Wednesday, July 21, 2010

डाटा रिजेक्ट होने से रुक सकता है लोन

बैंक कई बार सही तरीके से डाटा अपलोड नहीं कर पाते हैं और यह रद्द हो जाता है। ऐसे में सिबिल के पास सही-सही जानकारी नहीं जाती है और क्रेडिट रिपोर्ट अपडेट नहीं हो पाती है, जो लोन रद्द होने का कारण बनती है।एक कंस्ट्रक्शन फर्म में नौकरी कर रहा समीर अपने मकान की मरम्मत के लिए लोन लेना चाहता था। लेकिन उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि प्राइवेट सेक्टर के दो बड़े बैंकों ने लोन संबंधी उसका आवेदन खारिज कर दिया। एक बैंक से उसने जब उसने इसका कारण जानना चाहा तो उसे बताया गया कि आपने पिछले पांच महीनों से अपने क्रेडिट कार्ड का बिल नहीं भरा है। उसको बड़ा झटका लगा। आर्थिक परेशानी की वजह से दो महीने वह बिल नहीं जमा कर पाया था, लेकिन तीसरे महीने उसने पूरा बकाया चुका दिया था।5-6 फीसदी आकंड़े रिजेक्टसमीर की परेशानी का कारण यह हो सकता है कि तीसरे महीने जब उसने पूरा भुगतान किया तब आईटी सिस्टम ने इसे खारिज कर दिया हो। बैंक और नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (एनबीएफसी) ने बात करने पर बताया कि बैंक और एनबीएफसी जो लोन देते हैं उसका रिकॉर्ड रखने वाले क्रेडिट ब्यूरो में जब वे आंकड़े अपडेट करते हैं तो कुछ आंकड़े रिजेक्ट हो जाते हैं। एक अधिकारी ने बताया कि जरूरी फाइल में कुछ कमी होने की वजह से कुछ डाटा अपलोड नहीं हो पाता है। बाद में इसे सही करके फिर से भेजा जाता है तब यह एक महीने बाद अपलोड होता है। कई बार डाटा रिजेक्ट होने का प्रतिशत 5-6 फीसदी तक भी होता है।सरकारी बैंकों का रिकॉर्ड खराबएक अन्य अधिकारी ने बताया कि डाटा रिजेक्ट होने का प्रतिशत अलग-अलग बैंकों में कम या ज्यादा हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में यह ज्यादा होता है। उनका कहना है कि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की डाटा क्वालिटी अच्छी होती है और करीब 80 फीसदी डाटा अपलोड हो जाता है। सार्वजनिक बैंकों की कई शाखाओं में तो ज्यादा बिजनेस होने से केवल 30-40 फीसदी डाटा ही अपलोड हो पाता है और बाकी रद्द हो जाता है। उनका कहना है कि आंकड़ों की गुणवत्ता वैश्विक मानकों के मुताबिक नहीं होने से इतने ज्यादा आंकड़े रद्द हो जाते हैं। ऐसे में जानकारों का कहना है कि लोन के भुगतान की सही तस्वीर क्रेडिट ब्यूरो इसी कारण से नहीं दिखा पाता है।बिना वजह डिफाल्टरअभय काउंसलिंग सेंटर के मुख्य काउंसलर वीएन कुलकर्णी ने बताया कि बहुत सारे ऐसे मामले होते हैं जिनमें बिना कारण के भी किसी को डिफाल्टर दिखा दिया जाता है। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिन्हें बैंक तो कहते हैं कि उनका भुगतान पूरा है, लेकिन रिकवरी एजेंट उन्हें भुगतान के लिए कहते रहते हैं। डाटा रिजेक्ट होना भी इसका प्रमुख कारण है। आखिर डाटा रिजेक्ट ही क्यों होता है। एक कार फाइनेंस कंपनी के प्रमुख ने बताया कि यदि डाटा सही रूप में नहीं भरा जाता है तो वह अपलोड नहीं हो पाता है। उन्होंने बताया कि बहुत सारी ऐसी बातें होती हैं जो ब्यूरो को रिपोर्ट भेजने से पहले भरनी अनिवार्य होती हैं और तकनीकी कारणों से यह रद्द हो जाती है।बैंकों की लापरवाही है कारणक्रेडिट इंफोर्मेशन ब्यूरो ऑफ इंडिया लिमिटेड (सिबिल) के मैनेजिंग डायरेक्टर अरुण ठुकराल के मुताबिक अनिवार्य कॉलम बैंकों की ओर से नहीं भरे जाने की वजह से यदि डाटा रिजेक्ट हो जाता है तो क्रेडिट रिकॉर्ड अपलोड नहीं हो पाता है। उसमें सिबिल भी कुछ नहीं कर पाता है। जन्म तिथि, टेलीफोन नंबर, पैन नंबर, पासपोर्ट नंबर आदि ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें डाटा में भरना जरूरी होता है। कभी-कभी रिकॉर्ड आपस में मिल भी जाते हैं। ऐसे में यदि बैंक जब डाटा अपलोड की परेशानी खुद हल नहीं कर पाते हैं तो सिबिल की टीम भी भेजी जाती है। उन्होंने कहा कि डाटा रिजेक्शन का प्रतिशत अलग-अलग बैंकों का अलग-अलग होता है। सिबिल 95 फीसदी आंकड़े मासिक आधार पर अपडेट करता है, जबकि बाकी साप्ताहिक आधार पर भी बदले जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति की जन्म तिथि आदि पूरी जानकारी नहीं मुहैया कराई जाती तब तक वे रिपोर्ट नहीं दे पाते हैं। यही कारण होता है कि जिस व्यक्ति पर किसी तरह का बकाया नहीं होता है, उसे भी गलती से कई बार डिफाल्टर की सूची में डाल दिया जाता है।

Monday, June 28, 2010

मेडिक्लेम पॉलिसी लेते समय डॉक्यूमेंट को पढऩा न भूलें

मेडिक्लेम पॉलिसी लेकर आप निश्चिंत हो जाते हैं। लेकिन सोचिए आपका अनुभव तब कैसा रहेगा जब अस्पताल में भर्ती होने पर आपकी बीमा कंपनी होने वाले खर्च की भरपाई करने से इनकार कर दे। ऐसी शिकायतें आए दिन सामने आती हैं कि बीमा कंपनी ने या तो मेडिक्लेम की आधी-अधूरी राशि ही दी या उस बीमारी को पॉलिसी से बाहर बताकर किसी तरह का खर्च देने से ही इनकार कर दिया। इसलिए यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि जो मेडिक्लेम पॉलिसी आपने ली है वह किन-किन बीमारियों को कवर करती है और किन परिस्थियों में वह खर्च उठाने से कंपनी इनकार कर सकती है। किन परिस्थितियों में क्लेम नहींसबसे पहले तो यह जानने की जरूरत है कि कुछ बीमारियों या दुर्घटनाओं को स्थायी या अस्थाई रूप से मेडिक्लेम पॉलिसियों से बाहर रखा जाता है। जैसे युद्ध, हमले, विदेशी शत्रुता में किया गया आणविक हमला, रेडियोएक्टिव हमले आदि में होने वाली बीमारियों आदि के इलाज का खर्च देने से कंपनियां इनकार कर सकती हैं। इसके अलावा प्रेग्नेंसी और बच्चे के जन्म पर होने वाले खर्च को भी ज्यादातर कंपनियां लिस्ट में शामिल नहीं रखती हैं, हालांकि कुछ बीमा कंपनियां कॉरपोरेट मेडिक्लेम पॉलिसी में मैटरनिटी पर होने वाले खर्च का भुगतान भी करती हैं। इसके अलावा एचआईवी-एड्स, शराब, ड्रग्स आदि के कारण होने वाले वाला खर्च भी कंपनियां नहीं उठाती हैं। आंख और कान के इलाज पर उपकरणों का खर्च और दांतों से संबंधित बीमारियां भी आमतौर पर लिस्ट से बाहर रहती हैं। किसी भी खतरनाक खेल के दौरान घायल होने पर, आनुवंशिक बीमारी, मानसिक बीमारी का इलाज,जन्मजात बीमारी के इलाज आदि का खर्च भी कंपनियां नहीं उठाती हैं। हालांकि प्रीमियम के हिसाब से भी इनक्लूजन और एक्सक्लूजन कंपनियां तय करती हैं। बीमा एवं वित्तीय मामलों के सलाहकार नवनीत धवन का कहना है कि पूरा मेडिक्लेम नहीं मिलने का कारण पॉलिसी धारकों में जानकारी का अभाव भी होता है। लिमिटेशंस के आधार पर ही रूम रेंट, आईसीयू आदि का खर्च तय होता है। जैसे यदि एक लाख रुपये के मेडिक्लेम पर 1,000 रुपये का रूम रेंट ही मिलता है इससे ज्यादा होने पर कंपनी बाकी बिल पास नहीं करेगी। कैसे-कैसे एक्सक्लूजंसएक्सक्लूजन आमतौर पर तीन प्रकार के होते हैं। स्थाई-जिन बीमारियों को कभी मेडिक्लेम पॉलिसी में शामिल नहीं किया जाता है। अस्थार्ई- जिन बीमारियों को पॉलिसी के पहले कुछ सालों तक शामिल नहीं किया जाता है और लिमिटेड-ऐसी बीमारियां जिनको पॉलिसी में शामिल तो किया जाता है, लेकिन उन पर होने वाले खर्च का पूरा भुगतान बीमा कंपनियां नहंी करती हैं बल्कि एक निश्चित रकम का भुगतान ही करती हैं। आए दिन मिलने वाली शिकायतों से लगता है कि मेडिक्लेम पॉलिसी लेने वाले व्यक्ति इस बात को जानने में शायद कम तवज्जो देते हैं कि किन परिस्थितियों में कंपनी उनको मेडिक्लेम का भुगतान करने से मना कर सकती हैं। बीमा मामलों के जानकार और सलाहकार हर्ष रूंगटा का कहना है कि पॉलिसी लेने से पहले एक्सक्लूजन और इनक्लूजन को ध्यान से पढऩा चाहिए। इसके अलावा लिमिटेशंस को भी ध्यान में रखें। ऐसा करने पर इस तरह की परेशानियों से बचा जा सकता है। डॉक्यूमेंट पढऩे में थोड़ा समय देंऐसा देखा जाता है कि लोग मेडिक्लेम पॉलिसी लेकर ही निश्चिंत हो जाते हैं। यह बात केवल मेडिक्लेम पॉलिसी पर ही लागू नहीं होती बल्कि किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट पर लागू होती है। आप पैसे खर्च कर रहे हैं तो आपको प्रोडक्ट से संबंधित सभी शर्तें और उसमें शामिल सुविधाओं को जानने पर पर्याप्त समय देना चाहिए। मेडिक्लेम पर तो खास ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि यदि जरूरत पडऩे पर कंपनी इलाज का पैसा देने से इनकार कर दे तो आपके लिए वह पॉलिसी बेकार है और आप आर्थिक परेशानी में फंस सकते हैं। ऐसे में मेडिक्लेम पॉलिसी लेते समय यह जानने की जरूर कोशिश करें कि उसमें किन बीमारियों को शामिल किया गया है और किनका खर्च कंपनी नहीं देगी। इसके अलावा बीमा कंपनियों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे पॉलिसी धारकों को इसके बारे में स्पष्ट और पूरी जानकारी दे।

Sunday, June 27, 2010

न्यू पेंशन स्कीम में निवेश अब और फायदेमंद

सरकार ने न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार कोशिश की है। यहां तक कि आम बजट में यह भी घोषणा की गई कि एनपीएस में नया अकाउंट खुलवाने पर सरकार तीन साल तक एक-एक हजार रुपये का योगदान देगी। फिर भी उत्साहजनक परिणाम नहीं मिलते देख सरकार ने अब नए डायरेक्ट टैक्स कोड (डीटीसी) में टैक्स छूट के जरिए इसे और आकर्षक बनाने की कोशिश की है। रिटायरमेंट के लिए सबसे बेहतरयदि डीटीसी का संशोधित डिस्कशन पेपर मंजूर हो जाता है तो एक मई 2009 से सभी नागरिकों के लिए शुरू की गई इस स्कीम में निवेश और फायदेमंद होगा। रिटायरमेंट के लिए पैसा जुटाने के लिए एनपीएस सबसे अच्छा निवेश हो सकता है। डिस्कशन पेपर में एनपीएस को टैक्स की ईईई (एग्जंप्ट-एग्जंप्ट-एग्जंप्ट) श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब यह हुआ कि इस स्कीम में निवेश, उससे मिलने वाले रिटर्न और मैच्योरिटी पर मिलने वाली पूरी पूंजी किसी पर भी कोई टैक्स नहीं देना होगा। फिलहाल एनपीएस में निवेश ईईटी (एग्जंप्ट-एग्जंप्ट-टैक्स) की श्रेणी में आता है यानी इसमें निवेश और निवेश की अवधि के दौरान मिलने वाले रिटर्न पर तो टैक्स नहीं देना होता, लेकिन मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगता है। ऐसे में टैक्स बचत वाली अन्य स्कीमों जो ईईई श्रेणी में आती हैं के मुकाबले एनपीएस टिक नहीं पा रही थी। लेकिन यह स्थिति जल्द ही बदल सकती है। पीएफ, पीपीएफ के साथ ही एनपीएस को भी ईईई श्रेणी में रखने का प्रस्ताव है। एनपीएस को पेंशन फंड रेगुलेटरी अथॉरिटी (पीएफआरडी) देखरेख में रही खा गया है। शुद्ध लाइफ इंश्योरेंस प्रोडक्ट और वार्षिक योजनाओं को भी ईईई श्रेणी में रखा गया है। एनपीएस में किसी तरह का टैक्स नहींएनपीएस एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसमें 18 से 55 साल का कोई भी व्यक्ति कम से कम 500 रुपये साल में चार बार या 6,000 रुपये सालाना निवेश कर सकता है। एनपीएस में निवेश के लिए परमानेंट रिटायरमेंट अकाउंट नंबर (पीआरएएन) की जरूरत होती है और यह पीपीएफ की तरह ही कुछ चुनिंदा बैंकों की शाखाओं और डाकघरों में खोला जा सकता है। एनपीएस की खास बात यह है कि इसमें निवेशकों का कुछ पैसा अच्छे रिटर्न के लिए शेयर मार्केट में भी लगाया जाता है जैसा एम्प्लाइज प्रोविडेंड फंड (ईपीएफ) या पब्लिक प्रोविडेंड फंड (पीपीएफ) में नहीं किया जाता है। इक्विटी बाजार में निवेश करने वाले अन्य प्रोडक्ट्स जैसे टैक्स सेविंग म्यूचुअल फंड्स और यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) को अब ईईटी श्रेणी में रखा गया है यानी उनकी मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगेा। इससे लोगों का आकर्षण एनपीएस की तरफ बढ़ेगा। हालांकि अभी टैक्स सिस्टम को अंतिम रूप दिया जाना है। यूलिप के मौजूदा निवेशकों पर असर नहींशुद्ध रूप से लाइफ इंश्योरेंस वाले प्रोडक्ट्स में मैच्योरिटी पर टैक्स छूट जारी रहेगी। आरएसएम अस्ट्यूट कंसल्टिंग के डायरेक्टर सुरेश सुराणा ने कहा कि नए सिस्टम में यूलिप को ईईटी के दायरे में लाया गया है। ऐसे में जारी होने वाले नए यूलिप पर टैक्स लगेगा। एनपीएस म्यूचुअल फंड्स और यूलिप के मुकाबले च्यादा फायदेमंद हो सकता है। लेकिन इससे यूलिप या टैक्स सेविंग म्यूचुअल फंड्स में पहले ही निवेश शुरू कर चुके लोगों को परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह नए टैक्स कोड के लागू होने के बाद किए जाने वाले निवेश पर लागू होगी। नए टैक्स कोड के अगले वित्त वर्ष से लागू होने की उम्मीद है। फंड मैनेजमेंट चार्ज नाम मात्रएनपीएस में एक फायदा यह भी है कि इसमें निवेश शुल्क आदि की कटौती नाम मात्र करीब 0.0009 फीसदी है। बाजार में उपलब्ध सभी प्रोडक्ट की तुलना में इसमें निवेश पर फंड मैनेजमेंट चार्ज सबसे कम है। यदि कोई 30 साल का व्यक्ति एनपीएस में 10,000 रुपये हर तिमाही निवेश करता है और अगले 30 साल तक निवेश करता रहता है और औसत 10 फीसदी सालाना रिटर्न मिलता है तो 30 साल बाद उसे करीब 70 लाख रुपये मिलेंगे। बिल्कुल इतना ही निवेश यदि यदि यूलिप में किया जाता है तो 30 साल बाद करीब 55.6 लाख रुपये मिलेंगे। इसमें 12.4 लाख रुपये का जो अंतर है वह मात्र एक फीसदी फंड मैनेजमेंट चार्ज का है। पूरा निवेश कोई कटौती नहींयही नहीं, यदि यूलिप को टैक्स के दायरे में लाया जाता है और कोई व्यक्ति अधिकतम टैक्स के स्लैब में आता है तो 55.6 लाख रुपये पर 30 फीसदी की दर से उसे 16.6 लाख रुपये प्लान की मैच्योरिटी पर टैक्स के रूप में देना होगा, यानी उसे 38 से 39 लाख रुपये ही मिलेंगे। ऐसे में उसे एनपीएस के मुकाबले करीब 30 लाख रुपये कम मिलेंगे। हालांकि फिलहाल यूलिप में एंट्री लोड खत्म करने के बाद कुछ राहत निवेशकों को मिली है फिर भी फंड मैनेजमेंट चार्ज तो काफी च्यादा हैं। ऐसे में नया टैक्स सिस्टम लागू होने के बाद यूलिप में निवेश घट सकता है, जबकि एनपीएस की ओर निवेशकों का रुख च्यादा हो सकता है। हालांकि यह जरूरत है कि यूलिप में निवेशकों की पूंजी काफी ज्यादा शेयर बाजार में रहती है और इससे एनपीएस के मुकाबले ज्यादा रिटर्न मिल सकता है। लेकिन जहां तक सवाल रिस्क का है तो एनपीएस में यूलिप के मुकाबले रिस्क बहुत कम होगा।

