Wednesday, March 31, 2010

खाता बंद करने में भी मुश्किल

निजी बैंकों में बचत खाता खोलने वाले जरा सावधान रहें। बचत खाता बंद कराने पर ज्यादातर निजी बैंक सीधे आपकी जेब पर हमला कर रहे हैं और कुछ शुल्क वसूल रहे हैं। अगर आप बैंक की कार्य और नीतियों को नापसंद कर अपना खाता बंद कराना चाहते हैं तो बैंक उस पर भी एग्जिट चार्ज वसूलकर आपकी जेब हल्की कर सकते हैं। यह चार्ज 100 रुपये से लेकर 500 रुपये तक हो सकता है। निजी बैंकों से पीछा छुड़ाना अब आसान नहीं रह गया है। देश में कार्यरत एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एचएसबीसी जैसे दूसरे निजी बैंक ग्राहकों से उनका खाता बंद करने के लिए अलग से शुल्क ले रहे हैं। एचडीएफसी बैंक के एक अधिकारी मोहम्मद सलीम ने बताया कि हमारे बैंक में जमा खाता खुलवाने वाला व्यक्ति यदि छह महीने के अंदर ही अपना खाता बंद करना चाहता है तो उसे 500 रुपये बतौर एग्जिट चार्ज देना होगा। यह शुल्क उतना ही है जितना किसी ग्राहक को तिमाही न्यूनतम राशि अपने खाते में न रखने पर चुकानी पड़ती है। उन्होंने बताया कि हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि बैंकों को ग्राहक का खाता खुलवाने के दौरान कई तरह के प्रोसेसिंग खर्च चुकाने होते हैं। इसके अलावा एचएसबीसी बैंक के वित्तीय योजना प्रबंधक जयदेव अरोड़ा ने भी बताया कि खाता खुलने के छह माह के अंदर इसे बंद कराया जाए तो ग्राहक को 500 रुपये बैंक को देने होंगे। बैंक
एग्जिट चार्ज
अवधिएचडीएफसी बैंक
500 रुपये
6 माह तकएचएसबीसी
500 रुपये
6 माह तकआईसीआईसीआई बैंक
400 रुपये
1 वर्ष तकएबीएन एमरो
336 रुपये
1वर्ष तकयस बैंक
100 रुपये
कभी भी

जरूरत के मुताबिक फिक्स्ड डिपॉजिट

किसी भी निवेशक के पोर्टफोलियो में सावधि जमा (एफडी) की हिस्सेदारी काफी ज्यादा होती है। दरअसल सुरक्षित रिटर्न की उम्मीद सबसे ज्यादा इसी में होती है। एफडी का परंपरागत रूप काफी साधारण था, लेकिन अब बाजार में गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से बैंकों ने एफडी के रूप में कई बदलाव किए हैं। एफडी में भी अब कई तरह के विकल्प मौजूद हैं।इंश्योरेंस सुविधा के साथ अपना पैसा के सीईओ हर्ष रूंगटा के मुताबिक कुछ एफडी के साथ इंश्योरेंस भी जुड़ा हुआ होता है। ऐसे में एफडी तो अपने मूल रूप में बनी ही रहती है साथ में इंश्योरेंस का अतिरिक्त फायदा भी मिल जाता है। लेकिन यह फायदा जमा की राशि और एफडी की अवधि पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए कुछ बैंक 25,000 रुपये की तीन साल की एफडी पर 5 लाख रुपये का फ्री एक्सीडेंट कवर भी देते हैं। एफडी पर 7 फीसदी ब्याज आपको मिलेगा। इससे प्रॉडक्ट की वैल्यू बढ़ जाती है। कई बैंक केवल एक्सिडेंट इंश्योरेंस ही देते हैं जिसमें सम एश्योर्ड राशि 3 लाख से 7 लाख रुपये के बीच होगी। आमतौर पर ऐसे कवर में कई शर्तें जुड़ी हुई होती हैं और यह आपकी सभी बीमा जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता।ब्याज का पुनर्निवेशनिवेश सलाहकार नवनीत धवन के मुताबिक कुछ बैंक एफडी से हासिल होने वाले ब्याज की रकम के रीइनवेस्टमेंट की सुविधा भी देते हैं। मानएि आप एफडी पर हर तिमाही में 2,000 रुपये ब्याज के रूप में पा रहे हैं। ऐसे में इस रकम की एक और एफडी बैंक मौजूदा ब्याज दरों पर शुरू कर देगा। फिक्स्ड डिपॉजिट ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स हैं जिनमें रिटर्न तय है और यदि निवेशक अपनी रकम मैच्योरिटी की अवधि से पहले भी निकालता है तो बैंक ऐसे में कुछ जुर्माना लगाते हैं। ऐसे मामलों में रिटर्न कुछ कम हो जाता है। लेकिन कुछ बैंक ऐसे भी हैं जो एफडी को बीच में तोडऩे पर जुर्माना नहीं लगाते हैं। एफडी में ऐसा लचीलापन निवेशकों को काफी आकर्षित करता है।समय सीमा में छूटज्यादातार लोग एफडी किसी निश्चित लक्ष्य के लिए करवाते हैं। जैसे कोई महंगी चीज खरीदनी हो या बच्चे की शादी करनी हो। ऐसे कार्यक्रम तय समय से आगे टल भी सकते हैं। ऐसे में या तो निवेशक को एफडी मैच्योर होने के बाद पैसा निकालना ही पड़ता है, जिससे उसे रिटर्न में नुकसान उठाना पड़ता है। लेकिन अब कई बैंक एफडी में निवेश करने वालों को एफडी की समय सीमा बढ़ाने का विकल्प भी निवेशकों को दे रहे हैं। इसमें वे अपने कार्यक्रम के मुताबिक उसका एफडी की मैच्योरिटी अवधि बढ़ा सकते हैं।जमा को तोडऩे का विकल्पनिवेश सलाहकार अर्णव पंड्या के मुताबिक समान मूल्य वर्ग की कई जमाओं में बड़ी संख्या में कागजी कार्रवाई करनी पड़ती हैं। यह काम आमतौर पर उन निवेशकों को करना पड़ता है जिन्हें भविष्य में भिन्न-भिन्न समय पर पैसे की जरूरत होती है। ऐसे में उनकी इच्छा पूरी रकम को एक साथ एफडी में निवेश करने की नहीं होती है क्योंकि बाद में पैसे की जरूरत पडऩे पर उन्हें एफडी तोडऩी पड़ सकती है जिसमें उनको रिटर्न कम मिलेगा। निवेशकों की इस समस्या को देखते हुए कई बैंक ऐसी व्यवस्था दे रहे हैं जिसमें एफडी की पूरी रकम को निवेशक की जरूरत के हिसाब से अगल-अलग मूल्य वर्ग के कई हिस्सों में बांट देते हैं। ऐसी एफडी में निवेशकों को ज्यादा रिटर्न का फायदा मिल जाता है।

Tuesday, March 30, 2010

अब अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में घर खरीदने पर देना होगा सर्विस टैक्स

अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी की खरीद पर अब आपको सर्विस टैक्स से भी जूझना होगा। नए बजट में इसका प्रावधान किया गया है। सर्विस टैक्स पहली अप्रैल से लागू होगा। अब किसी भी बन रहे मकान या फ्लैट के खरीदने पर बिल्डर को 10.3 फीसदी सर्विस टैक्स देना होगा। जाहिर है इसका बोझ ग्राहकों के सिर ही आएगा। नियम के मुताबिक जब तक किसी प्रॉपर्टी पर लोकल अथॉरिटी से कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिल जाता है, उसे अंडर कंस्ट्रक्शन (निर्माणाधीन) प्रोजेक्ट माना जाएगा। इस तरह जब तक किसी प्रॉपर्टी पर अथॉरिटी से कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा, तब तक वो सर्विस टैक्स के दायरे में रहेगी। अगर आप प्रॉपर्टी काम पूरा हो जाने का सर्टिफिकेट मिलने के बाद खरीदते हैं, तब सर्विस टैक्स का कोई चक्कर नहीं होगा। जरा गौर से समझें टैक्स को सर्विस टैक्स को लेकर बिल्डर आपके साथ मनमानी कर सकते हैं। ऐसे में कुछ समझदारी आपको दिखानी होगी। आप ये न सोचें कि अगर किसी निर्माणाधीन अपार्टमेंट में 30 लाख रुपये का फ्लैट खरीदेंगे, तो आपको 10.3 फीसदी के हिसाब से 3.09 लाख रुपये सर्विस टैक्स के तौर पर देने होंगे । यहां ध्यान देने की बात ये है कि सर्विस टैक्स पूरे अमाउंट पर नहीं देना है। कोई भी बिल्डर किसी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में 67 फीसदी अमाउंट जमीन की कीमत और मैटेरियल आदि की वसूल करता है। बाकी 33 चार्ज बिल्डर की सर्विस का होता है। इसका मतलब ये हुआ कि बिल्डर को 10.3 फीसदी की दर से सर्विस टैक्स सिर्फ 33 फीसदी अमाउंट पर ही देना होगा। इस तरह पूरे अमाउंट पर सर्विस टैक्स की प्रभावी दर 3.34 फीसदी ही होगी। कब देना होगा टैक्स अमूमन ज्यादातर लोग होम लोन के जरिए घर खरीदते हैं। यही नहीं घर भी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में ही खरीदा जाता है। ज्यादातर लोग किसी नए प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक कराते हैं। इसके पैसे का भुगतान कुछ अंतराल पर स्टेज आधारित होता है। इसका मतलब ये हुआ कि ज्यादातर लोग बिल्डर को पैसे का भुगतान बिल्डिंग पूरी बनने से पहले ही करते हैं। दरअसल बिल्डिंग पूरी हो जाने के बाद ही बिल्डर को कंप्लीशन सर्टिफिकेट मिलता है। इस तरह इस पूरे भुगतान पर सर्विस टैक्स लगेगा। इस टैक्स का भुगतान बिल्डर को ही करना होगा। पर मुश्किल ये है कि बिल्डर इस टैक्स का बोझ ग्राहकों के सिर डालेंगे। इस तरह पहली अप्रैल से जब आप घर खरीदने जाएंगे, तो ज्यादा रकम चुकानी होगी। लोकेशन पर भी चार्ज सर्विस टैक्स के लिए कुछ और प्रावधान किए गए हैं। अगर आप किसी बेहतरीन लोकेशन पर फ्लैट या घर खरीदते हैं, तो इसके लिए भी बिल्डर को 10.3 फीसदी सर्विस टैक्स देना होगा। अगर आप बिल्डर से किसी खास नंबर का फ्लैट या पार्क फेसिंग-स्वीमिंग पूल फेसिंग या फिर वास्तु आदि की सुविधा के मुताबिक फ्लैट मांगते हैं, तो आपको सर्विस टैक्स देना होगा। पर एक चीज ध्यान रखें पार्किंग या गैराज आदि की सुविधा पर सर्विस टैक्स नहीं लिया जा सकता है। इसके लिए साफ-साफ निर्देश हैं। कैसे लगेगा टैक्स मान लीजिए आपने 1000 वर्ग फुट का फ्लैट खरीदा। इस फ्लैट का रेट 3,000 रुपये प्रति वर्ग फुट है। आपने पांचवें फ्लोर पर बेहतरीन सुविधाओं के लिए 100 रुपये प्रति वर्ग फुट का अतिरिक्त भुगतान किया। आपने 2 लाख रुपये में पार्किंग स्पेश खरीदा। इस तरह आपने कुल 33 लाख रुपये का भुगतान किया। ये पूरा पैसा आपने बिल्डिंग का निर्माण पूरा होने से पहले बिल्डर को दे दिया। इस तरह अब सर्विस टैक्स कुछ इस तरह बनेगा। पहले तो पार्किंग स्पेश के 2 लाख रुपये पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। पांचवीं मंजिल पर बेहतरीन सुविधाओं के लिए आपने 100 रुपये प्रति वर्ग फुट ज्यादा दिए हैं। 1000 वर्ग फुट के फ्लैट पर 10.3 फीसदी की दर से ये टैक्स बनेगा 10,300 रुपये। फ्लैट की असल कीमत 30 लाख रुपये है। इसकी 67 फीसदी आप जमीन की कीमत और बिल्डिंग मैटेरियल का कास्ट निकाल दीजिए। 30 लाख का 67 फीसदी 20,10,000 रुपये बनेगा। अब बाकी 9,90,000 रुपये पर आपको 10.3 फीसदी की दर से सर्विस टैक्स देना होगा। इस तरह ये रकम बनेगी 1,01,970 रुपये। इस तरह आपको कुल 10,300 और 1,01,970 यानी 1,12,270 रुपये बतौर सर्विस टैक्स देने होंगे।

Monday, March 29, 2010

मक्का की प्रोसेसिंग से कमाएं मुनाफा

भारत में जिन खाद्य फसलों का उत्पादन किया जाता हैं, उनमें गेहूं और चावल के बाद मक्का का स्थान तीसरे नंबर पर आता है। पर इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के बावजूद भी इसके प्रसंस्करण और उससे बनने वाले उत्पादों के बारे में कम ही लोगों को जानकारी है। खास बात तो यह है कि देश में टेक्सटाइल इंडस्ट्री स्टार्च के लिए मुख्य तौर पर मक्का पर ही निर्भर है। इस तरह मक्का की प्रोसेसिंग कर स्टार्च, कॉर्न फ्लोर, कॉर्न ऑयल, कॉर्न फ्लैक्स, पशुहार, बेबी कार्न आदि उत्पाद बनाए जा सकते हैं।देश में आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र मक्का के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। वहीं, अन्य प्रदेशों की तुलना में मध्यप्रदेश मक्का उत्पादन में चौथे नंबर पर आता है। इसके अलावा पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, बिहार, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, मेघालय, मनीपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा आदि राज्यों में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। मौजूदा समय में मक्का का लगभग 55 प्रतिशत उपयोग भोजन, 14 प्रतिशत पशुहार, 18 प्रतिशत मुर्गीदाना, 12 प्रतिशत स्टार्च और करीब डेढ़ प्रतिशत का उपयोग बीज के रूप में किया जाता है। इसके दाने में करीब 30 प्रतिशत तेल, 18 प्रतिशत प्रोटीन और बड़ी मात्रा में स्टार्च पाया जाता है। मक्का की प्रोसेसिंग कर जहां इसके विभिन्न प्रकार के स्नैक्स बनाए जा सकते हैं, वही अच्छी मात्रा में प्रोटीन होने के कारण इसके बिस्किट सहित अन्य बेकिंग उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं। इसके अलावा रेडी टू ईट प्रोडक्ट के रूप में भी मक्का के विभिन्न उत्पाद इन दिनों प्रचलन में हैं। साथ ही कॉर्न फ्लैक्स और बेबी कॉर्न मक्का के खाद्य उत्पादों में लोकप्रिय हो रहे हैं। इस क्षेत्र में कई बड़ी कंपनियों के ब्रांड भी बाजार में आसानी से दिखाई दे सकते हैं। इन सबके अलावा मक्का का स्टार्च द्रव्य अथवा पावडर रूप में बड़ी खपत वाला उत्पाद है। इस समय टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज में मक्का के स्टार्च की बड़ी डिमांड हैं। टेक्सटाइल के अलावा अनेक खाद्य पदार्थो भी मक्का का स्टार्च इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह प्रोसेसिंग कर इसका तेल भी बनाया जा सकता है, जो कि विभिन्न दवाओं के साथ मालिश आदि में प्रयुक्त होता है। साथ ही मक्का लिक्विड शुगर के तौर सोरविटॉल, ग्लूकोज सहित कई अन्य उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं। केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान भोपाल के वरिष्ठ वरिष्ठ वैज्ञानिक (खाद्य प्रसंस्करण) डा. एसपी सिंह बताते हैं कि लघु एवं कुटीर उद्योग के रूप में मक्का प्रसंस्करण की इकाई लगाने के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। इसमें स्टार्च पावडर, कॉर्न फ्लेक्स, कॉर्न फ्लोर की छोटी इकाई लगाने के लिए अलग-अलग रूप से करीब पांच लाख रुपये निवेश की जरूरत होती है। ऑटोमेटिक संयंत्र लगाने के लिए लगभग 20 लाख रुपये तक खर्चा आता है। इसके लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के तहत सब्सिडी पर वित्त का प्रबंध किया जा सकता है। मक्का प्रसंस्करण में करीब 200 मीट्रिक टन प्रति दिन क्षमता की स्टार्च उत्पादन क्षमता वाली इकाई की स्थापना में लगभग 30 करोड़ रुपये निवेश की जरूरत होती है। इस इकाई में मक्का के ग्लूकोज, जर्मस, फाइबर, ग्लूटेन आदि का उत्पादन भी किया जा सकता है।

