Sunday, June 27, 2010

छोटी बचत-बड़ा फायदा

कहा जाता है कि हमारे देश में वित्तीय साक्षरता यानी वित्तीय योजनाओं की जानकारी काफी कम है। ज्यादातर भारतीय युवाओं खासकर कॉलेज में पढऩे वालों और बेरोजगार युवकों में बचत की प्रवृत्ति बहुत कम होती है, जबकि खर्च करने के मामले में वे बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते। नौकरीपेशा लोगों में भी स्थिति कुछ अच्छी नहीं है। नौकरी लगने के पहले कुछ सालों में वे मौज मस्ती के मूड में होते हैं और बचत करने से परहेज करते हैं। जबकि उन्हें इस बात को समझना चाहिए कि शादी के बाद बचत करना उतना आसान नहीं होता जितना शादी के पहले और नौकरी के पहले कुछ सालों में होता है। उन्हें यही लगता है कि अभी इसकी जरूरत क्या है या फिर इतनी कमाई नहीं हो रही है कि वित्तीय योजना बनाई जा सके। जबकि सच्चाई यही है कि थोड़ी कमाई में थोड़ी बचत की आदत भी डाली जाए तो बाद में यह बचत काफी मदद कर सकती है।वित्तीय योजना बनाने का मतलब यह नहीं है कि एक बार में ज्यादा धन का निवेश किया जाए या फिर कुछ महीनों या कुछ साल के लिए योजना बनाई जाए। कम राशि के निवेश से लंबी अवधि के लिए आसानी से योजना बनाई जा सकती है जिस पर बढिय़ा रिटर्न मिल सकता है। युवा निवेशकों के पास दूसरे निवेशकों की तुलना में निवेश करने का वर्ष ज्यादा होता है। इस वजह से उनके निवेश पर लंबी अवधि में रिटर्न मिलने की दर भी ज्यादा होती है। इसके अलावा वे ज्यादा उम्र के निवेशकों की अपेक्षा ज्यादा जोखिम उठा सकते हैं। मान लें कि कॉलेज जाने वाला आम युवा हर महीने कम से कम 500 रुपये खर्च करता है। अब अगर इसकी गणना करें तो पता चल जाएगा कि पूरी पढ़ाई के दौरान उनका कुल खर्च कितना हुआ। अगर इतनी ही राशि हर महीने बचाई जाए और उसे 30 वर्षों तक निवेश किया जाए जिस पर 12 फीसदी की दर से रिटर्न मिल रहा हो तो आपके पास 30 वर्ष बाद लाखों रुपये का बैलेंस होगा। भारत में युवाओं की तादाद बाकी दूसरे उम्र के लोगों की तुलना में ज्यादा है। पिछले कुछ सालों में भारतीय अर्थव्यस्था में जबर्दस्त उछाल देखने को मिला है। इसकी वजह से लोगों के पास अतिरिक्त धन जमा हुआ है। भविष्य की जिंदगी को ध्यान में रख कर युवा आसानी से वित्तीय योजना अपना सकते हैं। मगर दिक्कत यह है कि ज्यादातर युवा इसकी योजना नहीं बनाते हैं। साथ ही जिन युवाओं की अच्छी खासी कमाई है वे भी बिना योजना के निवेश करते रहते हैं। जबकि उनके लिए बेहतर यही है कि किसी एक साधन में निवेश करने की बजाय अलग-अलग साधनों में निवेश करें। इनमें इक्विटी, डेट, रियल एस्टेट, सोना या फिर फिक्स्ड डिपॉजिट और मासिक बचत योजना कुछ भी हो सकता है। उदाहरण के लिए 23 वर्ष का कोई युवा 60 वर्ष तक हर महीने 2,000 रुपये की बचत करता है और उस पर उसे 15 फीसदी सालाना की दर से रिटर्न मिलता है तो उसके पास 60 वर्ष बाद 3,96,06,204 रुपये की पूंजी होगी। इस लिहाज से अगर उसकी तनख्वाह में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं भी होती है या फिर वह इससे ज्यादा का निवेश नहीं भी करता है तो भी उसे रिटायरमेंट के बाद ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इतनी कम राशि के निवेश से ही उसकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत होगी। कहने का मतलब यही है कि कम राशि को भी अगर कम उम्र से ही व्यवस्थित और योजनाबद्ध तरीके से निवेश किया जाए तो उससे बड़ी पूंजी बनाई जा सकती है। वित्तीय योजना बनाते समय युवा निवेशकों को सबसे पहले उन एसेट को चुनना चाहिए जिनमें वे निवेश कर सकते हैं। एसेट चुनने के बाद उनके उत्पादों को चुन कर निवेश की कर सकते हैं शुरुआत।