छोटी बचत-बड़ा फायदा

कहा जाता है कि हमारे देश में वित्तीय साक्षरता यानी वित्तीय योजनाओं की जानकारी काफी कम है। ज्यादातर भारतीय युवाओं खासकर कॉलेज में पढऩे वालों और बेरोजगार युवकों में बचत की प्रवृत्ति बहुत कम होती है, जबकि खर्च करने के मामले में वे बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते। नौकरीपेशा लोगों में भी स्थिति कुछ अच्छी नहीं है। नौकरी लगने के पहले कुछ सालों में वे मौज मस्ती के मूड में होते हैं और बचत करने से परहेज करते हैं। जबकि उन्हें इस बात को समझना चाहिए कि शादी के बाद बचत करना उतना आसान नहीं होता जितना शादी के पहले और नौकरी के पहले कुछ सालों में होता है। उन्हें यही लगता है कि अभी इसकी जरूरत क्या है या फिर इतनी कमाई नहीं हो रही है कि वित्तीय योजना बनाई जा सके। जबकि सच्चाई यही है कि थोड़ी कमाई में थोड़ी बचत की आदत भी डाली जाए तो बाद में यह बचत काफी मदद कर सकती है।वित्तीय योजना बनाने का मतलब यह नहीं है कि एक बार में ज्यादा धन का निवेश किया जाए या फिर कुछ महीनों या कुछ साल के लिए योजना बनाई जाए। कम राशि के निवेश से लंबी अवधि के लिए आसानी से योजना बनाई जा सकती है जिस पर बढिय़ा रिटर्न मिल सकता है। युवा निवेशकों के पास दूसरे निवेशकों की तुलना में निवेश करने का वर्ष ज्यादा होता है। इस वजह से उनके निवेश पर लंबी अवधि में रिटर्न मिलने की दर भी ज्यादा होती है। इसके अलावा वे ज्यादा उम्र के निवेशकों की अपेक्षा ज्यादा जोखिम उठा सकते हैं। मान लें कि कॉलेज जाने वाला आम युवा हर महीने कम से कम 500 रुपये खर्च करता है। अब अगर इसकी गणना करें तो पता चल जाएगा कि पूरी पढ़ाई के दौरान उनका कुल खर्च कितना हुआ। अगर इतनी ही राशि हर महीने बचाई जाए और उसे 30 वर्षों तक निवेश किया जाए जिस पर 12 फीसदी की दर से रिटर्न मिल रहा हो तो आपके पास 30 वर्ष बाद लाखों रुपये का बैलेंस होगा। भारत में युवाओं की तादाद बाकी दूसरे उम्र के लोगों की तुलना में ज्यादा है। पिछले कुछ सालों में भारतीय अर्थव्यस्था में जबर्दस्त उछाल देखने को मिला है। इसकी वजह से लोगों के पास अतिरिक्त धन जमा हुआ है। भविष्य की जिंदगी को ध्यान में रख कर युवा आसानी से वित्तीय योजना अपना सकते हैं। मगर दिक्कत यह है कि ज्यादातर युवा इसकी योजना नहीं बनाते हैं। साथ ही जिन युवाओं की अच्छी खासी कमाई है वे भी बिना योजना के निवेश करते रहते हैं। जबकि उनके लिए बेहतर यही है कि किसी एक साधन में निवेश करने की बजाय अलग-अलग साधनों में निवेश करें। इनमें इक्विटी, डेट, रियल एस्टेट, सोना या फिर फिक्स्ड डिपॉजिट और मासिक बचत योजना कुछ भी हो सकता है। उदाहरण के लिए 23 वर्ष का कोई युवा 60 वर्ष तक हर महीने 2,000 रुपये की बचत करता है और उस पर उसे 15 फीसदी सालाना की दर से रिटर्न मिलता है तो उसके पास 60 वर्ष बाद 3,96,06,204 रुपये की पूंजी होगी। इस लिहाज से अगर उसकी तनख्वाह में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं भी होती है या फिर वह इससे ज्यादा का निवेश नहीं भी करता है तो भी उसे रिटायरमेंट के बाद ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इतनी कम राशि के निवेश से ही उसकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत होगी। कहने का मतलब यही है कि कम राशि को भी अगर कम उम्र से ही व्यवस्थित और योजनाबद्ध तरीके से निवेश किया जाए तो उससे बड़ी पूंजी बनाई जा सकती है। वित्तीय योजना बनाते समय युवा निवेशकों को सबसे पहले उन एसेट को चुनना चाहिए जिनमें वे निवेश कर सकते हैं। एसेट चुनने के बाद उनके उत्पादों को चुन कर निवेश की कर सकते हैं शुरुआत।

Tuesday, May 25, 2010

बुजुर्गों को अब रिवर्स मोर्गेज लोन से ज्यादा सहारा

घर गिरवी रखने के बदले सीनियर सिटीजंस को नियमित मासिक आय की सुविधा देने वाली रिवर्स मोर्गेज स्कीम में अब ज्यादा मासिक आय मिल सकती है। पहले जितनी मासिक आय इस स्कीम में मिलती थी, उससे करीब तीन गुना अब मिल पाएगी। इसका श्रेय स्टार यूनियन दाइची लाइफ इंश्योरेंस को जाता है जिसने रिवर्स मोर्गेज लोन देने वाले बैंकों को एक सुरक्षा चक्र मुहैया करा दिया है। इसके चलते वे सीनियर सिटीजंस ज्यादा मासिक आय दे पाएंगे। क्या है रिवर्स मोर्गेज स्कीम रिवर्स मोर्गेज स्कीम के तहत जिस सीनियर सिटीजन का अपना घर है वह उसे बैंक के पास गिरवी रखकर एक निश्चित राशि हर महीने हासिल कर सकता है, यही नहीं वह उस घर में रह भी सकता है। इसमें लोन की अवधि के दौरान उसे किसी तरह का ब्याज भी नहीं चुकाना होता है। लोन की राशि ब्याज सहित लोन लेने वाले व्यक्ति और उसकी पत्नी या पति की मृत्यु के बाद घर को बेचकर बैंक वसूल लेता है। उम्र के आधार पर लोन की गणनारिवर्स मोर्गेज लोन की स्कीम के लिए दिशा निर्देश तय करने वाले नेशनल हाउसिंग बोर्ड में असिस्टेंट जनरल मैनेजर पीआर जयशंकर ने कहा कि पहले के रिवर्स मोर्गेज प्रोडक्ट में सीनियर सिटीजंस के लिए भुगतान की गणना 20 साल की निश्चित अवधि के आधार पर की जाती थी। इसमें ब्याज भी जोड़ा जाता था। सीनियर सिटीजंस को दी जाने वाली मासिक रकम भी कम थी। अब एक इंश्योरेंस कंपनी बीमांकिक गणना कर रही है। इसमें किसी देश के खास आयु वर्ग की आगे की संभावित जिंदगी के आधार पर गणना की जाती है, जिसमें सीनियर सिटीजंस के लिए मासिक आय तीन गुना तक हो गई है। नया प्रॉडक्ट कुछ अलग है और काफी आसान है। उम्र के साथ बढ़ती जाएगी मासिक आयऐसे में यदि किसी सीनियर सिटीजन के घर की आज बाजार भाव पर कीमत 50 लाख रुपये है तो वह इसका 75 फीसदी यानी 37.5 लाख रुपये लोन मासिक किस्तों के रूप में ले सकता है। अब दाइची ने जो इंश्योरेंस कवर मुहैया करवाया है इससे बैंक उसी प्रॉपर्टी की ज्यादा कीमत आंककर ज्यादा मासिक दे सकेंगे। जो सीनियर सिटीजन 60 साल की उम्र में पहले 10 से 18 हजार रुपये मासिक ही हासिल कर पाता। इसमें वह तय करता है कि या तो उसकी संतान लोन चुका देगी या फिर बैंक प्रॉपर्टी को बेचकर लोन वसूल लेगा। इसमें वह अब 33 हजार रुपये तक मासिक हासिल कर सकेगा। उम्र के साथ-साथ लोन से मासिक आय भी बढ़ती चली जाएगी यानी उसे 60 की उम्र के बजाय 75 की उम्र में ज्यादा मासिक रकम मिलेगी। एक साथ भी ले सकते हैं 25 फीसदी लोनसेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पहले ही स्टार यूनियन दाइची से समझौता कर चुका है। होम लोन देने वाला एक अन्य बैंक जिसने सबसे पहले रिवर्स मोर्गेज लोन दिया था, दाइची से इस तरह का समझौता करने की तैयारी कर रहा है। दाइची से इस तरह के समझौते के तहत सीनियर सिटीजंस अन्य स्रोतों से आय होने के कारण लोन चुका भी सकते हैं और कुछ मासिक आय हासिल भी करते रह सकते हैं। कोई तात्कालिक जरूरत होने पर सीनियर सिटीजन इसमें कुल लोन का 25 फीसदी एक साथ भी ले सकता है। जयशंकर ने कहा कि दुनिया में यह अपनी तरह का पहला प्रोडक्ट है। अमेरिका में रिवर्स मोर्गेज स्कीम काफी लंबे समय से चल रही है, फिर भी रिवर्स मार्गेज लोन को कवर मुहैया कराने वाला कोई प्रोडक्ट वहां नहीं है। अमेरिका का डिपार्टमेंट ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट ने भी इस प्रोडक्ट में काफी रुचि दिखाई है। टीना अंबानी संचालित हारमनी फॉर सिल्वर्स फाउंडेशन और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने रिवर्स मोर्गेज लोन के बारे में ज्यादा जानकारी चाहने वालों के लिए हेल्पलाइन भी शुरू की है। उनसे भी इस बारे में ज्यादा जानकारी हासिल की जा सकती है।

Thursday, May 6, 2010

फाइनेंशियल प्लानिंग: थोड़े में भी जरूरतें पूरी

फिलहाल रवि की उम्र ३२ साल है और वह 60 साल की उम्र में रिटायर होना चाहता है। उसकी दो बेटियां हैं वह संयुक्त परिवार में रहता है इसलिए माता-पिता की जिम्मेदारी भी उस पर है। वह एक बड़ा घर और कार भी खरीदना चाहता है। यही नहीं वह अपनी दोनों बेटियों को अच्छी उच्च शिक्षा भी देना चाहता है और रिटायर होने तक उनकी शादी के लिए पैसा भी जुटाना है। हालांकि अभी वह अच्छी नौकरी करता है और सालाना 11.50 लाख रुपये कमाता है। वेतन में सालाना 20 फीसदी बढ़ोतरी होती रहे तो वह सभी जरूरतें पूरी करने के बाद सालाना 3.5 लाख रुपये बचा सकता है। इसके लिए उसने फाइनेंशियल प्लानिंग के बारे में सोचा। प्लान के मुताबिक उसे बताया गया कि अगले 28 साल में उसे अपने सभी लक्ष्य पूरे करने के लिए 9.5 करोड़ रुपये की जरूरत होगी तो वह अवाक रह गया। उसका तात्कालिक जवाब था कि यदि वह अगले 28 साल की पूरी सैलरी भी जोड़े तो 9.5 करोड़ रुपये नहीं बनते हैं। लेकिन जब उसे बताया गया कि यदि वह 3.20 लाख रुपये सालाना निवेश करे और सालाना इसमें 10 फीसदी बढ़ोतरी करता रहे तो वह इतनी रकम आसानी से हासिल कर लेगा। रवि अचंभित था क्योंकि उसने पहले यह सोचा ही नहीं था कि नियमित निवेश कर एक बड़ी रकम जुटाई जा सकती है और उसका मौजूदा जीवन स्तर भी बरकरार रहेगा। यह रकम वह अपने सभी मौजूदा जरूरी खर्च पूरे करते हुए जुटा सकता है।निवेश की उचित रणनीति जरूरीइसलिए सबसे जरूरी है कि आप एक अच्छा इन्वेस्टमेंट प्लानर चुनें जो आपको उचित निवेश रणनीति बता सके। फाइनेंशियल प्लानिंग आपके सामने इस बात की तस्वीर साफ कर देती है कि आप फिलहाल कहां हैं और भविष्य में कहां पहुंचना चाहते हैं। भारत में पर्सनल फाइनेंशियल प्लानिंग तुलनात्मक रूप से नया कॉन्सेप्ट है। जो लोग फाइनेंशियल प्लानिंग के बारे में जानते हैं वे भी पूरी प्रक्रिया को लेकर उलझन में रहते हैं, ऐसे में वे भी फाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर अनिच्छुक ही दिखते हैं। सलाहकार भी जिम्मेदारइस स्थिति के लिए फाइनेंशियल सर्विसेज इंडस्ट्री भी जिम्मेदार है। ज्यादातर मामलों में फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स बेचने के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग का दुरुपयोग किया जाता है। बीमा एजेंट, म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर, स्टॉक ब्रोकर या लोन मुहैया कराने वाले जो अपने को फाइनेंशियल प्लानर कहते हैं ये सब फाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर काफी उलझन पैदा करते हैं। पर्सनल फाइनेंशियल प्लानिंग की विस्तृत प्रक्रिया के बारे में कुछ तथ्य इस उलझन को दूर करने में अच्छी मदद कर सकते हैं।अच्छा फाइनेंशियल प्लानर जरूरीएक मान्यता प्राप्त फाइनेंशियल प्लानर जो विशेषज्ञ और अच्छी तरह से प्रशिक्षित है जरूरी वित्तीय आंकड़ों का मूल्यांकन कर आपकी मौजूदा वित्तीय स्थिति के बारे में ठीक से बता पाएगा। वह आपके वित्तीय और निजी लक्ष्य तय करने में मदद करेगा। वह आपकी वित्तीय समस्याओं को भी पकड़ पाएगा जो आपके वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनने में रोड़ा बन सकती हैं, साथ ही आपको वैकल्पिक समाधान भी बता सकेगा। समय-समय पर आपकी वित्तीय योजना का मूल्यांकन और उसमें बदलाव भी वह करने को कहेगा ताकि निर्धारित वित्तीय लक्ष्य हासिल किए जा सकें। आपकी वित्तीय स्थिति का साल में एक बार पुनर्मूल्यांकन होना बहुत जरूरी है। फाइनेंशियल प्लानर आपके लिए आपके लिए फाइनेंशियल हेल्थ डॉक्टर है जिससे समय-समय पर पर्सनल फाइनेंस के बारे में जांच करवाते रहना जरूरी है। आपके लक्ष्यों में कार, घर या प्रॉपर्टी खरीदना या बच्चों की शिक्षा, शादी कुछ भी हो सकता है। निवेश पर अच्छा रिटर्न हासिल करने, टैक्स बचाकर और लोन चुकाने में मदद कर फाइनेंशियल प्लानिंग आपको बढ़ती महंगाई दर से भी बचाती है। फाइनेंशियल प्लानिंग आपकी असामयिक मृत्यु या रिटायर होने पर परिवार को आर्थिक सुरक्षा देती है। फाइनेंशियल प्लानर आपकी सभी वित्तीय समस्याओं का समाधान निकालने में मदद करता है। कब शुरू करें फाइनेंशियल प्लानिंगफाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर दूसरी शंका लोगों में यह होती है कि यह उनकी मौजूदा वित्तीय स्थिति पर भार डालती है। यह सही नहीं है और वास्तव में यह आपको निवेश और अपने पैसे का बुद्धिमत्तापूर्वक प्रबंधन सिखाती है। फाइनेंशियल प्लानिंग शुरू नहीं करने के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी है कि 20 साल की उम्र के युवा समझते हैं यह काफी जल्दी है और 40-50 के लोग समझते हैं कि बहुत देर हो चुकी है। निष्कर्ष में मैं यही करना चाहूंगा कि एक विस्तृत वित्तीय योजना आपको आर्थिक रूप से मजबूत बनाएगी और आपके दिमाग में यह स्पष्ट होगा कि आप भविष्य में अपनी योजनाएं कैसे पूरी कर पाएंगे।

Monday, April 19, 2010

फ्रूट बार बनाने से होगी अच्छी आमदनी

विभिन्न क्षेत्रों में तमाम तरह के फसल अलग-अलग मौसम में उगते हैं। नई फसल के समय फलों की मंडियों में सप्लाई इतनी ज्यादा होती है कि उत्पादकों को अच्छे दाम नहीं मिल पाते हैं। फल खराब होने से पहले बेचने के दबाव के कारण उत्पादक सस्ते मूल्य पर बेचने को विवश हो जाते हैं। लेकिन फलों की प्रोसेसिंग करके उत्पाद बनाने से बेहतर मूल्य पाना आसान हो सकता है। कई राज्यों में आम, संतरा, केला, अमरूद, सेब जैसे गूदादार फल पैदा होते हैं। इन फलों से फ्रूट बार बनाई जा सकती है। फ्रूट बार में फलों के सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं। स्वादिष्ट और पोषक होने के कारण फ्रूट बार क अच्छी मांग रहती है। सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएफटीआरआई) मैसूर के वैज्ञानिकों ने फलों से फ्रूट बार बनाने की बेहद सरल विधि तैयार की है। सीएफटीआरआई द्वारा विकसित विधि से तैयार फ्रूट बार को करीब तीन महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इन फ्रूट बार को आकर्षक पैकिंग में पेश करके बाजार में काफी लाभ कमाया जा सकता है। फ्रूट बार बनाने की विधिफ्रूट बार को बनाने की विधि बेहद सरल है और सीएफटीआरआई के वैज्ञानिकों ने इस विधि का पूरी तरह मानकीकरण किया है। फ्रूट बार बनाने के लिए ताजे और पके हुए फलों का उपयोग किया जाता है। सबसे पहले फलों को अच्छी तरह से धोकर उनका गूदा निकाल लिया जाता है। फिर इस गूदे को चीनी की आवश्यक मात्रा में मिला दिया जाता है। आमतौर पर चीनी की मात्रा को गूदे के बराबर रखी जाती है। फिर इस मिश्रण को ट्रे ड्रायर में सुखाया जाता है। ट्रे ड्रायर में इस मिश्रण को करीब 18 से 20 घंटे तक सुखाया जाता है। फिर इसके ठंडा करके तय आकार के छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है। इसके बाद फ्रूट बार को आकर्षक पैकिंग में पैक करने के बाद बाजार में बेचने के लिए भेज दिया जाता है। फ्रूट बार बनाने की मशीनकरीब 60 टन की सालाना क्षमता वाले इस फ्रूट बार बनाने की मशीनरी पर करीब 4.32 लाख रुपये का खर्च आता है और इसके लिए लगभग 100 वर्ग फुट के स्थान की आवश्यकता होती है। अगर जगह अपनी है तो सभी खर्च मिलाकर करीब 5.57 लाख रुपये तक आता है। इसमें उत्पादन के लिए 11 कर्मचारियों की जरूरत होती है। फ्रूट बार बनाने के लिए दो फलों की सफाई के टैंक (करीब 12,000 रुपये), एक गूदा निकालने का उपकरण (करीब 70,000 रुपये), 100 लीटर की क्षमता वाली दो दोहरी परत वाली भांप की कढ़ाइयां (करीब 30,000 रुपये), एक छोटा बॉयलर 100 किलोग्राम (करीब 75,000 रुपये), एक फ्रूट मिल (करीब 80,000 रुपये), 48 ट्रे वाला ट्रे ड्रायर (करीब 1,00,000 रुपये) और वजन तौलने की मशीन व अन्य उपकरण (करीब 65,000 रुपये) की जरूरत होती है। इस प्लांट में उत्पादन करके सभी नियमित खर्च निकालने के बाद सालभर में करीब तीन लाख रुपये तक की आसानी से आय हासिल की जा सकती है। सीएफटीआरआई यह प्लांट लगाने के लिए पूरी जानकारी और मदद देता है। फलों की फ्रूट बार बनाकर उत्पादक आसानी से ज्यादा आय हासिल कर सकते हैं। फ्रूट बार पौष्टिक तत्वों से भरपूर होने के अलावा स्वादिष्ट होती है, इस वजह से इसकी मांग हर छोटे-बड़े शहर होती है। इस वजह से फ्रूट बार बेचने के लिए उत्पादकों को बाजार की तलाश में कहीं भटकना नहीं पड़ेगा। वे अपने शहर-कस्बे में ही छोटे दुकानदारों से इसकी बिक्री के लिए संपर्क कर सकते हैं। उत्पादक फ्रूट बार की कीमत बाजार में उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति के अनुसार तय कर सकते हैं। मसलन छोटे कस्बों में दाम कम रखे जा सकते हैं। लेकिन कम दाम पर भी इसकी बिक्री से अच्छी आय होती है क्योंकि फलों के मुकाबले फ्रूट बार के दाम कई गुना ज्यादा रहते हैं।