Tuesday, March 23, 2010

बेची गई प्रॉपर्टी पर कैसे बचाएं टैक्स

सब जानते हैं कि प्रॉपर्टी बाजार काफी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हर साल बड़ी संख्या में प्रॉपर्टी बिक्री संबंधी सौदे होते हैं। जो व्यक्ति प्रॉपर्टी बेचता है उसे काफी मोटी रकम हासिल होती है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति यह जानने का इच्छुक जरूर होता है कि प्रॉपर्टी बेचने से हासिल रकम को वह कैसे टैक्स से बचा सकता है। साथ ही जिसने भी प्रॉपर्टी खरीदी है वह भी संभव है कभी इसे किसी दूसरे को बेचे, ऐसे में वह भी टैक्स बचत की बारीकियां सीखना चाहेगा। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि बेची गई प्रॉपर्टी पर लगने वाले कैपिटल गेन टैक्स से कैसे बचा जा सकता है।लांग टर्म कैपिटल गेन ज्यादा महत्वपूर्णसबसे पहले तो यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि हम केवल लांग टर्म कैपिटल गेन टैक्स के बारे में बात कर रहे हैं। कैपिटल गेन उस प्रॉपर्टी की बिक्री पर लगता है जो आपके पास तीन साल से ज्यादा समय से थी। ऐसी प्रॉपर्टी जो आपके पास तीन साल से कम समय से थी उसकी बिक्री शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन के तहत आती है और उस पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है। इस तरह के शॉर्ट टर्म गेन को आपकी अन्य आय में गिना जाता है जिसके चलते इस पर लगने वाले टैक्स को आप आयकर की धारा 80 सी के तहत मिलने वाली छूट के तहत निवेश कर बचा सकते हैं। 80 सी के तहत पीपीएफ, ईएलएसएस, एनएससी आदि में निवेश किया जाता है।एनएचएआई या आरईसी के बांड्स में निवेशइसके अलावा लांग टर्म कैपिटल गेन पर टैक्स आप दो तरीकों से बचा सकते हैं। टैक्स बचाने का पहला रास्ता है प्रॉपर्टी बेचने से प्राप्त पूंजी को छह महीनों के भीतर एनएचएआई या आरईसी के बांड्स में निवेश किया जाए। यह टैक्स बचाने का सबसे सरल रास्ता है। इसमें परेशानी केवल यह है कि निवेश के लिए दिए गए समय में आपके लिए बांड्स उपलब्ध हो पाएं। दूसरी बात यह है कि इस निवेश पर एक वित्त वर्ष में केवल 50 लाख रुपये की निवेश लिमिट है। ऐसे में यदि आपने प्रॉपर्टी बेचकर इससे भी ज्यादा रकम हासिल की है तो यह रास्ता आपके के लिए ज्यादा फायदेमंद नहीं हो सकता। हां, यह हो सकता है कि आप प्रॉपर्टी बेचने का समय ऐसा चुनें जब छह महीनों के भीतर वित्त वर्ष बदल जाए। ऐसे में आप निवेश की लिमिट को एक करोड़ रुपये तक ले जाए पाएंगे। उदाहरण के लिए यदि कोई प्रॉपर्टी जनवरी में बेची जाती है तो उसके लिए निवेश की छह महीनों की समय सीमा जून में समाप्त होगी। जून अगले वित्त वर्ष में पड़ेगा, ऐसे में आप छह महीनों के भीतर ही एक करोड़ रुपये का निवेश इन बांड्स में कर सकेंगे।दूसरी प्रॉपर्टी में निवेश से बचतलांग टर्म प्रॉपर्टी गेन टैक्स से बचने का दूसरा तरीका है प्राप्त पूंजी को किसी दूसरी प्रॉपर्टी में निवेश करना। इस तरीके से टैक्स छूट हासिल करने के लिए कई शर्तें हैं। इनमें पहली है जो पॉपर्टी बेची गई है वह रेजिडेंशियल होनी चाहिए, कॉमर्शियल नहीं। कॉमर्शियल प्रॉपर्टी की स्थिति में आपको सेक्शन 54एफ का सहारा लेना पड़ेगा। इसके मुताबिक आपको बिक्री से प्राप्त शुद्ध प्राप्ति को निवेश करना होगा न कि केवल कैपिटल गेन अमाउंट। हां यहां रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी का मतलब यह नहीं है कि वह आपकी खुद की हो। रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी किराए पर ली गई भी हो सकती है। दूसरी शर्त के मुताबिक यह छूट व्यक्ति विशेष और हिंदू अधिनियम के तहत अविभाजित परिवार को ही मिल सकती है। ऐसे में यदि कोई कंपनी या हिस्सेदार फर्म प्रॉपर्टी बेचती है तो उसे यह छूट नहीं मिलेगी। करदाता को तैयार रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी या अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी या तो एक साल पहले या बिक्री से दो साल बाद तक खरीदनी होगी। अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी बिक्री के तीन साल बाद तक खरीदी जा सकती है। कंस्ट्रक्शन की शुरुआत को लेकर इसमें कोई प्रतिबंध नहीं है। इसके अलावा यह भी जरूरी नहीं है कि कैपिटल गेन अमाउंट और नए घर की कीमत के बीच कोई संबंध हो। उदाहरण के लिए करदाता प्रॉपर्टी बेचने से हासिल रकम को निवेश करने के बाद बाकी रकम के लिए लोन भी ले सकता है। यदि लोन की वैल्यू कैपिटल गेन के बराबर है तो टैक्स छूट मिल सकती है। यदि लोन वैल्यू कैपिटल गेन से कम है तो भी छूट लोन वैल्यू की हद तक मिल सकती है।तीन साल नहीं बेच सकते नई प्रॉपर्टीनए घर की बिक्री पर तीन साल का लॉक इन है। ऐसे में यदि तीन साल से पहले घर को बेचा गया तो पहले दी गई टैैक्स छूट वापस ले ली जाएगी। ऐसे में कैपिटल गेन टैक्स से बचने के लिए नई प्रॉपर्टी में निवेश के लिए दो से तीन साल का समय मिल जाता है। ऐसे में एक परेशानी है। किसी भी वित्त वर्ष में टैक्स रिटर्न की आखिरी तारीख 31 जुलाई है। ऐसे में यदि डील टैक्स रिटर्न की आखिरी तारीख से पहले नहीं हुई तो क्या होगा। ऐसे में करदाता को नए मकान के लिए रखी रकम को एक स्पेशल डिपॉजिट में रखना होता है जिसे कैपिटल गेन्स डिपॉजिट अकाउंट स्कीम (सी-डिपॉजिट) कहा जाता है। आमतौर पर यह सुविधा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देते हैं।