Tuesday, May 25, 2010

बुजुर्गों को अब रिवर्स मोर्गेज लोन से ज्यादा सहारा

घर गिरवी रखने के बदले सीनियर सिटीजंस को नियमित मासिक आय की सुविधा देने वाली रिवर्स मोर्गेज स्कीम में अब ज्यादा मासिक आय मिल सकती है। पहले जितनी मासिक आय इस स्कीम में मिलती थी, उससे करीब तीन गुना अब मिल पाएगी। इसका श्रेय स्टार यूनियन दाइची लाइफ इंश्योरेंस को जाता है जिसने रिवर्स मोर्गेज लोन देने वाले बैंकों को एक सुरक्षा चक्र मुहैया करा दिया है। इसके चलते वे सीनियर सिटीजंस ज्यादा मासिक आय दे पाएंगे। क्या है रिवर्स मोर्गेज स्कीम रिवर्स मोर्गेज स्कीम के तहत जिस सीनियर सिटीजन का अपना घर है वह उसे बैंक के पास गिरवी रखकर एक निश्चित राशि हर महीने हासिल कर सकता है, यही नहीं वह उस घर में रह भी सकता है। इसमें लोन की अवधि के दौरान उसे किसी तरह का ब्याज भी नहीं चुकाना होता है। लोन की राशि ब्याज सहित लोन लेने वाले व्यक्ति और उसकी पत्नी या पति की मृत्यु के बाद घर को बेचकर बैंक वसूल लेता है। उम्र के आधार पर लोन की गणनारिवर्स मोर्गेज लोन की स्कीम के लिए दिशा निर्देश तय करने वाले नेशनल हाउसिंग बोर्ड में असिस्टेंट जनरल मैनेजर पीआर जयशंकर ने कहा कि पहले के रिवर्स मोर्गेज प्रोडक्ट में सीनियर सिटीजंस के लिए भुगतान की गणना 20 साल की निश्चित अवधि के आधार पर की जाती थी। इसमें ब्याज भी जोड़ा जाता था। सीनियर सिटीजंस को दी जाने वाली मासिक रकम भी कम थी। अब एक इंश्योरेंस कंपनी बीमांकिक गणना कर रही है। इसमें किसी देश के खास आयु वर्ग की आगे की संभावित जिंदगी के आधार पर गणना की जाती है, जिसमें सीनियर सिटीजंस के लिए मासिक आय तीन गुना तक हो गई है। नया प्रॉडक्ट कुछ अलग है और काफी आसान है। उम्र के साथ बढ़ती जाएगी मासिक आयऐसे में यदि किसी सीनियर सिटीजन के घर की आज बाजार भाव पर कीमत 50 लाख रुपये है तो वह इसका 75 फीसदी यानी 37.5 लाख रुपये लोन मासिक किस्तों के रूप में ले सकता है। अब दाइची ने जो इंश्योरेंस कवर मुहैया करवाया है इससे बैंक उसी प्रॉपर्टी की ज्यादा कीमत आंककर ज्यादा मासिक दे सकेंगे। जो सीनियर सिटीजन 60 साल की उम्र में पहले 10 से 18 हजार रुपये मासिक ही हासिल कर पाता। इसमें वह तय करता है कि या तो उसकी संतान लोन चुका देगी या फिर बैंक प्रॉपर्टी को बेचकर लोन वसूल लेगा। इसमें वह अब 33 हजार रुपये तक मासिक हासिल कर सकेगा। उम्र के साथ-साथ लोन से मासिक आय भी बढ़ती चली जाएगी यानी उसे 60 की उम्र के बजाय 75 की उम्र में ज्यादा मासिक रकम मिलेगी। एक साथ भी ले सकते हैं 25 फीसदी लोनसेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पहले ही स्टार यूनियन दाइची से समझौता कर चुका है। होम लोन देने वाला एक अन्य बैंक जिसने सबसे पहले रिवर्स मोर्गेज लोन दिया था, दाइची से इस तरह का समझौता करने की तैयारी कर रहा है। दाइची से इस तरह के समझौते के तहत सीनियर सिटीजंस अन्य स्रोतों से आय होने के कारण लोन चुका भी सकते हैं और कुछ मासिक आय हासिल भी करते रह सकते हैं। कोई तात्कालिक जरूरत होने पर सीनियर सिटीजन इसमें कुल लोन का 25 फीसदी एक साथ भी ले सकता है। जयशंकर ने कहा कि दुनिया में यह अपनी तरह का पहला प्रोडक्ट है। अमेरिका में रिवर्स मोर्गेज स्कीम काफी लंबे समय से चल रही है, फिर भी रिवर्स मार्गेज लोन को कवर मुहैया कराने वाला कोई प्रोडक्ट वहां नहीं है। अमेरिका का डिपार्टमेंट ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट ने भी इस प्रोडक्ट में काफी रुचि दिखाई है। टीना अंबानी संचालित हारमनी फॉर सिल्वर्स फाउंडेशन और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने रिवर्स मोर्गेज लोन के बारे में ज्यादा जानकारी चाहने वालों के लिए हेल्पलाइन भी शुरू की है। उनसे भी इस बारे में ज्यादा जानकारी हासिल की जा सकती है।