Monday, April 5, 2010

सही उम्र में कराएं हेल्थ इंश्योरेंस

अच्छी सेहत को भी वरदान माना जाता है। पर इस वरदान को भी सुरक्षा की जरूरत पडऩे लगी है। आज के जमाने में जीवन शैली और खान-पान के तौर-तरीके बदलने से बीमारियों का नेचर बदल गया है। इसके साथ-साथ हेल्थ केयर के खर्चे भी बेतहाशा बढ़ गए हैं। परिवार के एक सदस्य को भी अगर अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है, तो मेडिकल बिल देखकर दिन में तारे नजर आने लगते हैं। ऐसे ही हालात में आर्थिक सुरक्षा देने का काम करता है हेल्थ इंश्योरेंस। पर लोगों के साथ आमतौर पर एक समस्या आती है कि इसे कब खरीदें? यानी हेल्थ इंश्योरेंस किस उम्र में कराया जाए? जीवन शैली और जरूरत का ध्यान रखें हेल्थ इंश्योरेंस कब कराया जाए? इस सवाल के जवाब के लिए सही तरीका ये है कि आप अपनी जीवन शैली और जरूरत को समझें। हर इंसान को खुद यह निर्णय करना होता है कि उसकी जीवन शैली और उसकी पारिवारिक जरूरतों के आधार पर उसकी आवश्यकताएं क्या हैं। वह किस तरह का लाभ चाहता है। उसे कितनी राशि का कवर चाहिए और यह भी कि उसकी लागत क्या है। इसके बाद वह बाजार में उपलब्ध विभिन्न प्रकार की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों पर नजर डाले व देखें कि उसके मापदंड पर कौन सी हेल्थ इंश्योरेंस योजना खरी उतरती है। कम उम्र में लेने से फायदा आज की उतार-चढ़ाव भरी दुनिया में हेल्थ इंश्योरेंस लेने का फैसला जल्दी करें। सबसे बेहतर तो यह रहेगा कि इसे कम उम्र में ही ले लें। जैसे-जैसे आपकी आयु उम्र बढ़ेगी वैसे-वैसे इसका प्रीमियम भी बढ़ता जाता है। बता दें कि ३ माह से लेकर ६० साल या इससे ज्यादा उम्र का कोई भी इंसान हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ले सकता है। तीन तरह की पॉलिसियां हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट में मौजूदा समय में तीन तरह की कंपनियां सक्रिय हैं- लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां, जनरल इंश्योरेंस कंपनियां और विशुद्ध हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां। इसी तरह से तीन तरह की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियां भी हैं- एक, जिनमें सभी प्रकार के हॉस्पिटलाइजेशन को कवर किया जाता है। दो, जिसमें हॉस्पिटल में भर्ती होने पर क्लेम का भुगतान किया जाता है और तीसरी वह जिनमें क्रिटिकल इलनेस व क्रिटिकल सर्जरी के खर्चों की भरपाई की जाती है। देखें बीमारियों का कवरेज कुछ योजनाओं में जोखिम कवर नहीं होते। और जब जरूरत पडऩे पर पॉलिसी काम न आए तो क्या फायदा? लिहाजा हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी चुनते समय यह जरूर देखें कि किन बीमारियों को कवर के दायरे में रखा गया है और किन बीमारियों को नहीं? रिन्युअल की मैक्सिमम उम्र पॉलिसी में यह भी देखेें कि बीमा कवर के रिन्युअल की अधिकतम आयु सीमा क्या है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है वैसे-वैसे किसी भी इंसान के लिए नई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी हासिल करना मुश्किल होने लगता है। तब सभी प्रकार के वेटिंग पीरियड लागू हो जाते हैं और फिर मौजूदा बीमारियां भी इस कवर के दायरे में नहीं रखी जाती। प्रीमियम के आधार पर नहीं बाजार में तरह-तरह के हेल्थ इंश्योरेंस प्लान मौजूद हैं-बेसिक कवर से लेकर जटिल सर्जिकल प्रोसीजर्स, क्रिटिकल इलनेस और हॉस्पिटलाइजेशन नकद भरपाई तक। लेकिन आप जब भी अपने लिए हेल्थ इंश्योरेंस खरीदें तब अपना फैसला महज बीमा प्रीमियम की राशि के आधार पर न करें। अलग-अलग बीमा कवर आपको भिन्न-भिन्न लाभ देंगे व इन सबकी विशेषताएं अलग होंगी लिहाजा इनके प्रीमियम में भी अंतर होगा। फैमिली फ्लोटर अच्छी हेल्थ इंश्योरेंस की फैमिली फलोटर पॉलिसी को अच्छा विकल्प माना जाता है। दरअसल अगर आप परिवार के हर सदस्य के लिए अलग पॉलिसी लेंगे तो सौदा मंहगा हो सकता है। पर फैमिली फलोटर प्लान में कवर की लागत पूरे परिवार के सदस्यों में बांटी जा सकती है। लिहाजा यह विकल्प सस्ता भी पड़ता है। पर ध्यान रहे इसका प्रीमियम परिवार के सबसे सीनियर मेंबर की उम्र के हिसाब से तय किया जाता है और जैसे जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ेगी वैसे-वैसे इसका प्रीमियम भी बढ़ता जाता है। टॉप-अप प्लान यदि आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है और आप इंश्योरेंस कवर में बढ़ोतरी चाहते हैं तो नई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने से बेहतर रहेगा कि इंश्योरेंस कंपनियों के टॉप-अप प्लान पर ध्यान दें। कई कंपनियां इस तरह के प्लान पेश करती हैं। यह आपके हेल्थ इंश्योरेंस कवर की लागत को कम करने का एक अच्छा जरिया हो सकता है।

घर खरीदने में जितनी देरी उतना नुकसान

अपना घर खरीदना सबका सपना होता है। ऐसे में आपके पास दो विकल्प हैं। या तो आप अभी घर खरीद लें और 20 साल तक मासिक किस्त (ईएमआई) चुकाते रहें। दूसरा किराए के घर में रहें और बची रकम से बाद में घर खरीद लें। आपको कौनसा विकल्प वित्तीय दृष्टि से उचित लगता है। घर के लिए किराया देना या घर खरीदना। क्या किराए के घर की अपने घर से कोई तुलना है? यहां दोनों विकल्पों की तुलना की गई है। पहले विकल्प में आप अभी घर खरीद सकते हैं जिसमें डाउन पेमेंट करते हैं और बाकी बैंक से लोन ले सकते हैं। इसमें आप 20 साल तक ईएमआई चुकाते हैं और तब आपको घर का मालिकाना हक मिलता है। दूसरे विकल्प में आप एक कम किराए के मकान में रह सकते हैं। किराया मकान की ईएमआई से काफी कम होता है और इस बची रकम को अच्छी जगह निवेश कर सकते हैं। इस रकम से आप 20 साल बाद मकान खरीद सकते हैं। आंकड़ों की नजर में अपना घरयहां मुंंबई के उपनगर में 2 बीएचके अपार्टमेंट का उदाहरण लेते हैं। मानो यह मकान आपको आज 75 लाख रुपये में उपलब्ध है। इसका 85 फीसदी आपको लोन मिल जाएगा। इसलिए आपको 11.25 लाख रुपये का डाउन पेमेंट करना पड़ेगा और बाकी 63.75 लाख रुपये का आप होम लोन लेते हैं। 20 साल के लिए आपको हर महीने करीब 65,344 रुपये की किस्त चुकानी होगी और बीस साल बाद वह घर आपका हो जाएगा। उस समय आपके घर की कीमत क्या होगी? यदि पिछले रिकॉर्ड पर नजर डालें तो प्रॉपर्टी में निवेश ने लंबी अवधि में 15 फीसदी रिटर्न दिया है। कम से कम 10 फीसदी रिटर्न भी मानें तो 20 साल बाद आपका घर 5.06 करोड़ रुपये का होगा। तब आप एक पांच करोड़ रुपये से भी ज्यादा कीमत वाले घर के मालिक होंगे। किराए पर रहने में क्या स्थितिअब देखें किराए के मकान वाला विकल्प। यदि आप ऐसे ही घर का मासिक किराया फिलहाल 22,000 रुपये चुकाते हैं तो 65,344 रुपये की ईएमआई के मुकाबले रकम बची 43,344 रुपये महीना। क्या आप यह रकम 20 साल के लिए कहीं निवेश कर सकते हैं। नहीं! क्योंकि मकान की कीमत बढऩे के साथ ही किराया भी बढ़ता रहेगा। ऐसे में मान लीजिए किराए में हर साल कम से कम 6 फीसदी की बढ़ोतरी होती है और आपका मासिक निवेश साल-दर साल घटता जाएगा। वास्तव में आप 20 साल ही निवेश कर पाएंगे क्योंकि 20 वें साल तो किराया ईएमआई से भी ज्यादा हो जाएगा। इस हिसाब से 20वें साल में किराया 66,563 रुपये प्रति माह हो जाएगा। 20 साल बाद आपका बचाकर किया गया निवेश कितना हो जाएगा। आप 20 साल की लंबी अवधि के लिए निवेश कर रहे हैं, ऐसे में आप स्टॉक मार्केट में निवेश कर अच्छा रिटर्न ले सकते हैं। मानिए आपको 12 फीसदी रिटर्न मिल जाएगा। ऐसे में 20 साल बाद आपका निवेश बढ़कर 2.82 करोड़ रुपये हो जाएगा, जो 20 साल बाद उस मकान की कीमत 5.06 करोड़ रुपये से काफी कम है। लेकिन रुकिए, हम यहां डाउन पेमेंट के रूप में दिए गए 11.25 लाख रुपये को भूल रहे हैं जो आपको घर खरीदते समय करना पड़ता। जब आप किराए पर रहेंगे तो यह रकम भी आप बचा लेंगे। यदि आप इस रकम को भी 20 साल के लिए निवेश कर देते हैं और 12 फीसदी रिटर्न हासिल करते हैं तो यह बढ़कर 1.09 करोड़ रुपये हो जाएगा। ऐसे में 20 साल बाद आपके पास 3.91 करोड़ रुपये जमा होंगे। दुर्भाग्य से यह रकम भी 20 साल बाद उस मकान की संभावित कीमत 5.06 करोड़ रुपये से काफी कम है। ऐसे में अभी घर खरीदने का विकल्प किराए पर रहकर 20 साल बाद घर खरीदने के मुकाबले कहीं ज्यादा फायदेमंद है। इसलिए जितना जल्दी हो सकता है घर खरीद लीजिए। यह एक ऐसी संपत्ति होगा जिसकी वैल्यू भविष्य में काफी ज्यादा होगी। लंबे समय के लिए प्रॉपर्टी में निवेश काफी बेहतर साबित होगा।

Friday, April 2, 2010

पोस्ट ऑफिस की स्कीमों का भी फायदा उठाएं

देश में म्यूचुअल फंड और शेयर मार्केट के निवेश के विकल्प होने के बाद भी कई निवेशक अब भी सुरक्षा को ज्यादा महत्व देते हैं। सुरक्षित रिटर्न देने वाले साधनों में पोस्ट ऑफिस की स्कीमों का बड़ा आकर्षण रहा है। इन स्कीमों के साथ सरकारी जुड़ाव होने की वजह से लाखों निवेशक इनमें अपना पैसा लगाते हैं। पोस्ट ऑफिस की मंथली इनकम स्कीम और रिकरिंग डिपॉजिट बीते कई साल से देश की लोकप्रिय स्कीमों में से एक रही हैं। अगर आप भी ऐसे निवेशकों में हैं, जो परंपरागत उत्पादों को तवज्जो देते हैं, तो फिर ये आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकते हैं। पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम अपना पैसा के सीईओ हर्ष रूंगटा के मुताबिक मंथली इनकम स्कीम के नाम से ही जाहिर होता है कि इसमें ब्याज की रकम हर महीने दी जाती है। ये स्कीम पूरी तरह सरकार की ओर से प्रायोजित है। निवेशक अपनी रकम पोस्ट ऑफिस में जमा करते हैं। और इस पर ८ फीसदी सालाना के हिसाब से ब्याज दिया जाता है। ब्याज की रकम हर महीने आपके बचत खाते में डाल दी जाती है। इससे आपको हर महीने पोस्ट ऑफिस जाने की जरूरत नहीं होती है। एमआईएस की अवधि ६ साल की होती है। आपकी रकम इस समय अवधि के लिए लॉक की जाती है। स्कीम की मैच्योरिटी पर 5 फीसदी बोनस भी मिलता है। इस तरह पूरी स्कीम पर प्रभावी ब्याज दर 8.9 फीसदी के आस-पास हो जाती है। पर एक बात ध्यान रखें इस पर 80सी के तहत इनकम टैक्स छूट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। मंथली इनकम स्कीम के तहत आप ४,50,000 रुपये तक का निवेश कर सकते हैं। संयुक्त खाते में 9,00,000 रुपये तक का निवेश किया जा सकता है। रिकरिंग डिपॉजिट वित्तीय एवं निवेश सलाहकार नवनीत धवन के मुताबिक पोस्ट ऑफिस के रिकरिंग डिपॉजिट के तहत आप हर महीने एक निश्चित रकम जमा करते हैं। इस रकम पर आपको हर महीने ब्याज मिलता रहता है। इस तरह मंथली इनकम स्कीम और आरडी के बीच एक सिस्टम बनाने की जरूरत होती है। मतलब ये कि आप जो पैसा मंथली इनकम स्कीम से अर्जित करेंगे, उसे आरडी में निवेश कर सकते हैं। एक स्कीम आपका हर महीने का आमदनी का जरिया बन जाती है, तो दूसरी में निवेश की जरूरत पड़ती है। आप हर महीने मंथली इनकम स्कीम से मिले ब्याज को रिकरिंग डिपॉजिट में निवेश कर सकते हैं। इससे आपको ज्यादा ब्याज मिलना सुनिश्चित हो जाता है। इसके लिए आपको बार-बार पोस्ट ऑफिस जाने की भी जरूरत नहीं है। बस आपको अपने मंथली इनकम स्कीम और रिकरिंग डिपॉजिट अकाउंट को खोलते वक्त पोस्ट ऑफिस को बताना होगा कि हर महीने आपके एमआईएस के ब्याज को आपके रिकरिंग अकाउंट में डाल दिया जाए। इस तरह इन दोनों के कंबीनेशन से बचत और निवेश का एक बेहतरीन विकल्प बनाया जा सकता है।

थोड़ा-थोड़ा निवेश करके बनाएं बड़ी रकम

इक्विटी यानी शेयरों में किए जाने वाले निवेश को लेकर हमारे यहां आज भी आशंका भरी नजरों से देखा जाता है। पर हकीकत में अगर आपको एक बड़ी पूंजी बनानी है, तो शेयर बाजार से बेहतर रास्ता कोई नहीं हो सकता। इक्विटी में लंबे समय तक सावधानी से किया गया छोटा निवेश भी हर हाल में एक बड़ी रकम बन जाता है। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि शेयरों में निवेश के लिए एक बड़ी रकम की जरूरत होती है। पर ऐसा पूरी तरह सच नहीं है। एक निश्चित रकम को अगर किसी तय अवधि तक बाजार में लगाया जाए, तो इसके जरिए एक बड़ी रकम हासिल की जा सकती है। कैसे बनाएं पंूंजी थोड़े-थोड़े पैसे को शेयर बाजार में निवेशक करके एक बड़ी रकम बनाना बहुत मुश्किल भी नहीं है। मान लीजिए आप 40,000 रुपये महीना कमाते हैं। आप अपनी कुल आमदनी का 10 फीसदी निवेश कर सकते हैं। आप अपने पैसे को 30-35 साल तक निवेश कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में आपके रिटायरमेंट तक आपके पास एक बड़ी रकम उपलब्ध होगी। अगर 25 साल के हैं और 60 साल में रिटायर होना चाहते हैं। साथ ही परिवार के 3-4 सदस्य आप पर आश्रित हैं। और आपका मासिक खर्च करीब 25,000 रुपये है। इन हालात में आप इक्विटी में निवेश करके एक बड़ी रकम बनाना चाहते हैं। इसके लिए आपको एक बेहतरीन प्लान पर काम करना होगा। निवेश की योजना बनाएं अपने रिटायरमेंट के लिए आपको पैसा इकट्ठा करना है। चूंकि आपकी उम्र अभी बहुत ज्यादा नहीं है, इसलिए आप इक्विटी में निवेश कर सकते हैं। मान लेते हैं कि आप 5,000 रुपये प्रति माह डायवर्सिफाइड इक्विटी म्यूचुअल फंड में लगा सकते हैं। ये निवेश आप रिटायरमेंट की उम्र तक कर सकते हैं। हालांकि इसमें बाद में बदलाव भी कर सकते हैं। पर मान लेते हैं कि आप ये पैसा रिटायरमेंट तक इसी फंड में लगाते रहेंगे। चूंकि आप 35 साल के लिए निवेश कर रहे हैं, इसलिए इस निवेश में जोखिम बेहद कम है। भले ही ये निवेश इक्विटी में किया जा रहा है, पर जोखिम यहां कम ही माना जाएगा। शेयर बाजार बहुत ज्यादा जोखिम शॉर्ट टर्म के निवेश पर ही होता है। 35 साल जैसी लंबी अवधि के लिए तो यह बिल्कुल भी रिस्की नहीं है। इसमें तो आप बहुत ही आकर्षक रिटर्न हासिल कर सकते हैं। यदि सेंसेक्स को ही लें तो पिछले 30 साल में यानी 1979 से 2009 तक इसने 15 से 17 फीसदी तक रिटर्न दिया है। ऐसे में अगर लांग टर्म के लिए निवेश कर रहे हैं तो कम से कम 15 फीसदी रिटर्न तो आप सुरक्षित मान सकते हैं। अब मूल बात पर आते हैं। निवेशकों को शुरुआती सालों में इतनी रकम का निवेश करने में परेशानी आ सकती है। बाद में उसकी जिम्मेदारियां बढ़ती चली जाएंगी। लेकिन कैरियर आगे बढऩे के साथ-साथ सेलरी भी बढ़ेगी और 5,000 रुपये मासिक निवेश ज्यादा कठिन नहीं होगा। कितना होगा निवेश आप हर महीने 5,000 रुपये निवेश कर सकते हैं। इसका मतलब ये हुआ कि आप साल में 60,000 रुपये इक्विटी में लगाएंगे। आपको चूंकि 35 साल तक निवेश करना है, इसका मतलब ये हुआ कि आप 35 साल में 21 लाख रुपये जमा करेंगे। मान लेते हैं इस पर आपको औसत रिटर्न 15 फीसदी हासिल होगा। इस तरह आपको 3,00,000 रुपये और मिल जाएंगे। इस तरह कुल आपको कुल रिटर्न 24 लाख रुपये मिल जाएगा। अब अगर इस ब्याज दर को जोड़कर रिटर्न निकालें तो 15 फीसदी की दर से ये रकम भी करीब 24 लाख रुपये बनती है। मान लेते हैं कि आपको कुल 50 लाख रुपये मिल जाएंगे। ये आकलन सिर्फ साधारण ब्याज दर के आधार पर निकाला गया है। आमतौर पर लोग इसी तरह सोचते हैं। पर ऐसा होता नहीं है। इसमें वार्षिक कंपाउंड इंटरेस्ट वाला फॉर्मूला नहीं अपनाया गया है, बल्कि एक साधारण सी गणना है जो कोई भी कर सकता है।कंपाउंड इंटरेस्ट रेट का चमत्कारपर ब्याज की गणना ऐसे होती नहीं है। कंपाउंड इंटरेस्ट रेट के आधार पर आकलन करने पर आपकी रकम करोड़ों में बदल जाएगी। सही-सही गणना के मुताबिक उसके पास करीब 7.43 करोड़ रुपये होंगे। आप सोच रहे होंगे कि इतनी बड़ी रकम कैसे संभव है। यह कंपाउंड (चक्रवृद्धि) ब्याज दर का चमत्कार है। ब्याज पर ब्याज मिलता है और यह बढ़ता रहता है। शुरुआत में ब्याज बहुत कम दिखता है, लेकिन समय के साथ यह राशि बढ़ती रहती है और 35 साल जैसी बड़ी अवधि के बाद तो यह राशि आपको अविश्वसनीय सी लगेगी। क्या आप विश्वास करेंगे कि 5,000 रुपये महीना निवेश करने पर आपको 35 साल बाद 1.04 करोड़ रुपये तो केवल ब्याज के मिलेंगे जो आपकी निवेश की गई मूल रकम से भी चार गुना है। यह सब कंपाउंड इंटरेस्ट का कमाल है इसीलिए तो महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने चक्रवृद्धि ब्याज को विश्व का आठवां अजूबा करार दिया था।10 साल बाद करें ऐशयदि आप 35 साल जितनी लंबी अवधि तक निवेश का दर्द नहीं सहन कर सकते तो कोई नहीं आप 10 साल तक निवेश कर मुक्ति पाइए। 5,000 रुपये महीना 10 साल तक निवेश करने के बाद बाकी 25 साल तक वह रकम कंपाउंड ब्याज से बढ़ती हुई एक बड़ी रकम बन जाएगी। ऐसे में आपके पास 2.12 करोड़ रुपये ही होंगे यानी आपको पहले के मुकाबले 5.88 करोड़ रुपये कम मिलेंगे। एक उपाय है, यदि आप चाहते हैं कि केवल 10 साल तक निवेश करके भी आपको 35 साल बाद 7.43 करोड़ रुपये ही मिलें तो मासिक निवेश आपको थोड़ा बढ़ाना पड़ेगा। आपको हर महीने 1,420 रुपये ज्यादा निवेश करना होगा। यानी 6,420 रुपये मासिक निवेश 10 साल तक कीजिए और अगले 25 साल तक उसे बढऩे के लिए छोड़ दीजिए। तब आपका धन 7.43 करोड़ रुपये हो जाएगा।पहले जितना बोझ, बाद में उतना आरामइससे आपको एक बात तो समझ में आ गई होगी कि पहले सालों में निवेश में जितना कष्ट सहन करेंगे बाद में उतना ही फायदा होगा। कैरियर के पहले सालों में कोई भी व्यक्ति ज्यादा निवेश करने की स्थिति में भी होता है क्योंकि तब जिम्मेदारियां कम होती हैं और निर्भर सदस्य भी कम होते हैं। यदि कोई 10 साल के लिए थोड़ा ज्यादा कष्ट लेकर 1,420 रुपये मासिक ज्यादा निवेश करता है तो निवेश से 25 साल भी बचा लेता है और उतनी ही रकम भी बना लेता है। यदि वह अपनी सेलरी का 50 फीसदी यानी 20,000 रुपये प्रति महीना दो साल के लिए निवेश कर सके तो भी वह इतनी रकम हासिल करने में कामयाब हो सकता है। 20,000 रुपये मासिक निवेश 2 साल तक करके अगले 33 साल उसे सुरक्षित छोडऩे पर उसकी रकम 9.24 करोड़ रुपये होगी। यदि आप सोचते हैं कि निवेश का यह मौका तो 5,10 या 20 साल पहले था तो चिंता मत कीजिए अब भी मौका है।