Monday, March 22, 2010

नशे में एक्सिडेंट पर इंश्योरेंस हो सकता है कम

अखबार में और टीवी पर आए दिन ऐसी खबरें पढऩे और देखने को मिलती हैं कि शराब के नशे में किसी ने लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी या दूसरी गाड़ी में टक्कर मार दी। हालांकि ऐसे मामलों के लिए मोटर व्हीकल एक्ट में कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। ऐसी स्थिति में यह जानना भी बहुत जरूरी हो जाता है कि शराब के नशे में एक्सिडेंट करने की स्थिति में इंश्योरेंस पर इसका क्या असर पड़ेगा। याद रखिए आपकी इंश्योरेंस पॉलिसी पर इसका सीधा असर पड़ता है। लाइफ इंश्योरेंस पर असरयदि हम लाइफ इंश्योरेंस पर पडऩे वाले असर की बात करें तो इसमें दो बातें गौर करने लायक हैं। पहली तो उस स्थिति में जिसने लाइफ इंश्योरेंस करवा रखा है और नशे की स्थिति में गाड़ी चलाते समय हादसे में उसकी मौत हो जाती है। दूसरी बात जो व्यक्ति इस हादसे में प्रभावित होता है। इस बारे में कई लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों से बात की गई और कई पॉलिसी डॉक्यूमेंट्स भी देखे। इनको देखने के बाद यह साफ है कि नशे की हालत में हादसे में मौत होने पर भी बुनियादी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत कवर मिलता है। हालांकि ज्यादातर मामलों में ऐसा देखा गया है कि यदि पॉलिसीधारक ने एक्सिडेंट इंश्योरेंस राइडर ले रखा था तो ऐसी स्थिति में नशे में ड्राइव कर रहे पॉलिसीधारक को राइडर का बेनिफिट नहीं मिलता है। नियम के मुताबिक एक्सिडेंट इंश्योरेंस राइडर में बीमाधारक को मूल इंश्योर्ड रकम के अतिरिक्त रकम मिलती है।थर्ड पार्टी को भुगतान मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी डॉक्यूमेंट्स के अध्ययन और जनरल इंश्योरेंस कंपनियों से बातचीत के मुताबिक एक्सिडेंट में प्रभावित थर्ड पार्टी (नशे में पॉलिसीधारक ने जिसको टक्कर मारी) चालक के नशे में होने के बावजूद क्षतिपूर्ति हासिल करने की हकदार है। हालांकि यह फैसला कोर्ट करता है कि प्रभावित तीसरी पार्टी को क्षतिपूर्ति का भुगतान इंश्योरेंस कंपनी करेगी या वाहन का मालिक। ऐसे ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनियों के बजाय गाड़ी मालिक से थर्ट पार्टी को नुकसान का हर्जाना देने को कहा है। ऐसे में जिस कार से टक्कर मारी गई उसके नुकसान की बात करें तो ड्राइवर के नशे में होने के चलते इंश्योरेंस कंपनी गाड़ी के नुकसान का खर्च नहीं देगी। ज्यादातर देशों में नशे में और ओवरस्पीड में गाड़ी चलाने पर न केवल लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है, बल्कि उस व्यक्ति का इंश्योरेंस प्रीमियम भी भविष्य में बढ़ा दिया जाता है, लेकिन भारत में कार इंश्योरेंस पॉलिसी ड्राइवर के नाम के साथ नहीं दी जाती हैं। ब्रिटेन में कार इंश्योरेंस का प्रीमियम ड्राइवर की उम्र और ड्राइविंग रिकॉर्ड पर निर्भर करता है। यदि एक्सिडेंट ऐसे व्यक्ति ने किया है जिसका नाम इंश्योरेंस पॉलिसी में नहीं है तो नामित को कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। भारत में यह संभव नहीं है क्योंकि यहां यह पता लगाना भी संभव नहीं है कि हादसे के समय गाड़ी कौन चला रहा था। यह खबर आपने भी सुनी होगी कि बांद्रा में एक फिल्म स्टार ने शराब के नशे में लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी थी, लेकिन अभियोजन पक्ष अभी तक यह साबित नहीं कर पाया कि गाड़ी कौन चला रहा था। ऐसे में यहां पर कुछ ड्राइवरों की गलती से जो नशे में ड्राइविंग करते हैं होने वाले नुकसान का बोझ सभी को मिलकर उठाना पड़ता है। ऐसे में ट्राफिक पुलिस को ज्यादा अधिकार दिए गए हैं ताकि नशे में गाड़ी चलाने के खिलाफ सख्त कदम उठाकर ऐसे हादसों को रोकें। इसलिए आगे से जब आप भी किसी पार्टी से निकलें तो इस बात का ख्याल रखें कि नशे में यदि कोई हादसा आपके साथ हो गया तो इसका सीधा असर आपके इंश्योरेंस पर पडऩे वाला है।

Thursday, March 18, 2010

80 सी के अलावा भी हैं इनकम टैक्स बचाने के मौके

ज्यादा से ज्यादा टैक्स सेविंग के लिए ज्यादातर लोग आयकर की धारा 80 सी के तहत दिए गए निवेश विकल्पों की ओर दौड़ते हैं। हालांकि 80 सी की भी एक सीमा है और उसके तहत आप केवल एक लाख रुपये पर ही टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। ऐसे में 80 सी के अलावा कहां बचत की जा सकती है इस पर गौर करना फायदेमंद होगा। धारा 80 सी के तहत आप नीचे दी गई स्कीमों में निवेश कर टैक्स बचत कर सकते हैं: प्रोविडेंट फंड (पीएफ)वॉलेंटरी प्रोविडेंट फंड (वीपीएफ)पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ)नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट्स (एनएससी)इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ईएलएसएस)सीनियर सिटीजंस सेविंग्स स्कीम (एससीएसएस)लाइफ इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स आदिआप अपनी आय से इन योजनाओं में निवेश करते हैं तो उस पर टैक्स छूट पा सकते हैं। लेकिन इस सेक्शन के तहत एक लाख रुपये पर ही टैक्स छूट मिल सकती है ऐसे में आप अधिकतम 30,000 रुपये की बचत ही कर सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 80 सी के अलावा भी टैक्स बचाने के मौके हैं? हां! विकल्प हैं और उनके जरिए काफी टैक्स की बचत की जा सकती है। 80 सी के तहत आने वाली टैक्स छूट अध्याय 6-ए के तहत आती हैं। इसके अलावा भी कई डिडक्शन उपलब्ध हैं जिनके तहत आप छूट का दावा कर सकते हैं। इनमें से सभी डिडक्शन तो आप पर लागू नहीं होंगे, लेकिन कुछ जरूर होंगे जिनसे आप फायदा उठा सकते हैं। सेक्शन 80 डी यदि कोई विकलांग व्यक्ति आप पर निर्भर है तो उस पर होने वाले मेडिकल सहित अन्य खर्च पर आप टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। उस विकलांग व्यक्ति के लिए यदि आप कोई इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदते हैं तो उस पर भी टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं। सेक्शन 80 डीडीबीइसके तहत कुछ खास बीमारियों के इलाज पर किए गए खर्च पर टैक्स छूट का दावा आप कर सकते हैं। चाहे खर्च खुद के इलाज पर किया गया हो या अपने किसी संबंधी पर। सेक्शन 80 ईउच्च शिक्षा के लिए लिए गए लोन के सालभर में किए गए भुगतान के ब्याज पर टैक्स छूट आप हासिल कर सकते हैं। लोन भले ही आपने अपने लिए या संबंधी के लिए लिया हो। सेक्शन 80 जीयदि आप परोपकारी हैं तो चैरिटेबल ट्रस्ट और कुछ सरकारी फंड्स में दान करने पर भी आप टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं। कुछ निश्चित सरकारी फंड््स और चैरिटेलब संस्थाओं को डोनेट (दान) करने पर डोनेशन की रकम पर टैक्स छूट मिलती है। डोनेशन की रकम पर पूरी या कुछ फीसदी छूट मिलती है।सेक्शन 80 जीजीयदि आप घर का किराया चुकाते हैं, लेकिन वेतन के हिस्से के रूप में आपको हाउस रेंट अलाउंस (एचआरए) नहीं मिलता है। या फिर आप खुद का बिजनेस करते हैं और किराए के घर में रहते हैं तो आप किराए की रकम पर टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं। हालांकि इस पर कुछ शर्तें लागू होती हैं। सेक्शन 80 यूऐसा व्यक्ति जो खुद विकलांग है वह आयकर की धारा 80यू के तहत आयकर में छूट हासिल कर सकता है।एचआरए पर टैक्स छूटअध्याय 6-ए के अलावा भी आयकर बचाने के कई और रास्ते हैं। यदि आप वेतनभोगी हैं और एचआरए पाते हैं। ऐसे में यदि आप किराए के मकान में रहते हैं तो एचआरए पर एक निश्चित सीमा तक कुछ शर्तों के साथ टैक्स छूट हासिल की जा सकती है। एलटीए और एलटीसी पर टैक्स छूटयदि आप वेतनभोगी हैं और आपको कंपनी की ओर से लीव ट्रेवल अलाउंस (एलटीए) और लीव ट्रेवल कंसेशन (एलटीसी) मिलता है तो आप एक निश्चित सीमा तक और कुछ शर्तों के साथ इस पर आयकर छूट पा सकते हैं।होम लोन के ब्याज पर छूटयदि आपने घर के लिए बैंक से लोन लिया है और उसकी ईएमआई चुका रहे हैं तो चुकाई गई रकम के ब्याज पर टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं। ऐसे में आयकर बचाने के लिए आपके पास बहुत सारे रास्ते हैं। सेक्शन 80 सी तो उनमें से केवल एक है।—

