Wednesday, July 21, 2010

डाटा रिजेक्ट होने से रुक सकता है लोन

बैंक कई बार सही तरीके से डाटा अपलोड नहीं कर पाते हैं और यह रद्द हो जाता है। ऐसे में सिबिल के पास सही-सही जानकारी नहीं जाती है और क्रेडिट रिपोर्ट अपडेट नहीं हो पाती है, जो लोन रद्द होने का कारण बनती है।एक कंस्ट्रक्शन फर्म में नौकरी कर रहा समीर अपने मकान की मरम्मत के लिए लोन लेना चाहता था। लेकिन उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि प्राइवेट सेक्टर के दो बड़े बैंकों ने लोन संबंधी उसका आवेदन खारिज कर दिया। एक बैंक से उसने जब उसने इसका कारण जानना चाहा तो उसे बताया गया कि आपने पिछले पांच महीनों से अपने क्रेडिट कार्ड का बिल नहीं भरा है। उसको बड़ा झटका लगा। आर्थिक परेशानी की वजह से दो महीने वह बिल नहीं जमा कर पाया था, लेकिन तीसरे महीने उसने पूरा बकाया चुका दिया था।5-6 फीसदी आकंड़े रिजेक्टसमीर की परेशानी का कारण यह हो सकता है कि तीसरे महीने जब उसने पूरा भुगतान किया तब आईटी सिस्टम ने इसे खारिज कर दिया हो। बैंक और नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (एनबीएफसी) ने बात करने पर बताया कि बैंक और एनबीएफसी जो लोन देते हैं उसका रिकॉर्ड रखने वाले क्रेडिट ब्यूरो में जब वे आंकड़े अपडेट करते हैं तो कुछ आंकड़े रिजेक्ट हो जाते हैं। एक अधिकारी ने बताया कि जरूरी फाइल में कुछ कमी होने की वजह से कुछ डाटा अपलोड नहीं हो पाता है। बाद में इसे सही करके फिर से भेजा जाता है तब यह एक महीने बाद अपलोड होता है। कई बार डाटा रिजेक्ट होने का प्रतिशत 5-6 फीसदी तक भी होता है।सरकारी बैंकों का रिकॉर्ड खराबएक अन्य अधिकारी ने बताया कि डाटा रिजेक्ट होने का प्रतिशत अलग-अलग बैंकों में कम या ज्यादा हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में यह ज्यादा होता है। उनका कहना है कि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की डाटा क्वालिटी अच्छी होती है और करीब 80 फीसदी डाटा अपलोड हो जाता है। सार्वजनिक बैंकों की कई शाखाओं में तो ज्यादा बिजनेस होने से केवल 30-40 फीसदी डाटा ही अपलोड हो पाता है और बाकी रद्द हो जाता है। उनका कहना है कि आंकड़ों की गुणवत्ता वैश्विक मानकों के मुताबिक नहीं होने से इतने ज्यादा आंकड़े रद्द हो जाते हैं। ऐसे में जानकारों का कहना है कि लोन के भुगतान की सही तस्वीर क्रेडिट ब्यूरो इसी कारण से नहीं दिखा पाता है।बिना वजह डिफाल्टरअभय काउंसलिंग सेंटर के मुख्य काउंसलर वीएन कुलकर्णी ने बताया कि बहुत सारे ऐसे मामले होते हैं जिनमें बिना कारण के भी किसी को डिफाल्टर दिखा दिया जाता है। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिन्हें बैंक तो कहते हैं कि उनका भुगतान पूरा है, लेकिन रिकवरी एजेंट उन्हें भुगतान के लिए कहते रहते हैं। डाटा रिजेक्ट होना भी इसका प्रमुख कारण है। आखिर डाटा रिजेक्ट ही क्यों होता है। एक कार फाइनेंस कंपनी के प्रमुख ने बताया कि यदि डाटा सही रूप में नहीं भरा जाता है तो वह अपलोड नहीं हो पाता है। उन्होंने बताया कि बहुत सारी ऐसी बातें होती हैं जो ब्यूरो को रिपोर्ट भेजने से पहले भरनी अनिवार्य होती हैं और तकनीकी कारणों से यह रद्द हो जाती है।बैंकों की लापरवाही है कारणक्रेडिट इंफोर्मेशन ब्यूरो ऑफ इंडिया लिमिटेड (सिबिल) के मैनेजिंग डायरेक्टर अरुण ठुकराल के मुताबिक अनिवार्य कॉलम बैंकों की ओर से नहीं भरे जाने की वजह से यदि डाटा रिजेक्ट हो जाता है तो क्रेडिट रिकॉर्ड अपलोड नहीं हो पाता है। उसमें सिबिल भी कुछ नहीं कर पाता है। जन्म तिथि, टेलीफोन नंबर, पैन नंबर, पासपोर्ट नंबर आदि ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें डाटा में भरना जरूरी होता है। कभी-कभी रिकॉर्ड आपस में मिल भी जाते हैं। ऐसे में यदि बैंक जब डाटा अपलोड की परेशानी खुद हल नहीं कर पाते हैं तो सिबिल की टीम भी भेजी जाती है। उन्होंने कहा कि डाटा रिजेक्शन का प्रतिशत अलग-अलग बैंकों का अलग-अलग होता है। सिबिल 95 फीसदी आंकड़े मासिक आधार पर अपडेट करता है, जबकि बाकी साप्ताहिक आधार पर भी बदले जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति की जन्म तिथि आदि पूरी जानकारी नहीं मुहैया कराई जाती तब तक वे रिपोर्ट नहीं दे पाते हैं। यही कारण होता है कि जिस व्यक्ति पर किसी तरह का बकाया नहीं होता है, उसे भी गलती से कई बार डिफाल्टर की सूची में डाल दिया जाता है।