Wednesday, March 31, 2010

खाता बंद करने में भी मुश्किल

निजी बैंकों में बचत खाता खोलने वाले जरा सावधान रहें। बचत खाता बंद कराने पर ज्यादातर निजी बैंक सीधे आपकी जेब पर हमला कर रहे हैं और कुछ शुल्क वसूल रहे हैं। अगर आप बैंक की कार्य और नीतियों को नापसंद कर अपना खाता बंद कराना चाहते हैं तो बैंक उस पर भी एग्जिट चार्ज वसूलकर आपकी जेब हल्की कर सकते हैं। यह चार्ज 100 रुपये से लेकर 500 रुपये तक हो सकता है। निजी बैंकों से पीछा छुड़ाना अब आसान नहीं रह गया है। देश में कार्यरत एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एचएसबीसी जैसे दूसरे निजी बैंक ग्राहकों से उनका खाता बंद करने के लिए अलग से शुल्क ले रहे हैं। एचडीएफसी बैंक के एक अधिकारी मोहम्मद सलीम ने बताया कि हमारे बैंक में जमा खाता खुलवाने वाला व्यक्ति यदि छह महीने के अंदर ही अपना खाता बंद करना चाहता है तो उसे 500 रुपये बतौर एग्जिट चार्ज देना होगा। यह शुल्क उतना ही है जितना किसी ग्राहक को तिमाही न्यूनतम राशि अपने खाते में न रखने पर चुकानी पड़ती है। उन्होंने बताया कि हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि बैंकों को ग्राहक का खाता खुलवाने के दौरान कई तरह के प्रोसेसिंग खर्च चुकाने होते हैं। इसके अलावा एचएसबीसी बैंक के वित्तीय योजना प्रबंधक जयदेव अरोड़ा ने भी बताया कि खाता खुलने के छह माह के अंदर इसे बंद कराया जाए तो ग्राहक को 500 रुपये बैंक को देने होंगे। बैंक
एग्जिट चार्ज
अवधिएचडीएफसी बैंक
500 रुपये
6 माह तकएचएसबीसी
500 रुपये
6 माह तकआईसीआईसीआई बैंक
400 रुपये
1 वर्ष तकएबीएन एमरो
336 रुपये
1वर्ष तकयस बैंक
100 रुपये
कभी भी

जरूरत के मुताबिक फिक्स्ड डिपॉजिट

किसी भी निवेशक के पोर्टफोलियो में सावधि जमा (एफडी) की हिस्सेदारी काफी ज्यादा होती है। दरअसल सुरक्षित रिटर्न की उम्मीद सबसे ज्यादा इसी में होती है। एफडी का परंपरागत रूप काफी साधारण था, लेकिन अब बाजार में गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से बैंकों ने एफडी के रूप में कई बदलाव किए हैं। एफडी में भी अब कई तरह के विकल्प मौजूद हैं।इंश्योरेंस सुविधा के साथ अपना पैसा के सीईओ हर्ष रूंगटा के मुताबिक कुछ एफडी के साथ इंश्योरेंस भी जुड़ा हुआ होता है। ऐसे में एफडी तो अपने मूल रूप में बनी ही रहती है साथ में इंश्योरेंस का अतिरिक्त फायदा भी मिल जाता है। लेकिन यह फायदा जमा की राशि और एफडी की अवधि पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए कुछ बैंक 25,000 रुपये की तीन साल की एफडी पर 5 लाख रुपये का फ्री एक्सीडेंट कवर भी देते हैं। एफडी पर 7 फीसदी ब्याज आपको मिलेगा। इससे प्रॉडक्ट की वैल्यू बढ़ जाती है। कई बैंक केवल एक्सिडेंट इंश्योरेंस ही देते हैं जिसमें सम एश्योर्ड राशि 3 लाख से 7 लाख रुपये के बीच होगी। आमतौर पर ऐसे कवर में कई शर्तें जुड़ी हुई होती हैं और यह आपकी सभी बीमा जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता।ब्याज का पुनर्निवेशनिवेश सलाहकार नवनीत धवन के मुताबिक कुछ बैंक एफडी से हासिल होने वाले ब्याज की रकम के रीइनवेस्टमेंट की सुविधा भी देते हैं। मानएि आप एफडी पर हर तिमाही में 2,000 रुपये ब्याज के रूप में पा रहे हैं। ऐसे में इस रकम की एक और एफडी बैंक मौजूदा ब्याज दरों पर शुरू कर देगा। फिक्स्ड डिपॉजिट ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स हैं जिनमें रिटर्न तय है और यदि निवेशक अपनी रकम मैच्योरिटी की अवधि से पहले भी निकालता है तो बैंक ऐसे में कुछ जुर्माना लगाते हैं। ऐसे मामलों में रिटर्न कुछ कम हो जाता है। लेकिन कुछ बैंक ऐसे भी हैं जो एफडी को बीच में तोडऩे पर जुर्माना नहीं लगाते हैं। एफडी में ऐसा लचीलापन निवेशकों को काफी आकर्षित करता है।समय सीमा में छूटज्यादातार लोग एफडी किसी निश्चित लक्ष्य के लिए करवाते हैं। जैसे कोई महंगी चीज खरीदनी हो या बच्चे की शादी करनी हो। ऐसे कार्यक्रम तय समय से आगे टल भी सकते हैं। ऐसे में या तो निवेशक को एफडी मैच्योर होने के बाद पैसा निकालना ही पड़ता है, जिससे उसे रिटर्न में नुकसान उठाना पड़ता है। लेकिन अब कई बैंक एफडी में निवेश करने वालों को एफडी की समय सीमा बढ़ाने का विकल्प भी निवेशकों को दे रहे हैं। इसमें वे अपने कार्यक्रम के मुताबिक उसका एफडी की मैच्योरिटी अवधि बढ़ा सकते हैं।जमा को तोडऩे का विकल्पनिवेश सलाहकार अर्णव पंड्या के मुताबिक समान मूल्य वर्ग की कई जमाओं में बड़ी संख्या में कागजी कार्रवाई करनी पड़ती हैं। यह काम आमतौर पर उन निवेशकों को करना पड़ता है जिन्हें भविष्य में भिन्न-भिन्न समय पर पैसे की जरूरत होती है। ऐसे में उनकी इच्छा पूरी रकम को एक साथ एफडी में निवेश करने की नहीं होती है क्योंकि बाद में पैसे की जरूरत पडऩे पर उन्हें एफडी तोडऩी पड़ सकती है जिसमें उनको रिटर्न कम मिलेगा। निवेशकों की इस समस्या को देखते हुए कई बैंक ऐसी व्यवस्था दे रहे हैं जिसमें एफडी की पूरी रकम को निवेशक की जरूरत के हिसाब से अगल-अलग मूल्य वर्ग के कई हिस्सों में बांट देते हैं। ऐसी एफडी में निवेशकों को ज्यादा रिटर्न का फायदा मिल जाता है।

Tuesday, March 30, 2010

अब अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में घर खरीदने पर देना होगा सर्विस टैक्स

अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी की खरीद पर अब आपको सर्विस टैक्स से भी जूझना होगा। नए बजट में इसका प्रावधान किया गया है। सर्विस टैक्स पहली अप्रैल से लागू होगा। अब किसी भी बन रहे मकान या फ्लैट के खरीदने पर बिल्डर को 10.3 फीसदी सर्विस टैक्स देना होगा। जाहिर है इसका बोझ ग्राहकों के सिर ही आएगा। नियम के मुताबिक जब तक किसी प्रॉपर्टी पर लोकल अथॉरिटी से कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिल जाता है, उसे अंडर कंस्ट्रक्शन (निर्माणाधीन) प्रोजेक्ट माना जाएगा। इस तरह जब तक किसी प्रॉपर्टी पर अथॉरिटी से कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा, तब तक वो सर्विस टैक्स के दायरे में रहेगी। अगर आप प्रॉपर्टी काम पूरा हो जाने का सर्टिफिकेट मिलने के बाद खरीदते हैं, तब सर्विस टैक्स का कोई चक्कर नहीं होगा। जरा गौर से समझें टैक्स को सर्विस टैक्स को लेकर बिल्डर आपके साथ मनमानी कर सकते हैं। ऐसे में कुछ समझदारी आपको दिखानी होगी। आप ये न सोचें कि अगर किसी निर्माणाधीन अपार्टमेंट में 30 लाख रुपये का फ्लैट खरीदेंगे, तो आपको 10.3 फीसदी के हिसाब से 3.09 लाख रुपये सर्विस टैक्स के तौर पर देने होंगे । यहां ध्यान देने की बात ये है कि सर्विस टैक्स पूरे अमाउंट पर नहीं देना है। कोई भी बिल्डर किसी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में 67 फीसदी अमाउंट जमीन की कीमत और मैटेरियल आदि की वसूल करता है। बाकी 33 चार्ज बिल्डर की सर्विस का होता है। इसका मतलब ये हुआ कि बिल्डर को 10.3 फीसदी की दर से सर्विस टैक्स सिर्फ 33 फीसदी अमाउंट पर ही देना होगा। इस तरह पूरे अमाउंट पर सर्विस टैक्स की प्रभावी दर 3.34 फीसदी ही होगी। कब देना होगा टैक्स अमूमन ज्यादातर लोग होम लोन के जरिए घर खरीदते हैं। यही नहीं घर भी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में ही खरीदा जाता है। ज्यादातर लोग किसी नए प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक कराते हैं। इसके पैसे का भुगतान कुछ अंतराल पर स्टेज आधारित होता है। इसका मतलब ये हुआ कि ज्यादातर लोग बिल्डर को पैसे का भुगतान बिल्डिंग पूरी बनने से पहले ही करते हैं। दरअसल बिल्डिंग पूरी हो जाने के बाद ही बिल्डर को कंप्लीशन सर्टिफिकेट मिलता है। इस तरह इस पूरे भुगतान पर सर्विस टैक्स लगेगा। इस टैक्स का भुगतान बिल्डर को ही करना होगा। पर मुश्किल ये है कि बिल्डर इस टैक्स का बोझ ग्राहकों के सिर डालेंगे। इस तरह पहली अप्रैल से जब आप घर खरीदने जाएंगे, तो ज्यादा रकम चुकानी होगी। लोकेशन पर भी चार्ज सर्विस टैक्स के लिए कुछ और प्रावधान किए गए हैं। अगर आप किसी बेहतरीन लोकेशन पर फ्लैट या घर खरीदते हैं, तो इसके लिए भी बिल्डर को 10.3 फीसदी सर्विस टैक्स देना होगा। अगर आप बिल्डर से किसी खास नंबर का फ्लैट या पार्क फेसिंग-स्वीमिंग पूल फेसिंग या फिर वास्तु आदि की सुविधा के मुताबिक फ्लैट मांगते हैं, तो आपको सर्विस टैक्स देना होगा। पर एक चीज ध्यान रखें पार्किंग या गैराज आदि की सुविधा पर सर्विस टैक्स नहीं लिया जा सकता है। इसके लिए साफ-साफ निर्देश हैं। कैसे लगेगा टैक्स मान लीजिए आपने 1000 वर्ग फुट का फ्लैट खरीदा। इस फ्लैट का रेट 3,000 रुपये प्रति वर्ग फुट है। आपने पांचवें फ्लोर पर बेहतरीन सुविधाओं के लिए 100 रुपये प्रति वर्ग फुट का अतिरिक्त भुगतान किया। आपने 2 लाख रुपये में पार्किंग स्पेश खरीदा। इस तरह आपने कुल 33 लाख रुपये का भुगतान किया। ये पूरा पैसा आपने बिल्डिंग का निर्माण पूरा होने से पहले बिल्डर को दे दिया। इस तरह अब सर्विस टैक्स कुछ इस तरह बनेगा। पहले तो पार्किंग स्पेश के 2 लाख रुपये पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। पांचवीं मंजिल पर बेहतरीन सुविधाओं के लिए आपने 100 रुपये प्रति वर्ग फुट ज्यादा दिए हैं। 1000 वर्ग फुट के फ्लैट पर 10.3 फीसदी की दर से ये टैक्स बनेगा 10,300 रुपये। फ्लैट की असल कीमत 30 लाख रुपये है। इसकी 67 फीसदी आप जमीन की कीमत और बिल्डिंग मैटेरियल का कास्ट निकाल दीजिए। 30 लाख का 67 फीसदी 20,10,000 रुपये बनेगा। अब बाकी 9,90,000 रुपये पर आपको 10.3 फीसदी की दर से सर्विस टैक्स देना होगा। इस तरह ये रकम बनेगी 1,01,970 रुपये। इस तरह आपको कुल 10,300 और 1,01,970 यानी 1,12,270 रुपये बतौर सर्विस टैक्स देने होंगे।

Monday, March 29, 2010

मक्का की प्रोसेसिंग से कमाएं मुनाफा

भारत में जिन खाद्य फसलों का उत्पादन किया जाता हैं, उनमें गेहूं और चावल के बाद मक्का का स्थान तीसरे नंबर पर आता है। पर इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के बावजूद भी इसके प्रसंस्करण और उससे बनने वाले उत्पादों के बारे में कम ही लोगों को जानकारी है। खास बात तो यह है कि देश में टेक्सटाइल इंडस्ट्री स्टार्च के लिए मुख्य तौर पर मक्का पर ही निर्भर है। इस तरह मक्का की प्रोसेसिंग कर स्टार्च, कॉर्न फ्लोर, कॉर्न ऑयल, कॉर्न फ्लैक्स, पशुहार, बेबी कार्न आदि उत्पाद बनाए जा सकते हैं।देश में आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र मक्का के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। वहीं, अन्य प्रदेशों की तुलना में मध्यप्रदेश मक्का उत्पादन में चौथे नंबर पर आता है। इसके अलावा पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, बिहार, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, मेघालय, मनीपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा आदि राज्यों में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। मौजूदा समय में मक्का का लगभग 55 प्रतिशत उपयोग भोजन, 14 प्रतिशत पशुहार, 18 प्रतिशत मुर्गीदाना, 12 प्रतिशत स्टार्च और करीब डेढ़ प्रतिशत का उपयोग बीज के रूप में किया जाता है। इसके दाने में करीब 30 प्रतिशत तेल, 18 प्रतिशत प्रोटीन और बड़ी मात्रा में स्टार्च पाया जाता है। मक्का की प्रोसेसिंग कर जहां इसके विभिन्न प्रकार के स्नैक्स बनाए जा सकते हैं, वही अच्छी मात्रा में प्रोटीन होने के कारण इसके बिस्किट सहित अन्य बेकिंग उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं। इसके अलावा रेडी टू ईट प्रोडक्ट के रूप में भी मक्का के विभिन्न उत्पाद इन दिनों प्रचलन में हैं। साथ ही कॉर्न फ्लैक्स और बेबी कॉर्न मक्का के खाद्य उत्पादों में लोकप्रिय हो रहे हैं। इस क्षेत्र में कई बड़ी कंपनियों के ब्रांड भी बाजार में आसानी से दिखाई दे सकते हैं। इन सबके अलावा मक्का का स्टार्च द्रव्य अथवा पावडर रूप में बड़ी खपत वाला उत्पाद है। इस समय टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज में मक्का के स्टार्च की बड़ी डिमांड हैं। टेक्सटाइल के अलावा अनेक खाद्य पदार्थो भी मक्का का स्टार्च इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह प्रोसेसिंग कर इसका तेल भी बनाया जा सकता है, जो कि विभिन्न दवाओं के साथ मालिश आदि में प्रयुक्त होता है। साथ ही मक्का लिक्विड शुगर के तौर सोरविटॉल, ग्लूकोज सहित कई अन्य उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं। केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान भोपाल के वरिष्ठ वरिष्ठ वैज्ञानिक (खाद्य प्रसंस्करण) डा. एसपी सिंह बताते हैं कि लघु एवं कुटीर उद्योग के रूप में मक्का प्रसंस्करण की इकाई लगाने के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। इसमें स्टार्च पावडर, कॉर्न फ्लेक्स, कॉर्न फ्लोर की छोटी इकाई लगाने के लिए अलग-अलग रूप से करीब पांच लाख रुपये निवेश की जरूरत होती है। ऑटोमेटिक संयंत्र लगाने के लिए लगभग 20 लाख रुपये तक खर्चा आता है। इसके लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के तहत सब्सिडी पर वित्त का प्रबंध किया जा सकता है। मक्का प्रसंस्करण में करीब 200 मीट्रिक टन प्रति दिन क्षमता की स्टार्च उत्पादन क्षमता वाली इकाई की स्थापना में लगभग 30 करोड़ रुपये निवेश की जरूरत होती है। इस इकाई में मक्का के ग्लूकोज, जर्मस, फाइबर, ग्लूटेन आदि का उत्पादन भी किया जा सकता है।