Friday, March 12, 2010

आंवले की प्रोसेसिंग से करें कमाई

लगातार बढ़ते आयुर्वेद के महत्व के साथ ही आंवला और इसके उत्पादों का बाजार भी बढ़ रहा है, जिसके चलते आवंला प्रसंस्करण श्रेत्र में रोजगार की संभावनाएं बनी हैं। इस समय उत्तर प्रदेश के कई इलाकों (मुख्य तौर पर प्रतापगढ़) में आवंला प्रसंस्करण एक घरेलू उद्योग का रूप ले चुका है। देश के दूसरे भागों में भी बेहद कम निवेश में आवंला प्रसंस्करण की इकाइयां आसानी से लगाईं जा सकती हैं। अभी मप्र में करीब 10 हजार हेक्टेयर में आंवला की खेती की जा रही है। आवंला की प्रोसेसिंग कर इसका मुरब्बा, जैम, जैली, मीठी केंडी, नमकीन केंडी, सुपारी, आचार, चटनी, लड्डू, बरफी, टॉफी, बिस्किट, जूस, शरबत, स्कैवश जैसे फ्रूट प्रोडक्ट बनाए जा सकते हैं। वहीं हेयर शैम्पू, हेयर ऑयल, हेयर डाई, फेसपैक के रूप में सौंदर्य प्रसाधन भी तैयार किए जा सकते हैं। इसके अलावा औषधीय गुण होने के कारण आंवला के कई औषधीय उत्पाद भी बन सकते हैं। जिनमें च्यवनप्राश, आमलकी रसायन, त्रिफला पावडर, ब्रम्ह रसायन, आमलकी अवलेह, धान्नी लोह, आमलकी घृत सहित कई अन्य औषधियां बनाई जा सकती हैं। साथ ही साथ आंवले से आंवला पल्प, स्याही, साबुन भी बनाए जा सकते हैं। आंवले के फ्रूट प्रोडक्ट बनाने के लिए जहां फ्रूट प्रोडक्ट आर्डर (एफपीओ) प्रमाण पत्र लेना पड़ता है। वहीं औषधीय उत्पादों के लिए ड्रग लाइसेंस जरूरी है। आंवला प्रसंस्करण की छोटी इकाई लगाने के लिए करीब पांच लाख रुपये की जरूरत होती है। वहीं घरेलू उद्योग के रूप में बिना किसी निवेश के भी आंवले का प्रसंस्करण किया जा सकता है। छोटी प्रसंस्करण इकाई के लिए बॉयलर, ग्रेटर, हाइड्रोलिक प्रेस, केबिन ड्रायर, पैकिंग मशीन आदि उपकरणों की जरूरत होती है, जबकि घरेलु उद्योग के लिए कड़ाई, टब, गैस अथवा लकडिय़ों का चूल्हा सहित अन्य घरेलू उपकरण इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसके अलावा बड़े स्तर पर आंवला प्रसंस्करण प्रोजेक्ट लगाने के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण रोजगार योजना के तहत 25 लाख रुपये तक ऋण भी लिया जा सकता है। जिसमें सामान्य वर्ग के उद्यमी को 10 प्रतिशत राशि खुद लगानी होती है, वहीं सरकार 25 प्रतिशत सब्सिडी देती है। महिला, एससीएसटी, ओबीसी वर्गों के लिए 5 प्रतिशत राशि खुद वहन करनी होगी, वहीं इस ऋण में सरकार से उन्हें 35 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है।

कम उम्र में बचत शुरू करने के फायदे

हममें से बहुत से लोग निवेश शुरू करने की योजना को टालते रहते हैं। ऐसा करने पर शायद हम यह भूल जाते हैं कि कम उम्र में निवेश शुरू करने के बहुत सारे फायदे होते हैं। जल्दी निवेश शुरू करने से उस पर मिलने वाला कंपाउंड (चक्रवृद्धि) ब्याज और नियमित निवेश जीवन के दूसरे पड़ाव के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण साबित होता है। ऐसे में थोड़ा ही सही लेकिन नियमित निवेश शुरू करने में देरी नहीं करनी चाहिए। जल्द निवेश का फायदा यह होता है कि यह लगातार बढ़ता रहता है और यह एक बड़ी रकम का रूप ले लेती है। उदाहरण के लिए मानो आपने अपने रिटायरमेंट के लिए वर्ष 2008 में निवेश शुरू किया। यदि आप एक लाख रुपये सालाना निवेश करते हैं और इस पर 15 फीसदी सालाना रिटर्न मिलता है तो 2038 तक आपका निवेश 4.35 करोड़ रुपये की भारी रकम का रूप ले लेगा। लेकिन यदि आपने इसमें दो साल की भी देरी की और वर्ष 2010 से निवेश शुरू किया तो 2038 में आपके हाथ में केवल 3.27 करोड़ रुपये ही होंगे। यानी आपको केवल दो साल की देरी की वजह से 1.08 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ जाएगा। यही नहीं आप केवल एक साल की भी देरी करते हैं तो तब आपकी रकम 3.77 करोड़ रुपये ही बनती है यानी 58 लाख रुपये का नुकसान। ये 58 लाख रुपये और कुछ नहीं हैं बल्कि आपके निवेश पर हासिल होने वाला 15 फीसदी रिटर्न ही है। छोटी बचत वालों पर भी यह बात उतनी ही लागू होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बाद के सालों में आप कंपाउंडिंग इंटरेस्ट का फायदा नहीं ले पाते हैं। नीचे एक टेबल दी गई है जिसकी मदद से आप आसानी से समझ पाएंगे कि कैसे एक लाख रुपये विभिन्न ब्याज दरों और सालों में बढ़ता रहता है। दो केस स्टडीज से हम देखेंगे कि जल्दी निवेश कैसे फायदेमंद रहता है। स्टडी-1.रॉबर्ट और अजय ने अपना कैरियर एक साथ 23 साल की उम्र में शुरू किया। केस.1 (अजय)अजय कम उम्र में निवेश शुरू करने के महत्व को समझता था और उसने 25 साल की उम्र में 50,000 रुपये सालाना निवेश शुरू कर दिया। 10 फीसदी सालाना रिटर्न के हिसाब से 10 वें साल के आखिर तक उसके पास 7.97 लाख रुपये की पूंजी जमा हो चुकी थी। यह सालाना ब्याज पर आधारित है न कि कंपाउंड पर। इसके बाद उसने 65 की उम्र तक कोई निवेश नहीं किया और केवल 7.97 लाख रुपये पहले 10 साल में बचाए तो बढ़ते रहे। जब 65 साल का हुआ तो उसके पास एक करोड़ 40 लाख रुपये थे। केस.2 (रॉबर्ट)रॉबर्ट ने पहले खूब खर्च किया और शुरुआती सालों में बचत पर ध्यान नहीं दिया। जब वह 35 साल का हुआ तो उसने निवेश शुरू किया और अगले 30 साल तक 50,000 रुपये सालाना बचाता रहा, जब तक वह 65 साल का हो गया। उसे भी निवेश पर सालाना 10 फीसदी रिटर्न मिला। ऐसे में रॉबर्ट ने अजय के मुकाबले 20 साल ज्यादा निवेश भी किया फिर भी उसके हाथ में 65 की उम्र में केवल 82.2 लाख रुपये थे जो अजय से 43 फीसदी कम हैं।इसे ऐसे समझा जा सकता है- 'एनÓ सालों के बाद 'एÓ अमाउंट 'आईÓ फीसदी की दर से निवेश तो रिटर्न होगा क्र्रस्*[(१+क्रद्बस्)क्रट्टस् क्रठ्ठस्-१]/क्रद्बस्केस स्टडी 2मानो 100 साल बाद रॉबर्टगंज का रॉबर्ट और हरियाणा के अजय का पुनर्जन्म होता है। इस बार रॉबर्ट एक्सट्रा स्मार्ट है और अजय एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। दोनों की उम्र 25 साल हो गई है और वे 60 की उम्र में रिटायर होना चाहते हैं। दोनों अच्छी कमाई करते हैं (एक लाख रुपये सालाना तक निवेश कर सकते हैैं) जिस पर 12 फीसदी सालाना रिटर्न मिल सकता है।केस.1रॉबर्ट जल्दी निवेश शुरू करता है और अगले 10 साल तक एक लाख रुपये सालाना बचाता है और रिटर्न के साथ यह एक अच्छी रकम हो जाती है। इसे वह अपने रिटायर होने तक के लिए निवेश कर देता है। वह अगले 20 साल के लिए भी निवेश कर सकता है, लेकिन अब वह अपने एक लाख रुपये को हर साल घूमने-फिरने पर खर्च करता है। केस.2अजय सोचता है कि रॉबर्ट ईडियट है। वह अपनी लाइफ को एंजॉय नहीं कर रहा है। अगर वह पांच साल बाद निवेश शुरू करेगा तो क्या बिगड़ जाएगा। उसका मानना है कि कुछ साल तो एंजॉय करना ही चाहिए। केस.2.1पांच साल बाद अजय एक लाख रुपये सालाना निवेश शुरू करता है। पांच साल बाद वह देखता है कि रॉबर्ट तो निवेश बंद कर लाइफ को एंजॉय कर रहा है। तो वह भी ऐसा ही करता है। वह भी निवेश रोक देता है। केस.2.2पांच साल बाद अजय निवेश शुरू करता है और सोचता है कि वह रिटायर होने तक अगले 30 साल निवेश करेगा। आखिर में वह रॉबर्ट से ज्यादा धन 12 फीसदी रिटर्न पर चाहता है।केस 2.1: अजय के पास रिटायर होते समय कितना पैसा होगा? 66 लाख रुपये। केस.2.2: में अजय को कितना हासिल होगा-1.64 करोड़ रुपये। और रॉबर्ट, पहले 10 साल तक निवेश कर अगले 20 साल तक एंजॉय करने पर उसके पास रिटायरमेंट के समय 1.72 करोड़ रुपये होंगे। यानी जल्द निवेश शुरू करने वाले को कोई नहीं पहुंच सकता।