Thursday, May 6, 2010

फाइनेंशियल प्लानिंग: थोड़े में भी जरूरतें पूरी

फिलहाल रवि की उम्र ३२ साल है और वह 60 साल की उम्र में रिटायर होना चाहता है। उसकी दो बेटियां हैं वह संयुक्त परिवार में रहता है इसलिए माता-पिता की जिम्मेदारी भी उस पर है। वह एक बड़ा घर और कार भी खरीदना चाहता है। यही नहीं वह अपनी दोनों बेटियों को अच्छी उच्च शिक्षा भी देना चाहता है और रिटायर होने तक उनकी शादी के लिए पैसा भी जुटाना है। हालांकि अभी वह अच्छी नौकरी करता है और सालाना 11.50 लाख रुपये कमाता है। वेतन में सालाना 20 फीसदी बढ़ोतरी होती रहे तो वह सभी जरूरतें पूरी करने के बाद सालाना 3.5 लाख रुपये बचा सकता है। इसके लिए उसने फाइनेंशियल प्लानिंग के बारे में सोचा। प्लान के मुताबिक उसे बताया गया कि अगले 28 साल में उसे अपने सभी लक्ष्य पूरे करने के लिए 9.5 करोड़ रुपये की जरूरत होगी तो वह अवाक रह गया। उसका तात्कालिक जवाब था कि यदि वह अगले 28 साल की पूरी सैलरी भी जोड़े तो 9.5 करोड़ रुपये नहीं बनते हैं। लेकिन जब उसे बताया गया कि यदि वह 3.20 लाख रुपये सालाना निवेश करे और सालाना इसमें 10 फीसदी बढ़ोतरी करता रहे तो वह इतनी रकम आसानी से हासिल कर लेगा। रवि अचंभित था क्योंकि उसने पहले यह सोचा ही नहीं था कि नियमित निवेश कर एक बड़ी रकम जुटाई जा सकती है और उसका मौजूदा जीवन स्तर भी बरकरार रहेगा। यह रकम वह अपने सभी मौजूदा जरूरी खर्च पूरे करते हुए जुटा सकता है।निवेश की उचित रणनीति जरूरीइसलिए सबसे जरूरी है कि आप एक अच्छा इन्वेस्टमेंट प्लानर चुनें जो आपको उचित निवेश रणनीति बता सके। फाइनेंशियल प्लानिंग आपके सामने इस बात की तस्वीर साफ कर देती है कि आप फिलहाल कहां हैं और भविष्य में कहां पहुंचना चाहते हैं। भारत में पर्सनल फाइनेंशियल प्लानिंग तुलनात्मक रूप से नया कॉन्सेप्ट है। जो लोग फाइनेंशियल प्लानिंग के बारे में जानते हैं वे भी पूरी प्रक्रिया को लेकर उलझन में रहते हैं, ऐसे में वे भी फाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर अनिच्छुक ही दिखते हैं। सलाहकार भी जिम्मेदारइस स्थिति के लिए फाइनेंशियल सर्विसेज इंडस्ट्री भी जिम्मेदार है। ज्यादातर मामलों में फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स बेचने के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग का दुरुपयोग किया जाता है। बीमा एजेंट, म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर, स्टॉक ब्रोकर या लोन मुहैया कराने वाले जो अपने को फाइनेंशियल प्लानर कहते हैं ये सब फाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर काफी उलझन पैदा करते हैं। पर्सनल फाइनेंशियल प्लानिंग की विस्तृत प्रक्रिया के बारे में कुछ तथ्य इस उलझन को दूर करने में अच्छी मदद कर सकते हैं।