Tuesday, March 23, 2010

बेची गई प्रॉपर्टी पर कैसे बचाएं टैक्स

सब जानते हैं कि प्रॉपर्टी बाजार काफी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हर साल बड़ी संख्या में प्रॉपर्टी बिक्री संबंधी सौदे होते हैं। जो व्यक्ति प्रॉपर्टी बेचता है उसे काफी मोटी रकम हासिल होती है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति यह जानने का इच्छुक जरूर होता है कि प्रॉपर्टी बेचने से हासिल रकम को वह कैसे टैक्स से बचा सकता है। साथ ही जिसने भी प्रॉपर्टी खरीदी है वह भी संभव है कभी इसे किसी दूसरे को बेचे, ऐसे में वह भी टैक्स बचत की बारीकियां सीखना चाहेगा। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि बेची गई प्रॉपर्टी पर लगने वाले कैपिटल गेन टैक्स से कैसे बचा जा सकता है।लांग टर्म कैपिटल गेन ज्यादा महत्वपूर्णसबसे पहले तो यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि हम केवल लांग टर्म कैपिटल गेन टैक्स के बारे में बात कर रहे हैं। कैपिटल गेन उस प्रॉपर्टी की बिक्री पर लगता है जो आपके पास तीन साल से ज्यादा समय से थी। ऐसी प्रॉपर्टी जो आपके पास तीन साल से कम समय से थी उसकी बिक्री शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन के तहत आती है और उस पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है। इस तरह के शॉर्ट टर्म गेन को आपकी अन्य आय में गिना जाता है जिसके चलते इस पर लगने वाले टैक्स को आप आयकर की धारा 80 सी के तहत मिलने वाली छूट के तहत निवेश कर बचा सकते हैं। 80 सी के तहत पीपीएफ, ईएलएसएस, एनएससी आदि में निवेश किया जाता है।एनएचएआई या आरईसी के बांड्स में निवेशइसके अलावा लांग टर्म कैपिटल गेन पर टैक्स आप दो तरीकों से बचा सकते हैं। टैक्स बचाने का पहला रास्ता है प्रॉपर्टी बेचने से प्राप्त पूंजी को छह महीनों के भीतर एनएचएआई या आरईसी के बांड्स में निवेश किया जाए। यह टैक्स बचाने का सबसे सरल रास्ता है। इसमें परेशानी केवल यह है कि निवेश के लिए दिए गए समय में आपके लिए बांड्स उपलब्ध हो पाएं। दूसरी बात यह है कि इस निवेश पर एक वित्त वर्ष में केवल 50 लाख रुपये की निवेश लिमिट है। ऐसे में यदि आपने प्रॉपर्टी बेचकर इससे भी ज्यादा रकम हासिल की है तो यह रास्ता आपके के लिए ज्यादा फायदेमंद नहीं हो सकता। हां, यह हो सकता है कि आप प्रॉपर्टी बेचने का समय ऐसा चुनें जब छह महीनों के भीतर वित्त वर्ष बदल जाए। ऐसे में आप निवेश की लिमिट को एक करोड़ रुपये तक ले जाए पाएंगे। उदाहरण के लिए यदि कोई प्रॉपर्टी जनवरी में बेची जाती है तो उसके लिए निवेश की छह महीनों की समय सीमा जून में समाप्त होगी। जून अगले वित्त वर्ष में पड़ेगा, ऐसे में आप छह महीनों के भीतर ही एक करोड़ रुपये का निवेश इन बांड्स में कर सकेंगे।दूसरी प्रॉपर्टी में निवेश से बचतलांग टर्म प्रॉपर्टी गेन टैक्स से बचने का दूसरा तरीका है प्राप्त पूंजी को किसी दूसरी प्रॉपर्टी में निवेश करना। इस तरीके से टैक्स छूट हासिल करने के लिए कई शर्तें हैं। इनमें पहली है जो पॉपर्टी बेची गई है वह रेजिडेंशियल होनी चाहिए, कॉमर्शियल नहीं। कॉमर्शियल प्रॉपर्टी की स्थिति में आपको सेक्शन 54एफ का सहारा लेना पड़ेगा। इसके मुताबिक आपको बिक्री से प्राप्त शुद्ध प्राप्ति को निवेश करना होगा न कि केवल कैपिटल गेन अमाउंट। हां यहां रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी का मतलब यह नहीं है कि वह आपकी खुद की हो। रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी किराए पर ली गई भी हो सकती है। दूसरी शर्त के मुताबिक यह छूट व्यक्ति विशेष और हिंदू अधिनियम के तहत अविभाजित परिवार को ही मिल सकती है। ऐसे में यदि कोई कंपनी या हिस्सेदार फर्म प्रॉपर्टी बेचती है तो उसे यह छूट नहीं मिलेगी। करदाता को तैयार रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी या अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी या तो एक साल पहले या बिक्री से दो साल बाद तक खरीदनी होगी। अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी बिक्री के तीन साल बाद तक खरीदी जा सकती है। कंस्ट्रक्शन की शुरुआत को लेकर इसमें कोई प्रतिबंध नहीं है। इसके अलावा यह भी जरूरी नहीं है कि कैपिटल गेन अमाउंट और नए घर की कीमत के बीच कोई संबंध हो। उदाहरण के लिए करदाता प्रॉपर्टी बेचने से हासिल रकम को निवेश करने के बाद बाकी रकम के लिए लोन भी ले सकता है। यदि लोन की वैल्यू कैपिटल गेन के बराबर है तो टैक्स छूट मिल सकती है। यदि लोन वैल्यू कैपिटल गेन से कम है तो भी छूट लोन वैल्यू की हद तक मिल सकती है।तीन साल नहीं बेच सकते नई प्रॉपर्टीनए घर की बिक्री पर तीन साल का लॉक इन है। ऐसे में यदि तीन साल से पहले घर को बेचा गया तो पहले दी गई टैैक्स छूट वापस ले ली जाएगी। ऐसे में कैपिटल गेन टैक्स से बचने के लिए नई प्रॉपर्टी में निवेश के लिए दो से तीन साल का समय मिल जाता है। ऐसे में एक परेशानी है। किसी भी वित्त वर्ष में टैक्स रिटर्न की आखिरी तारीख 31 जुलाई है। ऐसे में यदि डील टैक्स रिटर्न की आखिरी तारीख से पहले नहीं हुई तो क्या होगा। ऐसे में करदाता को नए मकान के लिए रखी रकम को एक स्पेशल डिपॉजिट में रखना होता है जिसे कैपिटल गेन्स डिपॉजिट अकाउंट स्कीम (सी-डिपॉजिट) कहा जाता है। आमतौर पर यह सुविधा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देते हैं।

Monday, March 22, 2010

नशे में एक्सिडेंट पर इंश्योरेंस हो सकता है कम

अखबार में और टीवी पर आए दिन ऐसी खबरें पढऩे और देखने को मिलती हैं कि शराब के नशे में किसी ने लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी या दूसरी गाड़ी में टक्कर मार दी। हालांकि ऐसे मामलों के लिए मोटर व्हीकल एक्ट में कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। ऐसी स्थिति में यह जानना भी बहुत जरूरी हो जाता है कि शराब के नशे में एक्सिडेंट करने की स्थिति में इंश्योरेंस पर इसका क्या असर पड़ेगा। याद रखिए आपकी इंश्योरेंस पॉलिसी पर इसका सीधा असर पड़ता है। लाइफ इंश्योरेंस पर असरयदि हम लाइफ इंश्योरेंस पर पडऩे वाले असर की बात करें तो इसमें दो बातें गौर करने लायक हैं। पहली तो उस स्थिति में जिसने लाइफ इंश्योरेंस करवा रखा है और नशे की स्थिति में गाड़ी चलाते समय हादसे में उसकी मौत हो जाती है। दूसरी बात जो व्यक्ति इस हादसे में प्रभावित होता है। इस बारे में कई लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों से बात की गई और कई पॉलिसी डॉक्यूमेंट्स भी देखे। इनको देखने के बाद यह साफ है कि नशे की हालत में हादसे में मौत होने पर भी बुनियादी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत कवर मिलता है। हालांकि ज्यादातर मामलों में ऐसा देखा गया है कि यदि पॉलिसीधारक ने एक्सिडेंट इंश्योरेंस राइडर ले रखा था तो ऐसी स्थिति में नशे में ड्राइव कर रहे पॉलिसीधारक को राइडर का बेनिफिट नहीं मिलता है। नियम के मुताबिक एक्सिडेंट इंश्योरेंस राइडर में बीमाधारक को मूल इंश्योर्ड रकम के अतिरिक्त रकम मिलती है।थर्ड पार्टी को भुगतान मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी डॉक्यूमेंट्स के अध्ययन और जनरल इंश्योरेंस कंपनियों से बातचीत के मुताबिक एक्सिडेंट में प्रभावित थर्ड पार्टी (नशे में पॉलिसीधारक ने जिसको टक्कर मारी) चालक के नशे में होने के बावजूद क्षतिपूर्ति हासिल करने की हकदार है। हालांकि यह फैसला कोर्ट करता है कि प्रभावित तीसरी पार्टी को क्षतिपूर्ति का भुगतान इंश्योरेंस कंपनी करेगी या वाहन का मालिक। ऐसे ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनियों के बजाय गाड़ी मालिक से थर्ट पार्टी को नुकसान का हर्जाना देने को कहा है। ऐसे में जिस कार से टक्कर मारी गई उसके नुकसान की बात करें तो ड्राइवर के नशे में होने के चलते इंश्योरेंस कंपनी गाड़ी के नुकसान का खर्च नहीं देगी। ज्यादातर देशों में नशे में और ओवरस्पीड में गाड़ी चलाने पर न केवल लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है, बल्कि उस व्यक्ति का इंश्योरेंस प्रीमियम भी भविष्य में बढ़ा दिया जाता है, लेकिन भारत में कार इंश्योरेंस पॉलिसी ड्राइवर के नाम के साथ नहीं दी जाती हैं। ब्रिटेन में कार इंश्योरेंस का प्रीमियम ड्राइवर की उम्र और ड्राइविंग रिकॉर्ड पर निर्भर करता है। यदि एक्सिडेंट ऐसे व्यक्ति ने किया है जिसका नाम इंश्योरेंस पॉलिसी में नहीं है तो नामित को कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। भारत में यह संभव नहीं है क्योंकि यहां यह पता लगाना भी संभव नहीं है कि हादसे के समय गाड़ी कौन चला रहा था। यह खबर आपने भी सुनी होगी कि बांद्रा में एक फिल्म स्टार ने शराब के नशे में लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी थी, लेकिन अभियोजन पक्ष अभी तक यह साबित नहीं कर पाया कि गाड़ी कौन चला रहा था। ऐसे में यहां पर कुछ ड्राइवरों की गलती से जो नशे में ड्राइविंग करते हैं होने वाले नुकसान का बोझ सभी को मिलकर उठाना पड़ता है। ऐसे में ट्राफिक पुलिस को ज्यादा अधिकार दिए गए हैं ताकि नशे में गाड़ी चलाने के खिलाफ सख्त कदम उठाकर ऐसे हादसों को रोकें। इसलिए आगे से जब आप भी किसी पार्टी से निकलें तो इस बात का ख्याल रखें कि नशे में यदि कोई हादसा आपके साथ हो गया तो इसका सीधा असर आपके इंश्योरेंस पर पडऩे वाला है।

Thursday, March 18, 2010

80 सी के अलावा भी हैं इनकम टैक्स बचाने के मौके

ज्यादा से ज्यादा टैक्स सेविंग के लिए ज्यादातर लोग आयकर की धारा 80 सी के तहत दिए गए निवेश विकल्पों की ओर दौड़ते हैं। हालांकि 80 सी की भी एक सीमा है और उसके तहत आप केवल एक लाख रुपये पर ही टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। ऐसे में 80 सी के अलावा कहां बचत की जा सकती है इस पर गौर करना फायदेमंद होगा। धारा 80 सी के तहत आप नीचे दी गई स्कीमों में निवेश कर टैक्स बचत कर सकते हैं: प्रोविडेंट फंड (पीएफ)वॉलेंटरी प्रोविडेंट फंड (वीपीएफ)पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ)नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट्स (एनएससी)इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ईएलएसएस)सीनियर सिटीजंस सेविंग्स स्कीम (एससीएसएस)लाइफ इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स आदिआप अपनी आय से इन योजनाओं में निवेश करते हैं तो उस पर टैक्स छूट पा सकते हैं। लेकिन इस सेक्शन के तहत एक लाख रुपये पर ही टैक्स छूट मिल सकती है ऐसे में आप अधिकतम 30,000 रुपये की बचत ही कर सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 80 सी के अलावा भी टैक्स बचाने के मौके हैं? हां! विकल्प हैं और उनके जरिए काफी टैक्स की बचत की जा सकती है। 80 सी के तहत आने वाली टैक्स छूट अध्याय 6-ए के तहत आती हैं। इसके अलावा भी कई डिडक्शन उपलब्ध हैं जिनके तहत आप छूट का दावा कर सकते हैं। इनमें से सभी डिडक्शन तो आप पर लागू नहीं होंगे, लेकिन कुछ जरूर होंगे जिनसे आप फायदा उठा सकते हैं। सेक्शन 80 डी यदि कोई विकलांग व्यक्ति आप पर निर्भर है तो उस पर होने वाले मेडिकल सहित अन्य खर्च पर आप टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। उस विकलांग व्यक्ति के लिए यदि आप कोई इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदते हैं तो उस पर भी टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं। सेक्शन 80 डीडीबीइसके तहत कुछ खास बीमारियों के इलाज पर किए गए खर्च पर टैक्स छूट का दावा आप कर सकते हैं। चाहे खर्च खुद के इलाज पर किया गया हो या अपने किसी संबंधी पर। सेक्शन 80 ईउच्च शिक्षा के लिए लिए गए लोन के सालभर में किए गए भुगतान के ब्याज पर टैक्स छूट आप हासिल कर सकते हैं। लोन भले ही आपने अपने लिए या संबंधी के लिए लिया हो। सेक्शन 80 जीयदि आप परोपकारी हैं तो चैरिटेबल ट्रस्ट और कुछ सरकारी फंड्स में दान करने पर भी आप टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं। कुछ निश्चित सरकारी फंड््स और चैरिटेलब संस्थाओं को डोनेट (दान) करने पर डोनेशन की रकम पर टैक्स छूट मिलती है। डोनेशन की रकम पर पूरी या कुछ फीसदी छूट मिलती है।सेक्शन 80 जीजीयदि आप घर का किराया चुकाते हैं, लेकिन वेतन के हिस्से के रूप में आपको हाउस रेंट अलाउंस (एचआरए) नहीं मिलता है। या फिर आप खुद का बिजनेस करते हैं और किराए के घर में रहते हैं तो आप किराए की रकम पर टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं। हालांकि इस पर कुछ शर्तें लागू होती हैं। सेक्शन 80 यूऐसा व्यक्ति जो खुद विकलांग है वह आयकर की धारा 80यू के तहत आयकर में छूट हासिल कर सकता है।एचआरए पर टैक्स छूटअध्याय 6-ए के अलावा भी आयकर बचाने के कई और रास्ते हैं। यदि आप वेतनभोगी हैं और एचआरए पाते हैं। ऐसे में यदि आप किराए के मकान में रहते हैं तो एचआरए पर एक निश्चित सीमा तक कुछ शर्तों के साथ टैक्स छूट हासिल की जा सकती है। एलटीए और एलटीसी पर टैक्स छूटयदि आप वेतनभोगी हैं और आपको कंपनी की ओर से लीव ट्रेवल अलाउंस (एलटीए) और लीव ट्रेवल कंसेशन (एलटीसी) मिलता है तो आप एक निश्चित सीमा तक और कुछ शर्तों के साथ इस पर आयकर छूट पा सकते हैं।होम लोन के ब्याज पर छूटयदि आपने घर के लिए बैंक से लोन लिया है और उसकी ईएमआई चुका रहे हैं तो चुकाई गई रकम के ब्याज पर टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं। ऐसे में आयकर बचाने के लिए आपके पास बहुत सारे रास्ते हैं। सेक्शन 80 सी तो उनमें से केवल एक है।—

Friday, March 12, 2010

आंवले की प्रोसेसिंग से करें कमाई

लगातार बढ़ते आयुर्वेद के महत्व के साथ ही आंवला और इसके उत्पादों का बाजार भी बढ़ रहा है, जिसके चलते आवंला प्रसंस्करण श्रेत्र में रोजगार की संभावनाएं बनी हैं। इस समय उत्तर प्रदेश के कई इलाकों (मुख्य तौर पर प्रतापगढ़) में आवंला प्रसंस्करण एक घरेलू उद्योग का रूप ले चुका है। देश के दूसरे भागों में भी बेहद कम निवेश में आवंला प्रसंस्करण की इकाइयां आसानी से लगाईं जा सकती हैं। अभी मप्र में करीब 10 हजार हेक्टेयर में आंवला की खेती की जा रही है। आवंला की प्रोसेसिंग कर इसका मुरब्बा, जैम, जैली, मीठी केंडी, नमकीन केंडी, सुपारी, आचार, चटनी, लड्डू, बरफी, टॉफी, बिस्किट, जूस, शरबत, स्कैवश जैसे फ्रूट प्रोडक्ट बनाए जा सकते हैं। वहीं हेयर शैम्पू, हेयर ऑयल, हेयर डाई, फेसपैक के रूप में सौंदर्य प्रसाधन भी तैयार किए जा सकते हैं। इसके अलावा औषधीय गुण होने के कारण आंवला के कई औषधीय उत्पाद भी बन सकते हैं। जिनमें च्यवनप्राश, आमलकी रसायन, त्रिफला पावडर, ब्रम्ह रसायन, आमलकी अवलेह, धान्नी लोह, आमलकी घृत सहित कई अन्य औषधियां बनाई जा सकती हैं। साथ ही साथ आंवले से आंवला पल्प, स्याही, साबुन भी बनाए जा सकते हैं। आंवले के फ्रूट प्रोडक्ट बनाने के लिए जहां फ्रूट प्रोडक्ट आर्डर (एफपीओ) प्रमाण पत्र लेना पड़ता है। वहीं औषधीय उत्पादों के लिए ड्रग लाइसेंस जरूरी है। आंवला प्रसंस्करण की छोटी इकाई लगाने के लिए करीब पांच लाख रुपये की जरूरत होती है। वहीं घरेलू उद्योग के रूप में बिना किसी निवेश के भी आंवले का प्रसंस्करण किया जा सकता है। छोटी प्रसंस्करण इकाई के लिए बॉयलर, ग्रेटर, हाइड्रोलिक प्रेस, केबिन ड्रायर, पैकिंग मशीन आदि उपकरणों की जरूरत होती है, जबकि घरेलु उद्योग के लिए कड़ाई, टब, गैस अथवा लकडिय़ों का चूल्हा सहित अन्य घरेलू उपकरण इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसके अलावा बड़े स्तर पर आंवला प्रसंस्करण प्रोजेक्ट लगाने के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण रोजगार योजना के तहत 25 लाख रुपये तक ऋण भी लिया जा सकता है। जिसमें सामान्य वर्ग के उद्यमी को 10 प्रतिशत राशि खुद लगानी होती है, वहीं सरकार 25 प्रतिशत सब्सिडी देती है। महिला, एससीएसटी, ओबीसी वर्गों के लिए 5 प्रतिशत राशि खुद वहन करनी होगी, वहीं इस ऋण में सरकार से उन्हें 35 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है।