फायदेमंद है न्यू पेंशन स्कीम

पिछले महीने पेश किए गए आम बजट में सरकार ने न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) की ओर लोगों को लुभाने की कोशिश की है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपनी घोषणा में कहा कि नया एनपीएस अकाउंट खुलवाने पर सरकार तीन साल तक 1,000 रुपये सालाना का योगदान देगी यानी आपके एनपीएस खाते में सरकार तीन साल तक एक-एक हजार रुपये जमा करेगी। ऐसे में सभी के लिए यह समझना जरूरी हो जाता है कि एनपीएस अकाउंट क्या है, आम निवेशकों के लिए इसका क्या महत्व है और इसके क्या फायदे हैं।पीएफआरडीए की स्कीम सरकार ने साल 2003 में पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (पीआरएफडीए) का गठन किया था। पीआरएफडीए इस समय देश में पेंशन सुधारों और नियमन के लिए नियामक की भूमिका निभाता है। एक मई 2009 तक इसकी भूमिका राज्यों और केंद्र के कर्मचारियों द्वारा जमा पेंशन को रेगुलेट करने की थी। इसके बाद जनवरी 2004 के बाद नौकरी शुरू करने वाले कर्मचारियों के लिए सरकार ने पेंशन का मार्केट लिंक्ड सिस्टम पेश करने की योजना बनाई। आम लोगों के लिए इस पेंशन स्कीम को 1 मई 2009 से खोल दिया गया।कैसे खोलें खाता एनपीएस अकाउंट स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एक्सिस बैंक, आईडीबीआई, सेंट्रल बैंक और यूनियन बैंक आदि में जाकर 18 से 55 साल का कोई भी व्यक्ति खुलवा सकता है। यह खाता खुलवाले के लिए शुरुआती शुल्क (इसमें पहले साल का वार्षिक रखरखाव शुल्क भी शामिल है ) 470 रुपये लगता है। दूसरे साल का एनुअल मैंटीनेंस चार्ज (एएमसी) 350 रुपये लिया जाता है। इस खाते में एक साल में कम से कम ४ सब्सक्रिप्शन करना और 6,000 रुपये डालना जरूरी है। हर ट्रांजेक्शन पर 10 रुपये शुल्क लिया जाएगा। रिकॉर्ड का रखरखाव करने वाली एजेंसी के लिए भी शुल्क वसूला जा सकता है जो अकाउंट बैलेंस का .0165 फीसदी हो सकता है। एनपीएस अकाउंट का रखरखाव सेंट्रल रिकॉर्ड कीपिंग एजेंसी एनएसडीएल कर रही है।उम्र के हिसाब से निवेशइस पेंशन स्कीम में निवेश के दो विकल्प होते हैं। या तो सेविंग्स को ऑटो मोड में रखा जा सकता है। इसके तहत निवेश को उम्र के मुताबिक लार्ज कैप इंडेक्स वाले स्टॉक्स में रखा जाता है। जैसे 35 साल की उम्र तक 50 फीसदी और आगे 55 की उम्र तक 10 फीसदी निवेश इसमें किया जाता है। या फिर नीचे दिए तीन फंड्स में से आप खुद चुन सकते हैं। विकल्प ई- एग्रेसिव फंड, जिसमें 50 फीसदी निवेश लार्ज कैप इंडेक्स के स्टॉक्स में किया जाए और 50 फीसदी बांड में लगाया जाए। विकल्प-सी इसमें मॉडरेट फंड होते हैं, जिसके तहत कॉरपोरेट और सरकारी बांड्स में निवेश किया जाता है। इसके अलाव तीसरा विकल्प-जी के तहत कंजरवेटिव फंड होते हैं जिनके तहत राज्यों और केंद्र सरकार के बांड्स में निवेश किया जाता है। इस स्कीम में आपकी उम्र 60 साल होने तक इनमें से किसी भी फंड में निवेश रहता है और इसके बाद अंतिम बैलेंस का 60 फीसदी आप निकाल सकते हैं और बाकी 40 फीसदी आपकी पेंशन के लिए चला जाता है।60 से पहले निकासी इसमें 60 साल की उम्र होने से पहले भी आप पैसा निकाल सकते हैं, लेकिन इस पर काफी कड़े प्रतिबंध हैं और बहुत जरूरी कारण होने पर ही पैसा निकालने की इजाजत दी जाती है। ऐसे में यदि 60 साल की उम्र होने से पहले ही इसमें से कुछ पैसा निकाल लिया जाता है तो 60 साल उम्र होने पर कुल जमा रकम में से आप केवल 20 फीसदी ही निकाल पाएंगे और बाकी 80 फीसदी रकम पेंशन के लिए चली जाएगी।आसान जमा, टैक्स छूट का फायदा भीएनपीएस में हर साल कम से कम 6,000 हजार रुपये जमा करने होंगे और नए बजट में की गई घोषणा के मुताबिक अगले वित्त वर्ष में नए अकाउंट खुलवाने वालों के खाते में पहले तीन साल तक हर साल 1,000 रुपये सरकार जमा करेगी। खाते में 12,000 रुपये के सालाना जमा पर 1,000 रुपये की टैक्स छूट भी 80सी के तहत हासिल की जा सकती है। यह छूट निवेश के समय ही मिल सकती है। इस निवेश पर हासिल होने वाले रिटर्न पर भी टैक्स छूट मिलती है, लेकिन अंतिम समय पैसे निकाले पर टैक्स लगेगा, क्योंकि तब इसे इनकम में गिना जाएगा। बजट में केंद्र सरकार ने इस न्यू पेंशन स्कीम को लोकप्रिय करने की कोशिश की है क्योंकि आम भारतीयों के पास सामाजिक सुरक्षा के नाम पर कुछ भी नहीं है। हालांकि सरकार की ओर से जमा रूपी सहयोग की यह घोषणा फिलहाल वित्त वर्ष 2010-11 के लिए ही की गई है।