अच्छा फाइनेंशियल प्लानर जरूरीएक मान्यता प्राप्त फाइनेंशियल प्लानर जो विशेषज्ञ और अच्छी तरह से प्रशिक्षित है जरूरी वित्तीय आंकड़ों का मूल्यांकन कर आपकी मौजूदा वित्तीय स्थिति के बारे में ठीक से बता पाएगा। वह आपके वित्तीय और निजी लक्ष्य तय करने में मदद करेगा। वह आपकी वित्तीय समस्याओं को भी पकड़ पाएगा जो आपके वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनने में रोड़ा बन सकती हैं, साथ ही आपको वैकल्पिक समाधान भी बता सकेगा। समय-समय पर आपकी वित्तीय योजना का मूल्यांकन और उसमें बदलाव भी वह करने को कहेगा ताकि निर्धारित वित्तीय लक्ष्य हासिल किए जा सकें। आपकी वित्तीय स्थिति का साल में एक बार पुनर्मूल्यांकन होना बहुत जरूरी है। फाइनेंशियल प्लानर आपके लिए आपके लिए फाइनेंशियल हेल्थ डॉक्टर है जिससे समय-समय पर पर्सनल फाइनेंस के बारे में जांच करवाते रहना जरूरी है। आपके लक्ष्यों में कार, घर या प्रॉपर्टी खरीदना या बच्चों की शिक्षा, शादी कुछ भी हो सकता है। निवेश पर अच्छा रिटर्न हासिल करने, टैक्स बचाकर और लोन चुकाने में मदद कर फाइनेंशियल प्लानिंग आपको बढ़ती महंगाई दर से भी बचाती है। फाइनेंशियल प्लानिंग आपकी असामयिक मृत्यु या रिटायर होने पर परिवार को आर्थिक सुरक्षा देती है। फाइनेंशियल प्लानर आपकी सभी वित्तीय समस्याओं का समाधान निकालने में मदद करता है। कब शुरू करें फाइनेंशियल प्लानिंगफाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर दूसरी शंका लोगों में यह होती है कि यह उनकी मौजूदा वित्तीय स्थिति पर भार डालती है। यह सही नहीं है और वास्तव में यह आपको निवेश और अपने पैसे का बुद्धिमत्तापूर्वक प्रबंधन सिखाती है। फाइनेंशियल प्लानिंग शुरू नहीं करने के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी है कि 20 साल की उम्र के युवा समझते हैं यह काफी जल्दी है और 40-50 के लोग समझते हैं कि बहुत देर हो चुकी है। निष्कर्ष में मैं यही करना चाहूंगा कि एक विस्तृत वित्तीय योजना आपको आर्थिक रूप से मजबूत बनाएगी और आपके दिमाग में यह स्पष्ट होगा कि आप भविष्य में अपनी योजनाएं कैसे पूरी कर पाएंगे।