कम उम्र में बचत शुरू करने के फायदे

हममें से बहुत से लोग निवेश शुरू करने की योजना को टालते रहते हैं। ऐसा करने पर शायद हम यह भूल जाते हैं कि कम उम्र में निवेश शुरू करने के बहुत सारे फायदे होते हैं। जल्दी निवेश शुरू करने से उस पर मिलने वाला कंपाउंड (चक्रवृद्धि) ब्याज और नियमित निवेश जीवन के दूसरे पड़ाव के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण साबित होता है। ऐसे में थोड़ा ही सही लेकिन नियमित निवेश शुरू करने में देरी नहीं करनी चाहिए। जल्द निवेश का फायदा यह होता है कि यह लगातार बढ़ता रहता है और यह एक बड़ी रकम का रूप ले लेती है। उदाहरण के लिए मानो आपने अपने रिटायरमेंट के लिए वर्ष 2008 में निवेश शुरू किया। यदि आप एक लाख रुपये सालाना निवेश करते हैं और इस पर 15 फीसदी सालाना रिटर्न मिलता है तो 2038 तक आपका निवेश 4.35 करोड़ रुपये की भारी रकम का रूप ले लेगा। लेकिन यदि आपने इसमें दो साल की भी देरी की और वर्ष 2010 से निवेश शुरू किया तो 2038 में आपके हाथ में केवल 3.27 करोड़ रुपये ही होंगे। यानी आपको केवल दो साल की देरी की वजह से 1.08 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ जाएगा। यही नहीं आप केवल एक साल की भी देरी करते हैं तो तब आपकी रकम 3.77 करोड़ रुपये ही बनती है यानी 58 लाख रुपये का नुकसान। ये 58 लाख रुपये और कुछ नहीं हैं बल्कि आपके निवेश पर हासिल होने वाला 15 फीसदी रिटर्न ही है। छोटी बचत वालों पर भी यह बात उतनी ही लागू होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बाद के सालों में आप कंपाउंडिंग इंटरेस्ट का फायदा नहीं ले पाते हैं। नीचे एक टेबल दी गई है जिसकी मदद से आप आसानी से समझ पाएंगे कि कैसे एक लाख रुपये विभिन्न ब्याज दरों और सालों में बढ़ता रहता है। दो केस स्टडीज से हम देखेंगे कि जल्दी निवेश कैसे फायदेमंद रहता है। स्टडी-1.रॉबर्ट और अजय ने अपना कैरियर एक साथ 23 साल की उम्र में शुरू किया। केस.1 (अजय)अजय कम उम्र में निवेश शुरू करने के महत्व को समझता था और उसने 25 साल की उम्र में 50,000 रुपये सालाना निवेश शुरू कर दिया। 10 फीसदी सालाना रिटर्न के हिसाब से 10 वें साल के आखिर तक उसके पास 7.97 लाख रुपये की पूंजी जमा हो चुकी थी। यह सालाना ब्याज पर आधारित है न कि कंपाउंड पर। इसके बाद उसने 65 की उम्र तक कोई निवेश नहीं किया और केवल 7.97 लाख रुपये पहले 10 साल में बचाए तो बढ़ते रहे। जब 65 साल का हुआ तो उसके पास एक करोड़ 40 लाख रुपये थे। केस.2 (रॉबर्ट)रॉबर्ट ने पहले खूब खर्च किया और शुरुआती सालों में बचत पर ध्यान नहीं दिया। जब वह 35 साल का हुआ तो उसने निवेश शुरू किया और अगले 30 साल तक 50,000 रुपये सालाना बचाता रहा, जब तक वह 65 साल का हो गया। उसे भी निवेश पर सालाना 10 फीसदी रिटर्न मिला। ऐसे में रॉबर्ट ने अजय के मुकाबले 20 साल ज्यादा निवेश भी किया फिर भी उसके हाथ में 65 की उम्र में केवल 82.2 लाख रुपये थे जो अजय से 43 फीसदी कम हैं।इसे ऐसे समझा जा सकता है- 'एनÓ सालों के बाद 'एÓ अमाउंट 'आईÓ फीसदी की दर से निवेश तो रिटर्न होगा क्र्रस्*[(१+क्रद्बस्)क्रट्टस् क्रठ्ठस्-१]/क्रद्बस्केस स्टडी 2मानो 100 साल बाद रॉबर्टगंज का रॉबर्ट और हरियाणा के अजय का पुनर्जन्म होता है। इस बार रॉबर्ट एक्सट्रा स्मार्ट है और अजय एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। दोनों की उम्र 25 साल हो गई है और वे 60 की उम्र में रिटायर होना चाहते हैं। दोनों अच्छी कमाई करते हैं (एक लाख रुपये सालाना तक निवेश कर सकते हैैं) जिस पर 12 फीसदी सालाना रिटर्न मिल सकता है।केस.1रॉबर्ट जल्दी निवेश शुरू करता है और अगले 10 साल तक एक लाख रुपये सालाना बचाता है और रिटर्न के साथ यह एक अच्छी रकम हो जाती है। इसे वह अपने रिटायर होने तक के लिए निवेश कर देता है। वह अगले 20 साल के लिए भी निवेश कर सकता है, लेकिन अब वह अपने एक लाख रुपये को हर साल घूमने-फिरने पर खर्च करता है। केस.2अजय सोचता है कि रॉबर्ट ईडियट है। वह अपनी लाइफ को एंजॉय नहीं कर रहा है। अगर वह पांच साल बाद निवेश शुरू करेगा तो क्या बिगड़ जाएगा। उसका मानना है कि कुछ साल तो एंजॉय करना ही चाहिए। केस.2.1पांच साल बाद अजय एक लाख रुपये सालाना निवेश शुरू करता है। पांच साल बाद वह देखता है कि रॉबर्ट तो निवेश बंद कर लाइफ को एंजॉय कर रहा है। तो वह भी ऐसा ही करता है। वह भी निवेश रोक देता है। केस.2.2पांच साल बाद अजय निवेश शुरू करता है और सोचता है कि वह रिटायर होने तक अगले 30 साल निवेश करेगा। आखिर में वह रॉबर्ट से ज्यादा धन 12 फीसदी रिटर्न पर चाहता है।केस 2.1: अजय के पास रिटायर होते समय कितना पैसा होगा? 66 लाख रुपये। केस.2.2: में अजय को कितना हासिल होगा-1.64 करोड़ रुपये। और रॉबर्ट, पहले 10 साल तक निवेश कर अगले 20 साल तक एंजॉय करने पर उसके पास रिटायरमेंट के समय 1.72 करोड़ रुपये होंगे। यानी जल्द निवेश शुरू करने वाले को कोई नहीं पहुंच सकता।

फायदेमंद है न्यू पेंशन स्कीम

पिछले महीने पेश किए गए आम बजट में सरकार ने न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) की ओर लोगों को लुभाने की कोशिश की है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपनी घोषणा में कहा कि नया एनपीएस अकाउंट खुलवाने पर सरकार तीन साल तक 1,000 रुपये सालाना का योगदान देगी यानी आपके एनपीएस खाते में सरकार तीन साल तक एक-एक हजार रुपये जमा करेगी। ऐसे में सभी के लिए यह समझना जरूरी हो जाता है कि एनपीएस अकाउंट क्या है, आम निवेशकों के लिए इसका क्या महत्व है और इसके क्या फायदे हैं।पीएफआरडीए की स्कीम सरकार ने साल 2003 में पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (पीआरएफडीए) का गठन किया था। पीआरएफडीए इस समय देश में पेंशन सुधारों और नियमन के लिए नियामक की भूमिका निभाता है। एक मई 2009 तक इसकी भूमिका राज्यों और केंद्र के कर्मचारियों द्वारा जमा पेंशन को रेगुलेट करने की थी। इसके बाद जनवरी 2004 के बाद नौकरी शुरू करने वाले कर्मचारियों के लिए सरकार ने पेंशन का मार्केट लिंक्ड सिस्टम पेश करने की योजना बनाई। आम लोगों के लिए इस पेंशन स्कीम को 1 मई 2009 से खोल दिया गया।कैसे खोलें खाता एनपीएस अकाउंट स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एक्सिस बैंक, आईडीबीआई, सेंट्रल बैंक और यूनियन बैंक आदि में जाकर 18 से 55 साल का कोई भी व्यक्ति खुलवा सकता है। यह खाता खुलवाले के लिए शुरुआती शुल्क (इसमें पहले साल का वार्षिक रखरखाव शुल्क भी शामिल है ) 470 रुपये लगता है। दूसरे साल का एनुअल मैंटीनेंस चार्ज (एएमसी) 350 रुपये लिया जाता है। इस खाते में एक साल में कम से कम ४ सब्सक्रिप्शन करना और 6,000 रुपये डालना जरूरी है। हर ट्रांजेक्शन पर 10 रुपये शुल्क लिया जाएगा। रिकॉर्ड का रखरखाव करने वाली एजेंसी के लिए भी शुल्क वसूला जा सकता है जो अकाउंट बैलेंस का .0165 फीसदी हो सकता है। एनपीएस अकाउंट का रखरखाव सेंट्रल रिकॉर्ड कीपिंग एजेंसी एनएसडीएल कर रही है।उम्र के हिसाब से निवेशइस पेंशन स्कीम में निवेश के दो विकल्प होते हैं। या तो सेविंग्स को ऑटो मोड में रखा जा सकता है। इसके तहत निवेश को उम्र के मुताबिक लार्ज कैप इंडेक्स वाले स्टॉक्स में रखा जाता है। जैसे 35 साल की उम्र तक 50 फीसदी और आगे 55 की उम्र तक 10 फीसदी निवेश इसमें किया जाता है। या फिर नीचे दिए तीन फंड्स में से आप खुद चुन सकते हैं। विकल्प ई- एग्रेसिव फंड, जिसमें 50 फीसदी निवेश लार्ज कैप इंडेक्स के स्टॉक्स में किया जाए और 50 फीसदी बांड में लगाया जाए। विकल्प-सी इसमें मॉडरेट फंड होते हैं, जिसके तहत कॉरपोरेट और सरकारी बांड्स में निवेश किया जाता है। इसके अलाव तीसरा विकल्प-जी के तहत कंजरवेटिव फंड होते हैं जिनके तहत राज्यों और केंद्र सरकार के बांड्स में निवेश किया जाता है। इस स्कीम में आपकी उम्र 60 साल होने तक इनमें से किसी भी फंड में निवेश रहता है और इसके बाद अंतिम बैलेंस का 60 फीसदी आप निकाल सकते हैं और बाकी 40 फीसदी आपकी पेंशन के लिए चला जाता है।60 से पहले निकासी इसमें 60 साल की उम्र होने से पहले भी आप पैसा निकाल सकते हैं, लेकिन इस पर काफी कड़े प्रतिबंध हैं और बहुत जरूरी कारण होने पर ही पैसा निकालने की इजाजत दी जाती है। ऐसे में यदि 60 साल की उम्र होने से पहले ही इसमें से कुछ पैसा निकाल लिया जाता है तो 60 साल उम्र होने पर कुल जमा रकम में से आप केवल 20 फीसदी ही निकाल पाएंगे और बाकी 80 फीसदी रकम पेंशन के लिए चली जाएगी।आसान जमा, टैक्स छूट का फायदा भीएनपीएस में हर साल कम से कम 6,000 हजार रुपये जमा करने होंगे और नए बजट में की गई घोषणा के मुताबिक अगले वित्त वर्ष में नए अकाउंट खुलवाने वालों के खाते में पहले तीन साल तक हर साल 1,000 रुपये सरकार जमा करेगी। खाते में 12,000 रुपये के सालाना जमा पर 1,000 रुपये की टैक्स छूट भी 80सी के तहत हासिल की जा सकती है। यह छूट निवेश के समय ही मिल सकती है। इस निवेश पर हासिल होने वाले रिटर्न पर भी टैक्स छूट मिलती है, लेकिन अंतिम समय पैसे निकाले पर टैक्स लगेगा, क्योंकि तब इसे इनकम में गिना जाएगा। बजट में केंद्र सरकार ने इस न्यू पेंशन स्कीम को लोकप्रिय करने की कोशिश की है क्योंकि आम भारतीयों के पास सामाजिक सुरक्षा के नाम पर कुछ भी नहीं है। हालांकि सरकार की ओर से जमा रूपी सहयोग की यह घोषणा फिलहाल वित्त वर्ष 2010-11 के लिए ही की गई है।

Tuesday, March 9, 2010

बजट और बैंकों की मार ने तोड़ा घर का सपना

अपना घर खरीदने की तैयारी कर रहे लोगों को अपनी योजना बदलनी पड़ सकती है। हफ्ते भर पहले आए बजट में घर के सपने को कुछ झटका लगा है। बजट में घर की निर्माण लागत पर 10 फीसदी सर्विस टैक्स लगाया गया है। साथ ही बैंकों से सस्ती दर पर होम लोन का दौर भी अब समाप्त होने लगा है। ज्यादातर बैंक होम लोन की दरों में 0.25 से 0.50 फीसदी की बढ़ोतरी कर रहे हैं। ऐसे में 20 साल के लिए 20 लाख रुपये का नया होम लोन लेने वालों को मासिक किस्त (ईएमआई) के रूप में करीब 633 रुपये ज्यादा चुकाने पड़ेंगे। पहले लोन ले चुके लोगों को जहां 20 साल के लोन पर 17,041 रुपये की मासिक किस्त चुकानी पड़ रही है। वहीं अब लोन लेने वालों को 17,674 रुपये चुकाने होंगे। दो-तीन महीने में फिर बढेंग़ी दरेंघर खरीदने के सपने एक और बड़ा झटका अप्रैल के बाद कभी भी और लग सकता है। बैंकर्स का कहना है कि अप्रैल में रिजर्व बैंक अपनी अगली मौद्रिक नीति समीक्षा पेश करेगा। इसके बाद बैंक होम लोन की ब्याज दरों में 0.25 फीसदी से 0.50 फीसदी की बढ़ोतरी और कर सकते हैं। इसके बाद घरों की बिक्री में भी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। मुंबई के कुछ डेवलपर्स का तो कहना है कि अभी से घरों की इंक्वायरी में गिरावट आई है। रियल एस्टेट कंसल्टेंट एंड प्रॉपरिएटर अशोक नारंग ने के मुताबिक मुंबई में पिछले एक सप्ताह में प्रॉपर्टी की बिक्री और इंक्वायरी में 50 फीसदी तक की गिरावट आई है। वहीं, नाहर गु्रप के चेयरमैन सुखराज नाहर का कहना है कि निर्माण सामग्री पर बढ़ाए गए उत्पादन और सेवा कर से पस्त हो गए हैं। निर्माण सामग्री पर करों का बोझ बढऩे से घर महंगे हो गए हैं और वे अफोर्डेबल नहीं रह गए हैं। साथ ही बैंक भी होम लोन पर दरें बढ़ा रहे हैं। ऐसे में दोनों तरफ से अपने को घिरता देखकर ग्राहक घर खरीदने की योजना टाल सकते हैं। अगले दो महीनों में इसका असर जरूर दिखेगा, क्योंकि तब तक सर्विस टैक्स प्रभावी हो चुका होगा। बैंकों की ओर से होम लोन दरों में बढ़़ोतरी से ग्राहकों के लिए घर कम से कम 10 फीसदी और महंगा हो जाएगा।होम लोन पर सख्त हुए बैंकहोम लोन दरों पर बैंकों के सख्त रुख से घर खरीदने का फैसला और भी कठिन हो गया है। गुुरुवार को ही निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंकों आईसीआईसीआई और एचडीएफसी ने अपनी टीजर होम लोन की स्कीमों को खत्म करने की घोषणा की है, जिनके तहत शुरुआती वर्षों में होम लोन की ब्याज दरें कुछ कम 8 से 8.25 फीसदी थीं। कोटक महिंद्रा बैंक भी होम लोन की दरों में बढ़ोतरी की घोषणा कर चुका है। कुछ सप्ताह पहले दो अन्य बैंकों ने टीजर होम लोन दरें वापस ले ली थीं। महंगाई को काबू में करने के लिए रिजर्व बैंक ने पिछले महीने मौद्रिक नीति समीक्षा में सीआरआर को 0.75 फीसदी बढ़ाकर 5.75 फीसदी कर दिया था। ऐसे में बैंकों ने भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी के संकेत देेने शुरू कर दिए। होम लोन लेने वाले सभी नए ग्राहकों को अब 0.25 से 0.50 फीसदी तक अतिरिक्त ब्याज देना होगा। पहले दो साल के लिए 8.25 फीसदी की फिक्स्ड रेट पर दी जा रही होम लोन की सुविधा को 27 फरवरी से समाप्त कर दिया है। वहीं, आईसीआईसीआई बैंक के प्रवक्ता ने कहा कि दो साल के लिए फिक्स्ड रेट पर होम लोन की स्कीम को एक मार्च 2010 से समाप्त कर दिया गया है। फिलहाल होम लोन की फ्लोटिंग रेट 30 लाख रुपये तक 8.75 फीसदी, 30 से 50 लाख रुपये तक 9 फीसदी और 50 लाख रुपये से ज्यादा पर 9.5 फीसदी है। बैंकर्स का कहना है कि अन्य बैंक भी जल्द ही इसी तरह के कदम उठा सकते हैं। एक्सिस बैंक और यूनियन बैंक भी विशेष होम लोन सुविधा को बंद करने की घोषणा कर चुके हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने नवंबर में विशेष दरों को 31 मार्च 2010 तक बढ़ा दिया था। हालांकि एसबीआई के प्रवक्ता से इस पर प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। बैंक ऑफ इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बी.ए.प्रभाकर ने कहा कि 8 फीसदी पर होम लोन की विशेष सुविधा फरवरी आखिरी तक थी और इसे बढ़ाने की बैंक की कोई योजना नहीं है। हालांकि मार्च के अंत या अप्रैल तक दरें बैंक संभवत नहीं बढ़ाएगा।