Tuesday, March 9, 2010

बजट और बैंकों की मार ने तोड़ा घर का सपना

अपना घर खरीदने की तैयारी कर रहे लोगों को अपनी योजना बदलनी पड़ सकती है। हफ्ते भर पहले आए बजट में घर के सपने को कुछ झटका लगा है। बजट में घर की निर्माण लागत पर 10 फीसदी सर्विस टैक्स लगाया गया है। साथ ही बैंकों से सस्ती दर पर होम लोन का दौर भी अब समाप्त होने लगा है। ज्यादातर बैंक होम लोन की दरों में 0.25 से 0.50 फीसदी की बढ़ोतरी कर रहे हैं। ऐसे में 20 साल के लिए 20 लाख रुपये का नया होम लोन लेने वालों को मासिक किस्त (ईएमआई) के रूप में करीब 633 रुपये ज्यादा चुकाने पड़ेंगे। पहले लोन ले चुके लोगों को जहां 20 साल के लोन पर 17,041 रुपये की मासिक किस्त चुकानी पड़ रही है। वहीं अब लोन लेने वालों को 17,674 रुपये चुकाने होंगे। दो-तीन महीने में फिर बढेंग़ी दरेंघर खरीदने के सपने एक और बड़ा झटका अप्रैल के बाद कभी भी और लग सकता है। बैंकर्स का कहना है कि अप्रैल में रिजर्व बैंक अपनी अगली मौद्रिक नीति समीक्षा पेश करेगा। इसके बाद बैंक होम लोन की ब्याज दरों में 0.25 फीसदी से 0.50 फीसदी की बढ़ोतरी और कर सकते हैं। इसके बाद घरों की बिक्री में भी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। मुंबई के कुछ डेवलपर्स का तो कहना है कि अभी से घरों की इंक्वायरी में गिरावट आई है। रियल एस्टेट कंसल्टेंट एंड प्रॉपरिएटर अशोक नारंग ने के मुताबिक मुंबई में पिछले एक सप्ताह में प्रॉपर्टी की बिक्री और इंक्वायरी में 50 फीसदी तक की गिरावट आई है। वहीं, नाहर गु्रप के चेयरमैन सुखराज नाहर का कहना है कि निर्माण सामग्री पर बढ़ाए गए उत्पादन और सेवा कर से पस्त हो गए हैं। निर्माण सामग्री पर करों का बोझ बढऩे से घर महंगे हो गए हैं और वे अफोर्डेबल नहीं रह गए हैं। साथ ही बैंक भी होम लोन पर दरें बढ़ा रहे हैं। ऐसे में दोनों तरफ से अपने को घिरता देखकर ग्राहक घर खरीदने की योजना टाल सकते हैं। अगले दो महीनों में इसका असर जरूर दिखेगा, क्योंकि तब तक सर्विस टैक्स प्रभावी हो चुका होगा। बैंकों की ओर से होम लोन दरों में बढ़़ोतरी से ग्राहकों के लिए घर कम से कम 10 फीसदी और महंगा हो जाएगा।होम लोन पर सख्त हुए बैंकहोम लोन दरों पर बैंकों के सख्त रुख से घर खरीदने का फैसला और भी कठिन हो गया है। गुुरुवार को ही निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंकों आईसीआईसीआई और एचडीएफसी ने अपनी टीजर होम लोन की स्कीमों को खत्म करने की घोषणा की है, जिनके तहत शुरुआती वर्षों में होम लोन की ब्याज दरें कुछ कम 8 से 8.25 फीसदी थीं। कोटक महिंद्रा बैंक भी होम लोन की दरों में बढ़ोतरी की घोषणा कर चुका है। कुछ सप्ताह पहले दो अन्य बैंकों ने टीजर होम लोन दरें वापस ले ली थीं। महंगाई को काबू में करने के लिए रिजर्व बैंक ने पिछले महीने मौद्रिक नीति समीक्षा में सीआरआर को 0.75 फीसदी बढ़ाकर 5.75 फीसदी कर दिया था। ऐसे में बैंकों ने भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी के संकेत देेने शुरू कर दिए। होम लोन लेने वाले सभी नए ग्राहकों को अब 0.25 से 0.50 फीसदी तक अतिरिक्त ब्याज देना होगा। पहले दो साल के लिए 8.25 फीसदी की फिक्स्ड रेट पर दी जा रही होम लोन की सुविधा को 27 फरवरी से समाप्त कर दिया है। वहीं, आईसीआईसीआई बैंक के प्रवक्ता ने कहा कि दो साल के लिए फिक्स्ड रेट पर होम लोन की स्कीम को एक मार्च 2010 से समाप्त कर दिया गया है। फिलहाल होम लोन की फ्लोटिंग रेट 30 लाख रुपये तक 8.75 फीसदी, 30 से 50 लाख रुपये तक 9 फीसदी और 50 लाख रुपये से ज्यादा पर 9.5 फीसदी है। बैंकर्स का कहना है कि अन्य बैंक भी जल्द ही इसी तरह के कदम उठा सकते हैं। एक्सिस बैंक और यूनियन बैंक भी विशेष होम लोन सुविधा को बंद करने की घोषणा कर चुके हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने नवंबर में विशेष दरों को 31 मार्च 2010 तक बढ़ा दिया था। हालांकि एसबीआई के प्रवक्ता से इस पर प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। बैंक ऑफ इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बी.ए.प्रभाकर ने कहा कि 8 फीसदी पर होम लोन की विशेष सुविधा फरवरी आखिरी तक थी और इसे बढ़ाने की बैंक की कोई योजना नहीं है। हालांकि मार्च के अंत या अप्रैल तक दरें बैंक संभवत नहीं बढ़ाएगा।

