Monday, February 22, 2010

देश में एसएमई के लिए भरपूर अवसर

देश में एक करोड़ 36 लाख से च्यादा छोटे और मझोले उद्योग धंधे चल रहे हैं। इस वर्ष इनका कारोबार तकरीबन 4.7 लाख करोड़ रुपये का रहा। देश के कुल घरेलू उत्पाद में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से तकरीबन 70 फीसदी हिस्सेदारी इन्हीं मझोले और छोटे उद्योग धंधों की होती है। इसका सीधा सा मतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था में इनकी जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। देश में एसएमई के लिए अभी बहुत गुंजाइश बाकी है। हालांकि इसी के साथ इन मझोले धंधों को आगे बढऩे के लिए पैसे की भी उतनी ही जरूरत है। जहां बढ़े उद्यमियों को पैसा मिलने में परेशानी का सामना करना पड़ता है वहां बाजार से पैसा उठाना एसएमई के लिए आसान काम नहीं है। जब हालात खराब चल रहे हों तो उद्योग चलाने के लिए सबसे अहम चीज पैसे के लिए मझोले उद्यमियों को खासी दिक्कत झेलनी पड़ती है। विशेषज्ञों के मुताबिक सबसे च्यादा पेरशानी तब होती है जब उन्हें कर्ज लेने के लिए बैंक के अलावा दूसरे विकल्पों की जानकारी नहीं होती है। एसएमई रेटिंग एजेंसी ऑफ इंडिया के प्रमुख शशांक जैन ने बताया कि उद्योग चलाने के लिए बैंक लोन के अलावा उद्यमी प्राइवेट इक्विटी (पीई) और कैपिटल वेंचर से भी फंड ले सकता है। इसके साथ ही छोटे और मझोले उद्यमी लघु उद्योग मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही कई योजनाओं के तहत अपने उद्योग को बनाए रखने के लिए फंड ले सकते हैं। जैन ने बताया कि सिडबी भी छोटे और मझोले उद्यमियों को फंड मुहैया कराता है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार और सिडबी क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्रन्योर (सीजीटीएमएसई) योजना के तहत ऐसी छोटी कंपनियों को वित्तीय मदद करती हैं। सीजीटीएमएसई योजना के तहत कोई भी छोटी कंपनी इसके सदस्य वित्तीय संस्था से 50 लाख रुपये तक उधार ले सकती है। च्यादातर एसएमई पैसे के लिए बैंकों से कर्ज लेना फैसला करते हैं। जैसे ही एसएमई बैंक से कर्ज लेते हैं वे मुख्य सेक्टर लेंडिंग के दायरे में आ जाते हैं। पिछले महीने गोल्डमैन सेस की जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि बैंकों के कुल नॉन पर्फार्मिंग एसेट वर्ष 2007 में 3 फीसदी थे। इनके वर्ष 2010 तक बढ़कर 4.5-5 फीसदी होने की आशंका है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि इसके लिए कॉर्पोरेट और एसएमई क्षेत्र ही जिम्मेदार होंगे। छोटे और मझोले उद्यमियों का भी मानना है कि इस समय हालात खस्ता चल रहे हैं। चेन्नई की एक फर्म टेक्नोप्लस सर्विसेज के प्रबंध निदेशक एनए रघु का कहना है कि उनके क्षेत्र को बैंकों से कर्ज मिलने में खासी परेशानी हो रही है। टेक्नोप्लस सर्विसेज बॉयलर और एनर्जी ऑडिट के साथ ही आयतित इंजीनियरिंग गुड्स का वितरण करती है। दूसरे लघु उद्यमी का कहना है कि बाजार के हालात बहुत खराब चल रहे हैं और कोई भी पैसा उधार देने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि दरअसल बैंक बाजार के हालात सुधरने का इंतजार कर रहे हैं। उनका मानना है कि बैंकों का एसएमई में भरोसा बढ़ाने के लिए इन्हें क्रेडिट में डालना चाहिए। मझोले और छोटे उद्योगों की रेटिंग का तकरीबन 75 फीसदी खर्च लघु उद्योग मंत्रालय ही उठाता है। इस समय पीई और वेंचर कैपिटल फंडिंग में भी हलचल हो रही है। एसएमई चेंबर ऑफ इंडिया के महासचिव वीके वेंकटाचलम के मुताबिक इस तरह के फंड 3-4 वर्ष के लिए दिए जाते हैं। इस समय भी इसमें कोई्र परिवर्तन नहीं किया गया है। उन्होंने बताया बीते छह महीनों के दौरान एसएमई ने ऐसे फंड लेना शुरू कर दिया है। एसएमई फाइनेंसिंग के विशेषज्ञ राजेश दुबे के मुताबिक वेंचर कैपिटल फंड अच्छी योजनाओं और बेहतर क्षमता वाली कंपनियों को ही दिए जाते हैं। च्यादातर वैंचर कैपिटल निवेश से पहले विनिवेश के सभी विकल्पों पर विचार कर लेते हैं। हालांकि हालातों में बदलाव आ रहा है। स्क्वेयरफुट के निदेशक अभिषेक श्राफ बताते हैं कि कुछ पीई प्लेयर्स ने उनके बिजनेस पर पैसा लगाने में रुचि दिखाई है। दुबे के मुताबिक बहुत से एसएमई असुरक्षित कर्ज से भी पैसा जुटा रहे हैं। उन्होंने बताया कि कुछ मामलों में क्लाइंट कंपनी एसएमई को बैंक से लोन दिलाने की गारंटी दे रही हैं। दुबे ने बताया कि राच्य वित्तीय आयोग ने भी वित्तीय मदद बढ़ा दी है। स्थानीय संस्थाओं के अलावा वैश्विक संस्थाओं ने भी एसएमई की तरफ मदद के लिए हाथ बढ़ाया है। ये संस्थाएं फंड मुहैया कराने के साथ ही उनकी क्षमता बढ़ाने के तरीके भी सुझा रही हैं।

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