Friday, March 5, 2010

उपयुक्त फंड चुनने के लिए अपनाएं कुछ फंडे

म्यूचुअल फंड्स तेजी से खुदरा निवेशकों के लिए इंवेस्टमेंट व्हीकल के रूप में लोकप्रिय हो रहे हैं। लेकिन अब भी उपयुक्त फंड चुनना निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन यह काम ज्यादा कठिन नहीं है। अपना वित्तीय भविष्य सुरक्षित करने के लिए निवेशकों को केवल थोड़ा सा अनुशासन और समय खर्च करना पड़ेगा। कुछ नियमकों को अपना कर सही निवेश किया जा सकता है और आसानी से वित्तीय लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।अपने बारे में पूरी तरह जानेंअपना वित्तीय लक्ष्य हासिल करने के लिए सबसे जरूरती और पहला काम है अपने आप के बारे में पूरी तरह जानना। इस बात का अनुमान लगाने की कोशिश कीजिए कि आप कितना रिस्क उठा सकते हैं। अपनी सहनशीलता का परीक्षण कीजिए। यदि आपने 10,000 रुपये का निवेश किया और बाजार गिरने से यह घटकर 6,000 रुपये ही रह गया तो आप विचलित हो उठते हैं और तनाव में आ जाते हैं। भले ही यह बढ़कर वापस अपने पहले स्तर पर आ जाता है, लेकिन इससे यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि आक्रामक यानी ज्यादा रिस्की इक्विटी फंड में निवेश आपको नहीं करना चाहिए।वास्तविकता से दूर न होंआपका लक्ष्य क्या है? यदि आप अपने 10,000 रुपये के निवेश को दो साल में 50,000 रुपये करना चाहते हैं तो एक मध्यम अवधि वाला बांड फंड आपके लिए सही नहीं है। इसलिए अपने लक्ष्यों और अपने फंड के लिए वास्तविकता में रहते हुए अपनी उम्मीदें तय कीजिए।जानिए, आप क्या खरीद रहे हैंजब आपने अपने बारे में जान लिया यानी अपनी क्षमताओं को परख लिया तो फंडों को नजदीक से जानने पर थोड़ा समय खर्च कीजिए। बहुत से फंडों के प्रोस्पेक्टस में दिया गया उद्देश्य काफी अधूरा सा होता है और वास्तविकता से मेल नहीं खाता है। सहज रूप से उपलब्ध पोर्टफोलियो और फंड मैनेजरों की समीक्षा के आधार पर आप फंड्स की कार्यशैली और रणनीति को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। इससे आपको अपना पोर्टफोलियो सार्थक रूप से डाइवर्सिफाई करने में मदद मिलेगी। इससे आपको संभावित रिस्क को आंकने में भी मदद मिलेगी। आमतौर पर लार्ज कैप वाले वैल्यू फंड्स कम रिस्की होते हैं जबकि स्मॉल कैप वाले ग्रोथ फंड्स ज्यादा रिस्क वाले होते हैं।सेक्टर की क्षमता का मूल्यांकन करेंआपको इस बात की जानकारी जरूर रखनी चाहिए कि जिन फंड्स ने अपनी ज्यादातर पूंजी एक या दो सेक्टर्स के शेयरों में लगा रखी है उनमें ज्यादा उतार चढ़ाव होगा। पूरी तरह से डाइवर्सिफाइड फंडों में यह खतरा कम होता है। फंड का सेक्टोरल इतिहास देखने से आपको फायदा होगा। क्या फंड मैनेजर किसी सेक्टर में जल्दी-जल्दी घुस और बाहर हो रहे हैं। यदि ऐसा है तो उस फंड में निवेश से आपको घाटा उठाना पड़ सकता है, यदि मैनेजर ने कोई गलत कदम उठा लिया।पोर्टफोलियो है महत्वपूर्ण एक ऐसा पोर्टफोलियो जो 20 या 30 स्टॉक ही रखता है और उनमें से भी कुछ में ही ज्यादातर निवेश करता है उसमें उतार-चढ़ाव या कहें कि रिस्क उस फंड के मुकाबले ज्यादा होता है जिसका पोर्टफोलियो 100 से भी ज्यादा शेयरों तक फैला है। लेकिन इस कंसेंट्रेशन का फायदा भी मिल सकता है यदि ये शेयर मार्केट में जोर दिखाते हैं तो रिटर्न भी ऐसे पोर्टफोलियो में ज्यादा होगा। ऐसे में आप अपने पोर्टफोलियो में एक कंसेंट्रेटेड फंड भी जोड़ सकते हैं। ऐसे फंड जो 10 या 20 शेयरों में ही अपना ज्यादातर निवेश करते हैं। लेकिन बड़े स्तर पर आपके कोर फंड्स अच्छी तरह से डाइवर्सिफाइड होने चाहिए जिनके बारे में सही अनुमान भी लगाया जा सके। ऐसे में थोड़े से शेयरों में ज्यादा निवेश करने वाला फंड आपके निर्टन को बढ़ा सकता है, लेकिन पूरी तरह से डायवर्सिफाइड फंड आपका रिस्क कम करने में मदद करेगा। फंड के प्रदर्शन की सही समीक्षा करेंध्यान रखें, फंड का पिछला प्रदर्शन भविष्य के अच्छे परिणाम की गारंटी नहीं है। निवेशकों को इस बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिए। यह बात आपको अपने बैंक अकाउंट नंबर से भी ज्यादा अच्छे से याद होनी चाहिए। किसी भी फंड में निवेश करते समय जरूरत अपने आप में इस बात को दोहराना चाहिए। क्योंकि हो सकता है कि कुछ महीनों की तेजी के बाद गिरावट का दौर आने वाला हो और आपको झटका लग जाए। वर्ष 2000 में आईसीई के कंसेंट्रेटेड फंडों के साथ ऐसा हो चुका है। इस बात का भी ख्याल रखें कि शॉर्ट टर्म रिटर्न पर फोकस न करें। जब फंड चुनना हो तो उसके तिमाही दर दिमाही और साल दर साल के प्रदर्शन को देखें।अपने पोर्टफोलियो को समझेंयदि आपका पोर्टफोलियो लार्ज कैप के शेयरों पर ज्यादा ही केंद्रित है। ज्यादा रिटर्न देने वाले लेकिन रिस्की शेयरों पर केंद्रित है। ऐसे में स्मॉल कैप वाले शेयरों पर भी आपको ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा एक अनुशासित निवेशक बनने की भी जरूरत है। एक बार फंड चुन लिया तो उसके साथ रहिए और आगे जाने से डरिए मत।

Tuesday, March 2, 2010

सोया प्रोसेसिंग में भी आजमाएं हाथ

सेहत के लिए फायदेमंद होने के कारण डीओसी और तेल के अलावा भी सोया प्रोसेसिंग से तैयार उत्पादों का बाजार दिन पर दिन बढ़ रहा है। इन उत्पादों में सोया दूध, पनीर, दही, लस्सी, सोया दाल, सोया आटा एवं इसके बेकरी उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। इस आधार पर सोयाबीन प्रोसेसिंग में उद्योगों के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं।बड़े उद्योगपतियों के साथ ही छोटे उद्यमियों के लिए भी इस क्षेत्र में आगे बढऩे के लिए अभी पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। विशेषज्ञों के अनुसार न्यूनतम 2 लाख रुपये का निवेश कर प्रतिदिन (8 घंटे की शिफ्ट) एक क्विंटल सोया आटा उत्पादन किया जा सकता है। इससे उत्पादन में साल भर में 10-11 लाख रुपये तक कारोबार किया जा सकता है। जिसमें सवा से डेढ़ लाख रुपये तक का मुनाफा कमाया जा सकता है। इसी तरह सोया दूध, पनीर, दही, लस्सी या इससे जुड़े अन्य उत्पादों के लिए लगभग 3 लाख रुपये का निवेश कर आठे घंटे की शिफ्ट में प्रतिदिन 50 किलो पनीर (टोफू) का उत्पादन होता है। मौजूदा बाजार भाव 50 किलो प्रतिदिन की उत्पादन क्षमता के साथ 5 लाख रुपये तक का सालाना कारोबार किया जा सकता है। जिसमें से एकसे सवा लाख रुपये का लाभ शामिल रहता है। इसी तरह बिस्किट अथवा बेकरी उत्पाद की छोटी इकाई लगाने के लिए न्यूनतम 1 लाख रुपये लगाकर आठ घंटे की शिफ्ट में प्रतिदिन 50 किलो बिस्किट बनाए जा सकते हैं। जिसमें सामान्यत: छह से सात लाख रुपये का सालाना कारोबार होने पर एक लाख रुपये का सीधा फायदा उद्यमी को होता है। इसी तरह सभी इकाइयों में निवेश के अनुपात में उत्पादन, सालाना कारोबार और मुनाफे की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। इन्हीं इकाइयों में सोया सॉस सहित सोयाबीन के अन्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं।इनकी स्थापना के लिए केन्द्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ लिया जा सकता है। वहीं मप्र की राजधानी भोपाल स्थित सोयाबीन प्रसंस्करण एवं उपयोग केन्द्र, केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान द्वारा नाममात्र का शुल्क लेकर सोया दूध, सोया पनीर, सोया आटा सहित अन्य बेकर उत्पाद, स्नेक्स, सोया पोहा, सोया श्रीखंड, सोया आइसक्रीम, सोया सत्तू, सोया बड़ी सहित अन्य उत्पादों से संबंधित इकाई लगाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण एवं जानकारी दी जाती है। संस्थान द्वारा इसके लिए सालभर में 12 बैचों के अंतर्गत प्रशिक्षण दिया जाता है।खास बात यह है कि देश केकु ल सोयाबीन उत्पादन में मप्र करीब 76 प्रतिशत भागीदार के साथ पहले नंबर पर है। सोयाबीन अन्य अनाजों की तुलना में मानव स्वास्थ्य के लिए विशेष तौर पर अधिक पौष्टिकमाना जाता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 40 प्रतिशत होती है, जो कि अन्य अनाजों की तुलना में ज्यादा है। इन सबके बावजूद भी मप्र में तेल और डीओसी के अलावा अन्य खाद्य उत्पाद बनाने वाली इकाईयों की संख्या बेहद कम है। मप्र में इस समय सोयाबीन प्रसंस्करण आधारित इकाइयों की संख्या महज 21 के आसपास है। वहीं पंजाब में 70, दिल्ली में 30, आंध्रप्रदेश में 25, महाराष्ट्र में 25 सहित पूरे भारत में कुल मिलाकर 225 इकाइयां ही सोया दूध एवं बेकरी के अन्य उत्पाद बना रही है।

Wednesday, February 24, 2010

जानें पीपीएफ अकाउंट के क्या हैं फायदे और कैसे खुलवाएं खाता

पीपीएफ यानी पब्लिक प्रोविडेंट फंड अकाउंट के बारे में बहुत सारे लोगों को पूरी जानकारी नहीं होती है। यकीन मानिए इसके बहुत सारे फायदे हैें और हर वर्ग के लिए यह उपयुक्त है। यह खाता स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चुनिंदा शाखाओं और पोस्ट ऑफिसों में खुलवाया जा सकता है। यह कम से कम 15 साल के लिए खोला जा सकता है और पांच साल के लिए समय सीमा बढ़ाई जा सकती है। हां यह ध्यान रखने की बात है कि इस खाते को मृत्यु के अलावा अन्य किसी स्थिति में समय से पहले बंद नहीं किया जा सकता। इसमें सालाना न्यूनतम 500 रुपये और अधिकतम 75 हजार रुपये जमा किए जा सकते हैं। इसमें जमा पर 8.50 फीसदी की दर से ब्याज मिलता है। खास बात यह है कि इसमें की गई सालाना जमा पर आपको आयकर में छूट भी मिल सकती है। यानी यदि कोई युवा इस खाते में 25 साल की उम्र में 1,000 रुपये मासिक जमा करे तो एक बड़ी रकम उसके पास 45 की उम्र में होगी, जिसका इस्तेमाल वह अपने बच्चों की पढ़ाई या अपने बुढ़ापे के लिए निवेश में कर सकता है।
पीपीएफ खाते के तमाम फायदों के बावजूद कई लोग पीपीएफ अकाउंट नहीं खुलवा पाते हैं। दरअसल ऐसे लोग हर चीज को टालने के आदी होते हैं। वे इस खाते को खोलने के बारे में सोचते तो हैं, पर ऐसा कर नहीं पाते हैं। ज्यादातर लोग अपना खाता भारतीय स्टेट बैंक में खोलना चाहते हैं। उनका भरोसा है इस बैंक पर। पर इसके बाद भी देखा गया है कि वे सिर्फ सोचते ही रह जाते हैं। हकीकत में पीपीएफ अकाउंट खोलना कोई मुश्किल काम नहीं है। अगर आप इस खाते को खोलना चाहते हैं, तो हम 4 साधारण से स्टेप आपको सुझा रहे हैं। आप इनका पालन करके बमुश्किल 30 से 35 मिनट में स्टेट बैंक में अपना खाता खुलवा सकते हैं। पर इसके लिए आपको कुछ तैयारी पहले से करनी होगी।पहला कदम : ब्रांच का चुनाव करेंपीपीएफ अकाउंट खोलने के लिए सरकार ने कुछ ब्रांच अधिकृत किए हैं। आपको सबसे पहले ऐसी ब्रांच के बारे में पता करना होगा। आमतौर पर एसबीआई की जो बड़ी शाखाएं हैं और जहां ग्राहकों की तादाद ज्यादा रहती है, वहां इस खाते को खोलने की सुविधा उपलब्ध है। यहां एक बात और याद रखें पीपीएफ अकाउंट खुलवाने के लिए उस बैंक में बचत खाता होना जरूरी नहीं है।दूसरा कदम : प्रक्रिया पूरी करेंएक बार जब आप बैंक का सेलेक्शन कर लेगें, तो इसके बाद आपका काम काफी आसान हो जाता है। दूसरे कदम के तौर पर आपको बैंक से अकाउंट खोलने वाला फार्म लेकर भरना होगा। इसमें बमुश्किल 5 मिनट का समय लगता है। फार्म में आपको एक नॉमिनी का नाम देना होगा। साथ ही किसी गवाह के दस्तखत होंगे। इस फॉर्म के साथ आपको अपना पहचान और निवास का सर्टिफिकेट लगाना होता है। इसके लिए आप पासपोर्ट, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आईडी या राशन कार्ड आदि का इस्तेमाल कर सकते हैं। फार्म में 2 पासपोर्ट साइज फोटो भी लगाने होते हैं। जब खाता खुलवाने जाएं, तो इन प्रमाण पत्र की फोटो कापी भी साथ ले जाएं। अगर किसी वेरीफिकेशन की जरूरत होगी, तो वो मौके पर ही हो जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में 20 मिनट से ज्यादा का वक्त नहीं लगता है।तीसरा कदम : पास बुक हासिल करेंआप जितनी भी रकम का खाता खुलवाएंगे, उसे पहले एक स्लिप में भरकर देना होगा। पर इसके बाद बैंक आपको एक पासबुक बनाकर दे देगा। पासबुक बचत खाते की ही तरह होती है। इसमें आपकी फोटो लगी रहेगी। साथ ही नॉमिनी का नाम दर्ज होगा। इस पासबुक के पीछे पीपीएफ खाते के नियमों का जिक्ररहता है।चौथा कदम : ऑनलाइन कराएंअगर आपके पास पहले से एसबीआई का कोई खाता है, तो पीपीएफ अकाउंट को इससे लिंक करा लें। ऐसा कराने से आपको जब भी पीपीएफ खाते में पैसे जमा करने होंगे, ब्रांच में नहीं जाना पड़ेगा। इससे आपके समय की बचत होती रहेगी। आपको शाखा में जाकर लाइन में नहीं लगना पड़ेगा।कुछ और ध्यान रखेंकई बार लोग पीपीएफ के खाते को एक बैंक से दूसरे में ट्रांसफर कराना चाहते हैं। इसे शिफ्ट नहीं करा पाते हैं। इसके लिए आप अपनी पीपीएफ पासबुक के साथ नई ब्रांच में जाएं, और वहां एक अप्लीकेशन लिखकर दे। पासबुक को उसके साथ पेश करें। इस प्रक्रिया में 15 से 20 मिनट का समय लगता है। अगर आप पीपीएफ अकाउंट के निवेश पर टैक्स छूट पाना चाहते हैं, तो पासबुक की फोटो कापी करा लें। इसके बाद संबंधित बैंक से इसे अटेस्टेड करा लें। साथ ही पीपीएफ खाते में पैसा हर महीने के 5 तारीख से पहले निवेश करने की योजना बनाएं। इससे उस महीने का ब्याज जुड़ जाता है।

पढ़ाई के लिए कैसे लें लोन

एजुकेशन लोन के लिए आपको किसी भी निजी या पब्लिक सेक्टर के बैंक से संपर्क करना होगा। पर इससे भी पहले आप जिस संस्थान से पढ़ाई कर रहे हैं उसी से ही संपर्क करें। हो सकता है कि आपके संस्थान ने कुछ बैंकों से समझौते कर रखे हों। बैंक आपके संस्थान की रेपुटेशन के मुताबिक ही लोन उपलब्ध कराएगा। ज्यादातर बैंक कोर्स के मुताबिक लोन देते हैं। आपका पूरे कोर्स पर कितना खर्च होगा, उसी के अनुसार लोन मंजूर किया जाता है। आमतौर पर एजुकेशन लोन 5 से 7 साल की अवधि के लिए दिया जाता है। पर खास हालात में इस अवधि को बढ़ाकर 10 साल भी किया जा सकता है।आमतौर पर 4 लाख तक के एजुकेशन लोन पर किसी तरह की सिक्युरिटी की जरूरत नहीं होती है। कुछ निजी बैंक 7.5 लाख तक के लोन बिना किसी सिक्युरिटी के दे देते हैं। पर ये पूरी तरह छात्र के प्रोफाइल पर निर्भर करता है। बैंक ये देखते हैं कि आपकी या आपके परिजनों की लोन चुकाने की क्षमता कैसी है। कभी-कभी सिक्युुरिटी की जरूरत पड़ती है कभी नहीं। बेहतर रास्ता यही है कि आप अपनी स्थिति के मुताबिक बैंक अधिकारियों से बात करें।

नए वित्त वर्ष में एफडी से मिल सकता है बेहतर रिटर्न

यदि आपके पास अतिरि€त पूंजी है तो आपके लिए एक अ‘छी खबर है। बैंकों की फि€स्ड डिपॉजिट (एफडी) दरें बढऩे जा रही हैं। यदि सब ठीक-ठाक रहा तो अप्रैल से शुरू होने वाले वि?ा वर्ष 2010-11 में सभी बैंक एफडी पर मिलने वाले ?याज की दरों में बढ़ोतरी कर देंगे। यानी आपको एफडी में निवेश पर पहले से बेहतर रिटर्न मिल सकेगा। एचडीएफसी बैंक ने 19 फरवरी को एफडी की विभि‹न स्कीमों के लिए ?याज दरों में 0.25 से 1.5 फीसदी तक की बढ़ोतरी की थी। अ‹य बैंक भी दरों में बढ़ोतरी की योजना बना रहे हैं। सार्वजनिक क्षेल्œा का बैंक यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के भी सप्ताहभर में फि€स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दरें बढ़ा सकता है। आईडीबीआई और आईसीआईसीआई बैंक भी इस महीने की शुरुआत में एफडी की कुछ स्कीमों में ब्याज दर 0.25 से 0.50 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर चुके हैं। जेएंडके बैंक ने एक साल से स€™यादा की एफडी पर ?याज दर में 0.75 फीसदी की बढ़ोतरी की है। विश्लेषकों का कहना है कि इस प्रतिस्पर्Šाा में कई अ‹य बड़े बैंक भी जल्द ही कूदने वाले हैं। 22 फरवरी को अपनी रिपोर्ट में क्रेडिट सुइस ने कहा था कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और आईसीआईसीआई की एफडी दरें आŠाा से एक फीसदी के डिस्काउंट पर उपल?Šा हैं और ये दोनों भी दरों में बढ़ोतरी कर सकते हैं। हालांकि बड़े बैंकर्स ने इससे असहमति जताई है। उनके मुताबिक बैंक संभवत: मई-जून तक एफडी दरों में बढ़ोतरी नहीं करेंगे, €योंकि बैंकों के पास लोन के रूप में देने के लिए पर्याप्त लि€िवडिटी मौजूद है। इसके विपरीत क्रेडिट सुइस के विश्लेषकों का मानना है कि लोन की वृद्धि दर बढ़ रही है। फिलहाल यह 14.8 फीसदी है और आगे भी इसमें तेजी की संभावना है। आरबीआई भी मौद्रिक नीति को सख्त करने जा रहा है। ऐसे में बैंकों के पास दिख रही लि€िवडिटी स€™यादा समय तक नहीं रह सकेगी और एफडी को आकर्षित करने के लिए वे डिपोजिट पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकते हैं। बैंकों में डिपोजिट की रफ्तार हाल ही में गिरकर 17 फीसदी पर पहुंच गई थी जो चार साल में सबसे कम है। ऐसे में यदि जमा दरों में बढ़ोतरी होती है तो एफडी की ओर भी लोगों का रुझान बढ़ेगा।

Tuesday, February 23, 2010

अप्रैल से सेङ्क्षवग अकाउंट देगा सोने का अंडा!