Monday, April 19, 2010

फ्रूट बार बनाने से होगी अच्छी आमदनी

विभिन्न क्षेत्रों में तमाम तरह के फसल अलग-अलग मौसम में उगते हैं। नई फसल के समय फलों की मंडियों में सप्लाई इतनी ज्यादा होती है कि उत्पादकों को अच्छे दाम नहीं मिल पाते हैं। फल खराब होने से पहले बेचने के दबाव के कारण उत्पादक सस्ते मूल्य पर बेचने को विवश हो जाते हैं। लेकिन फलों की प्रोसेसिंग करके उत्पाद बनाने से बेहतर मूल्य पाना आसान हो सकता है। कई राज्यों में आम, संतरा, केला, अमरूद, सेब जैसे गूदादार फल पैदा होते हैं। इन फलों से फ्रूट बार बनाई जा सकती है। फ्रूट बार में फलों के सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं। स्वादिष्ट और पोषक होने के कारण फ्रूट बार क अच्छी मांग रहती है। सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएफटीआरआई) मैसूर के वैज्ञानिकों ने फलों से फ्रूट बार बनाने की बेहद सरल विधि तैयार की है। सीएफटीआरआई द्वारा विकसित विधि से तैयार फ्रूट बार को करीब तीन महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इन फ्रूट बार को आकर्षक पैकिंग में पेश करके बाजार में काफी लाभ कमाया जा सकता है। फ्रूट बार बनाने की विधिफ्रूट बार को बनाने की विधि बेहद सरल है और सीएफटीआरआई के वैज्ञानिकों ने इस विधि का पूरी तरह मानकीकरण किया है। फ्रूट बार बनाने के लिए ताजे और पके हुए फलों का उपयोग किया जाता है। सबसे पहले फलों को अच्छी तरह से धोकर उनका गूदा निकाल लिया जाता है। फिर इस गूदे को चीनी की आवश्यक मात्रा में मिला दिया जाता है। आमतौर पर चीनी की मात्रा को गूदे के बराबर रखी जाती है। फिर इस मिश्रण को ट्रे ड्रायर में सुखाया जाता है। ट्रे ड्रायर में इस मिश्रण को करीब 18 से 20 घंटे तक सुखाया जाता है। फिर इसके ठंडा करके तय आकार के छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है। इसके बाद फ्रूट बार को आकर्षक पैकिंग में पैक करने के बाद बाजार में बेचने के लिए भेज दिया जाता है। फ्रूट बार बनाने की मशीनकरीब 60 टन की सालाना क्षमता वाले इस फ्रूट बार बनाने की मशीनरी पर करीब 4.32 लाख रुपये का खर्च आता है और इसके लिए लगभग 100 वर्ग फुट के स्थान की आवश्यकता होती है। अगर जगह अपनी है तो सभी खर्च मिलाकर करीब 5.57 लाख रुपये तक आता है। इसमें उत्पादन के लिए 11 कर्मचारियों की जरूरत होती है। फ्रूट बार बनाने के लिए दो फलों की सफाई के टैंक (करीब 12,000 रुपये), एक गूदा निकालने का उपकरण (करीब 70,000 रुपये), 100 लीटर की क्षमता वाली दो दोहरी परत वाली भांप की कढ़ाइयां (करीब 30,000 रुपये), एक छोटा बॉयलर 100 किलोग्राम (करीब 75,000 रुपये), एक फ्रूट मिल (करीब 80,000 रुपये), 48 ट्रे वाला ट्रे ड्रायर (करीब 1,00,000 रुपये) और वजन तौलने की मशीन व अन्य उपकरण (करीब 65,000 रुपये) की जरूरत होती है। इस प्लांट में उत्पादन करके सभी नियमित खर्च निकालने के बाद सालभर में करीब तीन लाख रुपये तक की आसानी से आय हासिल की जा सकती है। सीएफटीआरआई यह प्लांट लगाने के लिए पूरी जानकारी और मदद देता है। फलों की फ्रूट बार बनाकर उत्पादक आसानी से ज्यादा आय हासिल कर सकते हैं। फ्रूट बार पौष्टिक तत्वों से भरपूर होने के अलावा स्वादिष्ट होती है, इस वजह से इसकी मांग हर छोटे-बड़े शहर होती है। इस वजह से फ्रूट बार बेचने के लिए उत्पादकों को बाजार की तलाश में कहीं भटकना नहीं पड़ेगा। वे अपने शहर-कस्बे में ही छोटे दुकानदारों से इसकी बिक्री के लिए संपर्क कर सकते हैं। उत्पादक फ्रूट बार की कीमत बाजार में उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति के अनुसार तय कर सकते हैं। मसलन छोटे कस्बों में दाम कम रखे जा सकते हैं। लेकिन कम दाम पर भी इसकी बिक्री से अच्छी आय होती है क्योंकि फलों के मुकाबले फ्रूट बार के दाम कई गुना ज्यादा रहते हैं।

