अमीर बनते हैं। यह सब इसलिए संभव है कि यह सिर्फ सोचते नहीं हैं, उसे करके दिखाने में भी विश्वास रखते हैं।यहां तथ्य यह है कि सिर्फ हम कोई एक काम नहीं करते हैं। दोनों कार्य करके ही हम सफलता पाते हैं। खुद को एक कार्य के प्रति केंद्रित करके अपनी सारी ऊर्जा दूर की सोच विकसित करने में लगाई जाती है। आप एक खुशहाल इंसान के रूप में खुद को विकसित कर सकते हैं यदि आप 'मेटेरियलÓ के अलावा खुद को 'स्प्रिरिचुअलÓ पर भी केंद्रित कर सके।अंत में इतना जरूर कहा जा सकता है कि सिर्फ अच्छे आइडिया ही दिमाग में आना काफी नहीं है। इसे कार्य रूप में परिणित करना भी जरूरी होता है।

क्या बात कही है जी

अंग्रेजी शिक्षा की बुनियादी ताकत की वजह से भारत बीपीओ उद्योग का सिरमौर बन गया है। इसकी संभावनाएं अनंत है। - किरण कार्णिक