अगर आप उन लोगों में से हैं जिनके सेविंग अकाउंट में हमेशा काफी पूंजी जमा रहती है तो आपके लिए एक बड़ी खुशखबरी है। एक अप्रैल से आपको सेविंग अकाउंट में जमा आपकी पूंजी पर अब ब्याज की रकम ज्यादा मिलेगी। रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने पिछले साल घोषणा की थी कि सेविंग अकाउंट में जमा पर मिलने वाले ब्याज की गणना की पद्धति में बदलाव किया जाएगा। यह बदलाव एक अप्रैल 2010 से प्रभावी होना है। नई पद्धति में सेविंग अकाउंट पर ब्याज दर तो 3.5 फीसदी ही रहेगी, लेकिन ब्याज की गणना प्रतिदिन के हिसाब से होगी। फिलहाल कैसे होती है ब्याज की गणनाफिलहाल आपके सेविंग अकाउंट में 10 तारीख से लेकर महीने के आखिर तक जो भी न्यूनतम राशि रहती है उसी पर बैंक ब्याज देता है। ब्याज दर 3.5 फीसदी सालाना या 0.29 फीसदी मासिक होती है। बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिनके अकाउंट में महीने के आखिर में खाते में काफी कम रकम बाकी रहती है। इससे खाताधारकों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है। मान लीजिए आपके सेविंग अकाउंट में 10 नवंबर को 1,000 रुपये हैं और एक दिन बाद आप खाते में एक लाख रुपये जमा कर देते हैं। लेकिन 30 दिसंबर को आप ये एक लाख रुपये निकाल लेते हैं तो आपके इन 51 दिनों के लिए केवल 1,000 रुपये पर ही ब्याज मिलेगा। क्योंकि 10 नवंबर से 30 नवंबर के दौरान आपके खाते में न्यूनतम राशि 1,000 रुपये ही शेष थी और उसके बाद 10 दिसंबर से 31 दिसंबर के दौरान भी न्यूनतम राशि 1,000 रुपये ही रह गई। जबकि इस दौरान एक लाख एक हजार रुपये बैंक के पास 49 दिन के लिए मौजूद रहे। इस नियम से बैंक फायदे में रहते हैं। ऐसा इसलिए भी क्योंकि ज्यादातर लोग महीने के खर्च के लिए बचत खाते से 10 तारीख के पहले ही रकम निकाल लेते हैं। रिजर्व बैंक ने एक अप्रैल से नया नियम लागू करने की घोषणा कर आम खाताधारकों को काफी राहत दी है। इस नियम की घोषणा 21 अप्रैल 2009 को चालू वित्त वर्ष 2009-10 की सालाना मौद्रिक नीति पेश करते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. डी सुब्बाराव ने की थी। अप्रैल के बाद कितना मिलेगा ब्याजहालांकि एक अपै्रल के बाद भी सेविंग अकाउंट पर सालाना ब्याज दर 3.5 फीसदी ही रहेगी, लेकिन ब्याज दर की गणना बदल जाएगी। तब ब्याज दर 3.5 फीसदी सालाना या 0.0095 फीसदी प्रति दिन होगी। सबसे जरूरी बात तो यह कि आपके अकाउंट के प्रतिदिन के बैलेंस पर ब्याज की गणना होगी। मानिए अप्रैल महीने की आपके सेविंग अकाउंट की स्टेटमेंट नीचे दिए गए विवरण जैसी है-तारीख जमा (रुपये) निकासी बकाया1 अप्रैल 5,0002 अप्रैल 30,000 35,0003 अपै्रल 4,000 31,0005 अप्रैल 4,000 27,00010 अप्रैल 12,000 15,00013 अपैैल 2,700 17,70018 अप्रैल 4,500 13,20025 अप्रैल 5,500 7,70030 अप्रैल 7,700ऐसे में ब्याज की मौजूदा गणना पद्धति के तहत आपको 10 अपै्रल से 30 अप्रैल तक आपके सेविंग अकाउंट में न्यूनतम बकाया यानी 7,700 रुपये पर 0.29 फीसदी मासिक की दर से अप्रैल में 22.46 रुपये ब्याज मिलता। लेकिन एक अप्रैैल से नई पद्धति लागू होने के बाद अप्र्रैल का आपके सेविंग अकाउंट की राशि का ब्याज 0.0095 फीसदी प्रतिदिन के हिसाब से 48.82 रुपये होगा। इससे साफ है कि आपको अप्रैल के बाद अपने सेविंग अकाउंट पर दोगुना से भी ज्यादा ब्याज मिलने जा रहा है। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप अपनी बचत को सेविंग अकाउंट में डाले रखें। अपने पैसे को अन्य स्थानों पर निवेश कर इससे काफी ज्यादा रिटर्न आप हासिल कर सकते हैं।

Monday, February 22, 2010

रिटायरमेंट के बाद एफडी अच्छा विकल्प नहीं

बहुत सारे लोग समय से पहले रिटायरमेंट के बारे में सोचते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि रिटायरमेंट के बाद नियमित आय कैसे प्राप्त करें ताकि घर का खर्च आसानी से चलता रहे। परंपरागत रूप से सोच यही होती है कि फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) में निवेश किया जाए और उससे मिलने वाली ब्याज की रकम से अपना घर खर्च चलाया जाए। लेकिन क्या यह सही विकल्प है? क्या आप जीवन भर एफडी से मिलने वाली ब्याज की रकम से गुजारा कर सकते हैं? इस लेख में यही बताया गया है कि टर्म/फिक्स्ड डिपॉजिट जल्दी रिटायर होने वाले किसी व्यक्ति के लिए सबसे अच्छा विकल्प नहीं हो सकता। ऐसा इसलिए क्योंकि जब आप नौकरी कर रहे होते हैं तो हर महीने आपकी आय काफी ज्यादा होती है जिसका इस्तेमाल आप अपने नियमित खर्चों को पूरा करने के लिए करते हैं। गैर नियमित खर्च जैसे फ्रिज आदि खरीदने के लिए आप जमा पूंजी का इस्तेमाल करते हैं। जब आप रिटायर होते हैं तो खर्च थोड़ा बहुत कम ज्यादा होकर करीब उतना ही बना रहता है, लेकिन आय पहले के मुकाबले काफी घट जाती है। ऐसे में एफडी के ब्याज से आप खर्च कैसे चला सकते हैं? इसलिए आय का ऐसा स्रोत बनाने की जरूरत है आपके खर्च पूरे कर सके और जीवनभर आपको निश्चित आय मिल सके। परंपरागत नजरिया: सावधि जमा (एफडी)भारतीय लोगों की परंपरागत सोच यही है कि रिटायरमेंट के बाद पूंजी को एफडी जैसे नियमित आय वाले इंस्ट्रूमेंट्स में लगाना चाहिए। लेकिन जो व्यक्ति समय से पहले रिटायरमेंट लेना चाहता है उसके लिए क्या एफडी सही विकल्प है। इसे एक विश्लेषण के जरिए समझते हैं। कितने तरह की एफडीटर्म या फिक्स्ड डिपॉजिट में आप एक निश्चित रकम निश्चित समय के लिए बैंक में जमा कराते हैं। बदले में बैंक आपको ब्याज के रूप में तय राशि एकमुश्त या मासिक, तिमाही या सालाना आधार पर देता है। फिक्स्ड डिपॉजिट की समय सीमा समाप्त होने पर बैंक आपको वह पूरी रकम लौटा देता है जो आपने जमा की थी।रिटायर्ड व्यक्ति के लिए एफडी का मतलबयदि आप 60 साल की उम्र में २५ लाख रुपये लेकर रिटायर होते हैं। यदि यह मान लें कि फिक्स्ड डिपॉजिट पर बैंक 10 फीसदी की दर से ब्याज देता है। ध्यान रहे यह दर अधिकतम ही होगी और पूरे समय तक यह हासिल करना मुश्किल है। मान लें आपको औसत 8 फीसदी ब्याज एफडी पर मिलेगा तो 25 लाख रुपये की एफडी से आपको सालाना दो लाख रुपये, यानी 16,667 रुपये हर महीने मिलते रहेंगे। क्या यह रकम रिटायरमेंट के बाद आपके परिवार का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त है। यह भी हो सकता है कि आप अपने रिटायमेंट के लिए पर्याप्त रकम नहीं बचा पाए हों। यदि आपके परिवार का मासिक खर्च 15,000 रुपये है तो यह आय पर्याप्त है। लेकिन यदि यह आय फिलहाल के लिए पर्याप्त भी है तो क्या यह राशि आपके परिवार को आपके जीवन के बचे समय में पर्याप्त आर्थिक सुरक्षा मुहैया करा पाएगी? महंगाई (मुद्रास्फीति) का असरइस बात को दिमाग में रखें कि सभी जरूरी वस्तुओं और सेवाओं के दाम हर साल तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में आपका मासिक खर्च भी हर साल बढ़ता चला जाएगा। क्या आपकी एफडी से होने वाली आय महंगाई से सुरक्षा दे पाएगी। आय और खर्च के बीच का यह दायरा हर साल बढ़ता ही चला जाएगा। ऐेसे में आपके पास क्या विकल्प हैं? यदि आप एफडी में ही निवेश करना चाहते हैं तो दो काम कर सकते हैं।1. ज्यादा मासिक आय का करें इंतजाम आपको रिटायरमेंट के लिए ज्यादा बचत करनी चाहिए, ताकि एफडी पर ब्याज से मिलने वाली रकम आपके परिवार के खर्च के लिए पर्याप्त हो। उदाहरण के लिए यदि आप 60 की उम्र में रिटायर होते हैं और आपका मासिक खर्च 15,000 रुपये है। लेकिन खर्च में आए दिन बढ़ोतरी होती रहती है। मानिए आप 90 साल की उम्र तक जिंदा रहेेंगे। तब आपका मासिक खर्च 81,276 रुपये मासिक या 9,75,310 रुपये सालाना हो सकता है। ऐसे में 8 फीसदी ब्याज दर से यह राशि हासिल करने के लिए आपको करीब 1.22 करोड़ रुपये एफडी में निवेश की जरूरत होगी। 2. खख्र्च पूरा करने के लिए एफडी से रकम निकालेंदूसरा विकल्प यह हो सकता है कि आप अपनी जमा राशि में से हर साल थोड़ी-थोड़ी रकम निकालते रहें जो कम पडऩे वाले खर्च की भरपाई कर सके। इसे भी उदाहरण से समझते हैं। माना 25 लाख रुपये की एफडी पर 8 फीसदी ब्याज दर से मिलन वाली आय से आप तीन साल ही अपना खर्च चला पाते हैं। उसके बाद खर्च बढऩे पर अतिरिक्त खर्च को पूरा करने के लिए आप एफडी से कुछ रकम निकाल लेते हैं। ऐसा करने पर आपको एफडी से मिलने वाली रकम भी हर साल घटती चली जाएगी। ऐसे में एक समय आपके पास मूल रकम भी नहीं बचेगी और आप पूरा कोष खर्च कर चुके होंगे। उदाहरण के लिए यदि 18 साल में ऐसा होता है तो 78 की उम्र में आप अपनी रिटायरमेंट की पूरी रकम खर्च कर चुके होंगे। निष्कर्ष यह है कि दोनों ही तरीकों में एफडी से मिलने वाली रकम से आप अपनी रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी आसानी से नहीं बिता सकते। एफडी पर लागू होने वाली बात पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम, प्रोविडेंट फंड (पीएफ), पीपीएफ, सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम, नेशनल सेविंग्स स्कीम, किसान विकास पत्र, भविष्य निर्माण बांड आदि पर भी लागू होती है।

देश में एसएमई के लिए भरपूर अवसर

देश में एक करोड़ 36 लाख से च्यादा छोटे और मझोले उद्योग धंधे चल रहे हैं। इस वर्ष इनका कारोबार तकरीबन 4.7 लाख करोड़ रुपये का रहा। देश के कुल घरेलू उत्पाद में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से तकरीबन 70 फीसदी हिस्सेदारी इन्हीं मझोले और छोटे उद्योग धंधों की होती है। इसका सीधा सा मतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था में इनकी जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। देश में एसएमई के लिए अभी बहुत गुंजाइश बाकी है। हालांकि इसी के साथ इन मझोले धंधों को आगे बढऩे के लिए पैसे की भी उतनी ही जरूरत है। जहां बढ़े उद्यमियों को पैसा मिलने में परेशानी का सामना करना पड़ता है वहां बाजार से पैसा उठाना एसएमई के लिए आसान काम नहीं है। जब हालात खराब चल रहे हों तो उद्योग चलाने के लिए सबसे अहम चीज पैसे के लिए मझोले उद्यमियों को खासी दिक्कत झेलनी पड़ती है। विशेषज्ञों के मुताबिक सबसे च्यादा पेरशानी तब होती है जब उन्हें कर्ज लेने के लिए बैंक के अलावा दूसरे विकल्पों की जानकारी नहीं होती है। एसएमई रेटिंग एजेंसी ऑफ इंडिया के प्रमुख शशांक जैन ने बताया कि उद्योग चलाने के लिए बैंक लोन के अलावा उद्यमी प्राइवेट इक्विटी (पीई) और कैपिटल वेंचर से भी फंड ले सकता है। इसके साथ ही छोटे और मझोले उद्यमी लघु उद्योग मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही कई योजनाओं के तहत अपने उद्योग को बनाए रखने के लिए फंड ले सकते हैं। जैन ने बताया कि सिडबी भी छोटे और मझोले उद्यमियों को फंड मुहैया कराता है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार और सिडबी क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्रन्योर (सीजीटीएमएसई) योजना के तहत ऐसी छोटी कंपनियों को वित्तीय मदद करती हैं। सीजीटीएमएसई योजना के तहत कोई भी छोटी कंपनी इसके सदस्य वित्तीय संस्था से 50 लाख रुपये तक उधार ले सकती है। च्यादातर एसएमई पैसे के लिए बैंकों से कर्ज लेना फैसला करते हैं। जैसे ही एसएमई बैंक से कर्ज लेते हैं वे मुख्य सेक्टर लेंडिंग के दायरे में आ जाते हैं। पिछले महीने गोल्डमैन सेस की जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि बैंकों के कुल नॉन पर्फार्मिंग एसेट वर्ष 2007 में 3 फीसदी थे। इनके वर्ष 2010 तक बढ़कर 4.5-5 फीसदी होने की आशंका है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि इसके लिए कॉर्पोरेट और एसएमई क्षेत्र ही जिम्मेदार होंगे। छोटे और मझोले उद्यमियों का भी मानना है कि इस समय हालात खस्ता चल रहे हैं। चेन्नई की एक फर्म टेक्नोप्लस सर्विसेज के प्रबंध निदेशक एनए रघु का कहना है कि उनके क्षेत्र को बैंकों से कर्ज मिलने में खासी परेशानी हो रही है। टेक्नोप्लस सर्विसेज बॉयलर और एनर्जी ऑडिट के साथ ही आयतित इंजीनियरिंग गुड्स का वितरण करती है। दूसरे लघु उद्यमी का कहना है कि बाजार के हालात बहुत खराब चल रहे हैं और कोई भी पैसा उधार देने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि दरअसल बैंक बाजार के हालात सुधरने का इंतजार कर रहे हैं। उनका मानना है कि बैंकों का एसएमई में भरोसा बढ़ाने के लिए इन्हें क्रेडिट में डालना चाहिए। मझोले और छोटे उद्योगों की रेटिंग का तकरीबन 75 फीसदी खर्च लघु उद्योग मंत्रालय ही उठाता है। इस समय पीई और वेंचर कैपिटल फंडिंग में भी हलचल हो रही है। एसएमई चेंबर ऑफ इंडिया के महासचिव वीके वेंकटाचलम के मुताबिक इस तरह के फंड 3-4 वर्ष के लिए दिए जाते हैं। इस समय भी इसमें कोई्र परिवर्तन नहीं किया गया है। उन्होंने बताया बीते छह महीनों के दौरान एसएमई ने ऐसे फंड लेना शुरू कर दिया है। एसएमई फाइनेंसिंग के विशेषज्ञ राजेश दुबे के मुताबिक वेंचर कैपिटल फंड अच्छी योजनाओं और बेहतर क्षमता वाली कंपनियों को ही दिए जाते हैं। च्यादातर वैंचर कैपिटल निवेश से पहले विनिवेश के सभी विकल्पों पर विचार कर लेते हैं। हालांकि हालातों में बदलाव आ रहा है। स्क्वेयरफुट के निदेशक अभिषेक श्राफ बताते हैं कि कुछ पीई प्लेयर्स ने उनके बिजनेस पर पैसा लगाने में रुचि दिखाई है। दुबे के मुताबिक बहुत से एसएमई असुरक्षित कर्ज से भी पैसा जुटा रहे हैं। उन्होंने बताया कि कुछ मामलों में क्लाइंट कंपनी एसएमई को बैंक से लोन दिलाने की गारंटी दे रही हैं। दुबे ने बताया कि राच्य वित्तीय आयोग ने भी वित्तीय मदद बढ़ा दी है। स्थानीय संस्थाओं के अलावा वैश्विक संस्थाओं ने भी एसएमई की तरफ मदद के लिए हाथ बढ़ाया है। ये संस्थाएं फंड मुहैया कराने के साथ ही उनकी क्षमता बढ़ाने के तरीके भी सुझा रही हैं।