Monday, April 5, 2010

सही उम्र में कराएं हेल्थ इंश्योरेंस

अच्छी सेहत को भी वरदान माना जाता है। पर इस वरदान को भी सुरक्षा की जरूरत पडऩे लगी है। आज के जमाने में जीवन शैली और खान-पान के तौर-तरीके बदलने से बीमारियों का नेचर बदल गया है। इसके साथ-साथ हेल्थ केयर के खर्चे भी बेतहाशा बढ़ गए हैं। परिवार के एक सदस्य को भी अगर अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है, तो मेडिकल बिल देखकर दिन में तारे नजर आने लगते हैं। ऐसे ही हालात में आर्थिक सुरक्षा देने का काम करता है हेल्थ इंश्योरेंस। पर लोगों के साथ आमतौर पर एक समस्या आती है कि इसे कब खरीदें? यानी हेल्थ इंश्योरेंस किस उम्र में कराया जाए? जीवन शैली और जरूरत का ध्यान रखें हेल्थ इंश्योरेंस कब कराया जाए? इस सवाल के जवाब के लिए सही तरीका ये है कि आप अपनी जीवन शैली और जरूरत को समझें। हर इंसान को खुद यह निर्णय करना होता है कि उसकी जीवन शैली और उसकी पारिवारिक जरूरतों के आधार पर उसकी आवश्यकताएं क्या हैं। वह किस तरह का लाभ चाहता है। उसे कितनी राशि का कवर चाहिए और यह भी कि उसकी लागत क्या है। इसके बाद वह बाजार में उपलब्ध विभिन्न प्रकार की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों पर नजर डाले व देखें कि उसके मापदंड पर कौन सी हेल्थ इंश्योरेंस योजना खरी उतरती है। कम उम्र में लेने से फायदा आज की उतार-चढ़ाव भरी दुनिया में हेल्थ इंश्योरेंस लेने का फैसला जल्दी करें। सबसे बेहतर तो यह रहेगा कि इसे कम उम्र में ही ले लें। जैसे-जैसे आपकी आयु उम्र बढ़ेगी वैसे-वैसे इसका प्रीमियम भी बढ़ता जाता है। बता दें कि ३ माह से लेकर ६० साल या इससे ज्यादा उम्र का कोई भी इंसान हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ले सकता है। तीन तरह की पॉलिसियां हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट में मौजूदा समय में तीन तरह की कंपनियां सक्रिय हैं- लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां, जनरल इंश्योरेंस कंपनियां और विशुद्ध हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां। इसी तरह से तीन तरह की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियां भी हैं- एक, जिनमें सभी प्रकार के हॉस्पिटलाइजेशन को कवर किया जाता है। दो, जिसमें हॉस्पिटल में भर्ती होने पर क्लेम का भुगतान किया जाता है और तीसरी वह जिनमें क्रिटिकल इलनेस व क्रिटिकल सर्जरी