Friday, March 5, 2010

उपयुक्त फंड चुनने के लिए अपनाएं कुछ फंडे

म्यूचुअल फंड्स तेजी से खुदरा निवेशकों के लिए इंवेस्टमेंट व्हीकल के रूप में लोकप्रिय हो रहे हैं। लेकिन अब भी उपयुक्त फंड चुनना निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन यह काम ज्यादा कठिन नहीं है। अपना वित्तीय भविष्य सुरक्षित करने के लिए निवेशकों को केवल थोड़ा सा अनुशासन और समय खर्च करना पड़ेगा। कुछ नियमकों को अपना कर सही निवेश किया जा सकता है और आसानी से वित्तीय लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।अपने बारे में पूरी तरह जानेंअपना वित्तीय लक्ष्य हासिल करने के लिए सबसे जरूरती और पहला काम है अपने आप के बारे में पूरी तरह जानना। इस बात का अनुमान लगाने की कोशिश कीजिए कि आप कितना रिस्क उठा सकते हैं। अपनी सहनशीलता का परीक्षण कीजिए। यदि आपने 10,000 रुपये का निवेश किया और बाजार गिरने से यह घटकर 6,000 रुपये ही रह गया तो आप विचलित हो उठते हैं और तनाव में आ जाते हैं। भले ही यह बढ़कर वापस अपने पहले स्तर पर आ जाता है, लेकिन इससे यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि आक्रामक यानी ज्यादा रिस्की इक्विटी फंड में निवेश आपको नहीं करना चाहिए।वास्तविकता से दूर न होंआपका लक्ष्य क्या है? यदि आप अपने 10,000 रुपये के निवेश को दो साल में 50,000 रुपये करना चाहते हैं तो एक मध्यम अवधि वाला बांड फंड आपके लिए सही नहीं है। इसलिए अपने लक्ष्यों और अपने फंड के लिए वास्तविकता में रहते हुए अपनी उम्मीदें तय कीजिए।जानिए, आप क्या खरीद रहे हैंजब आपने अपने बारे में जान लिया यानी अपनी क्षमताओं को परख लिया तो फंडों को नजदीक से जानने पर थोड़ा समय खर्च कीजिए। बहुत से फंडों के प्रोस्पेक्टस में दिया गया उद्देश्य काफी अधूरा सा होता है और वास्तविकता से मेल नहीं खाता है। सहज रूप से उपलब्ध पोर्टफोलियो और फंड मैनेजरों की समीक्षा के आधार पर आप फंड्स की कार्यशैली और रणनीति को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। इससे आपको अपना पोर्टफोलियो सार्थक रूप से डाइवर्सिफाई करने में मदद मिलेगी। इससे आपको संभावित रिस्क को आंकने में भी मदद मिलेगी। आमतौर पर लार्ज कैप वाले वैल्यू फंड्स कम रिस्की होते हैं जबकि स्मॉल कैप वाले ग्रोथ फंड्स ज्यादा रिस्क वाले होते हैं।सेक्टर की क्षमता का मूल्यांकन करेंआपको इस बात की जानकारी जरूर रखनी चाहिए कि जिन फंड्स ने अपनी ज्यादातर पूंजी एक या दो सेक्टर्स के शेयरों में लगा रखी है उनमें ज्यादा उतार चढ़ाव होगा। पूरी तरह से डाइवर्सिफाइड फंडों में यह खतरा कम होता है। फंड का सेक्टोरल इतिहास देखने से आपको फायदा होगा। क्या फंड मैनेजर किसी सेक्टर में जल्दी-जल्दी घुस और बाहर हो रहे हैं। यदि ऐसा है तो उस फंड में निवेश से आपको घाटा उठाना पड़ सकता है, यदि मैनेजर ने कोई गलत कदम उठा लिया।पोर्टफोलियो है महत्वपूर्ण एक ऐसा पोर्टफोलियो जो 20 या 30 स्टॉक ही रखता है और उनमें से भी कुछ में ही ज्यादातर निवेश करता है उसमें उतार-चढ़ाव या कहें कि रिस्क उस फंड के मुकाबले ज्यादा होता है जिसका पोर्टफोलियो 100 से भी ज्यादा शेयरों तक फैला है। लेकिन इस कंसेंट्रेशन का फायदा भी मिल सकता है यदि ये शेयर मार्केट में जोर दिखाते हैं तो रिटर्न भी ऐसे पोर्टफोलियो में ज्यादा होगा। ऐसे में आप अपने पोर्टफोलियो में एक कंसेंट्रेटेड फंड भी जोड़ सकते हैं। ऐसे फंड जो 10 या 20 शेयरों में ही अपना ज्यादातर निवेश करते हैं। लेकिन बड़े स्तर पर आपके कोर फंड्स अच्छी तरह से डाइवर्सिफाइड होने चाहिए जिनके बारे में सही अनुमान भी लगाया जा सके। ऐसे में थोड़े से शेयरों में ज्यादा निवेश करने वाला फंड आपके निर्टन को बढ़ा सकता है, लेकिन पूरी तरह से डायवर्सिफाइड फंड आपका रिस्क कम करने में मदद करेगा। फंड के प्रदर्शन की सही समीक्षा करेंध्यान रखें, फंड का पिछला प्रदर्शन भविष्य के अच्छे परिणाम की गारंटी नहीं है। निवेशकों को इस बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिए। यह बात आपको अपने बैंक अकाउंट नंबर से भी ज्यादा अच्छे से याद होनी चाहिए। किसी भी फंड में निवेश करते समय जरूरत अपने आप में इस बात को दोहराना चाहिए। क्योंकि हो सकता है कि कुछ महीनों की तेजी के बाद गिरावट का दौर आने वाला हो और आपको झटका लग जाए। वर्ष 2000 में आईसीई के कंसेंट्रेटेड फंडों के साथ ऐसा हो चुका है। इस बात का भी ख्याल रखें कि शॉर्ट टर्म रिटर्न पर फोकस न करें। जब फंड चुनना हो तो उसके तिमाही दर दिमाही और साल दर साल के प्रदर्शन को देखें।अपने पोर्टफोलियो को समझेंयदि आपका पोर्टफोलियो लार्ज कैप के शेयरों पर ज्यादा ही केंद्रित है। ज्यादा रिटर्न देने वाले लेकिन रिस्की शेयरों पर केंद्रित है। ऐसे में स्मॉल कैप वाले शेयरों पर भी आपको ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा एक अनुशासित निवेशक बनने की भी जरूरत है। एक बार फंड चुन लिया तो उसके साथ रहिए और आगे जाने से डरिए मत।

Tuesday, March 2, 2010

सोया प्रोसेसिंग में भी आजमाएं हाथ

सेहत के लिए फायदेमंद होने के कारण डीओसी और तेल के अलावा भी सोया प्रोसेसिंग से तैयार उत्पादों का बाजार दिन पर दिन बढ़ रहा है। इन उत्पादों में सोया दूध, पनीर, दही, लस्सी, सोया दाल, सोया आटा एवं इसके बेकरी उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। इस आधार पर सोयाबीन प्रोसेसिंग में उद्योगों के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं।बड़े उद्योगपतियों के साथ ही छोटे उद्यमियों के लिए भी इस क्षेत्र में आगे बढऩे के लिए अभी पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। विशेषज्ञों के अनुसार न्यूनतम 2 लाख रुपये का निवेश कर प्रतिदिन (8 घंटे की शिफ्ट) एक क्विंटल सोया आटा उत्पादन किया जा सकता है। इससे उत्पादन में साल भर में 10-11 लाख रुपये तक कारोबार किया जा सकता है। जिसमें सवा से डेढ़ लाख रुपये तक का मुनाफा कमाया जा सकता है। इसी तरह सोया दूध, पनीर, दही, लस्सी या इससे जुड़े अन्य उत्पादों के लिए लगभग 3 लाख रुपये का निवेश कर आठे घंटे की शिफ्ट में प्रतिदिन 50 किलो पनीर (टोफू) का उत्पादन होता है। मौजूदा बाजार भाव 50 किलो प्रतिदिन की उत्पादन क्षमता के साथ 5 लाख रुपये तक का सालाना कारोबार किया जा सकता है। जिसमें से एकसे सवा लाख रुपये का लाभ शामिल रहता है। इसी तरह बिस्किट अथवा बेकरी उत्पाद की छोटी इकाई लगाने के लिए न्यूनतम 1 लाख रुपये लगाकर आठ घंटे की शिफ्ट में प्रतिदिन 50 किलो बिस्किट बनाए जा सकते हैं। जिसमें सामान्यत: छह से सात लाख रुपये का सालाना कारोबार होने पर एक लाख रुपये का सीधा फायदा उद्यमी को होता है। इसी तरह सभी इकाइयों में निवेश के अनुपात में उत्पादन, सालाना कारोबार और मुनाफे की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। इन्हीं इकाइयों में सोया सॉस सहित सोयाबीन के अन्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं।इनकी स्थापना के लिए केन्द्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ लिया जा सकता है। वहीं मप्र की राजधानी भोपाल स्थित सोयाबीन प्रसंस्करण एवं उपयोग केन्द्र, केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान द्वारा नाममात्र का शुल्क लेकर सोया दूध, सोया पनीर, सोया आटा सहित अन्य बेकर उत्पाद, स्नेक्स, सोया पोहा, सोया श्रीखंड, सोया आइसक्रीम, सोया सत्तू, सोया बड़ी सहित अन्य उत्पादों से संबंधित इकाई लगाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण एवं जानकारी दी जाती है। संस्थान द्वारा इसके लिए सालभर में 12 बैचों के अंतर्गत प्रशिक्षण दिया जाता है।खास बात यह है कि देश केकु ल सोयाबीन उत्पादन में मप्र करीब 76 प्रतिशत भागीदार के साथ पहले नंबर पर है। सोयाबीन अन्य अनाजों की तुलना में मानव स्वास्थ्य के लिए विशेष तौर पर अधिक पौष्टिकमाना जाता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 40 प्रतिशत होती है, जो कि अन्य अनाजों की तुलना में ज्यादा है। इन सबके बावजूद भी मप्र में तेल और डीओसी के अलावा अन्य खाद्य उत्पाद बनाने वाली इकाईयों की संख्या बेहद कम है। मप्र में इस समय सोयाबीन प्रसंस्करण आधारित इकाइयों की संख्या महज 21 के आसपास है। वहीं पंजाब में 70, दिल्ली में 30, आंध्रप्रदेश में 25, महाराष्ट्र में 25 सहित पूरे भारत में कुल मिलाकर 225 इकाइयां ही सोया दूध एवं बेकरी के अन्य उत्पाद बना रही है।