के खर्चों की भरपाई की जाती है। देखें बीमारियों का कवरेज कुछ योजनाओं में जोखिम कवर नहीं होते। और जब जरूरत पडऩे पर पॉलिसी काम न आए तो क्या फायदा? लिहाजा हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी चुनते समय यह जरूर देखें कि किन बीमारियों को कवर के दायरे में रखा गया है और किन बीमारियों को नहीं? रिन्युअल की मैक्सिमम उम्र पॉलिसी में यह भी देखेें कि बीमा कवर के रिन्युअल की अधिकतम आयु सीमा क्या है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है वैसे-वैसे किसी भी इंसान के लिए नई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी हासिल करना मुश्किल होने लगता है। तब सभी प्रकार के वेटिंग पीरियड लागू हो जाते हैं और फिर मौजूदा बीमारियां भी इस कवर के दायरे में नहीं रखी जाती। प्रीमियम के आधार पर नहीं बाजार में तरह-तरह के हेल्थ इंश्योरेंस प्लान मौजूद हैं-बेसिक कवर से लेकर जटिल सर्जिकल प्रोसीजर्स, क्रिटिकल इलनेस और हॉस्पिटलाइजेशन नकद भरपाई तक। लेकिन आप जब भी अपने लिए हेल्थ इंश्योरेंस खरीदें तब अपना फैसला महज बीमा प्रीमियम की राशि के आधार पर न करें। अलग-अलग बीमा कवर आपको भिन्न-भिन्न लाभ देंगे व इन सबकी विशेषताएं अलग होंगी लिहाजा इनके प्रीमियम में भी अंतर होगा। फैमिली फ्लोटर अच्छी हेल्थ इंश्योरेंस की फैमिली फलोटर पॉलिसी को अच्छा विकल्प माना जाता है। दरअसल अगर आप परिवार के हर सदस्य के लिए अलग पॉलिसी लेंगे तो सौदा मंहगा हो सकता है। पर फैमिली फलोटर प्लान में कवर की लागत पूरे परिवार के सदस्यों में बांटी जा सकती है। लिहाजा यह विकल्प सस्ता भी पड़ता है। पर ध्यान रहे इसका प्रीमियम परिवार के सबसे सीनियर मेंबर की उम्र के हिसाब से तय किया जाता है और जैसे जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ेगी वैसे-वैसे इसका प्रीमियम भी बढ़ता जाता है। टॉप-अप प्लान यदि आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है और आप इंश्योरेंस कवर में बढ़ोतरी चाहते हैं तो नई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने से बेहतर रहेगा कि इंश्योरेंस कंपनियों के टॉप-अप प्लान पर ध्यान दें। कई कंपनियां इस तरह के प्लान पेश करती हैं। यह आपके हेल्थ इंश्योरेंस कवर की लागत को कम करने का एक अच्छा जरिया हो सकता है।

घर खरीदने में जितनी देरी उतना नुकसान

अपना घर खरीदना सबका सपना होता है। ऐसे में आपके पास दो विकल्प हैं। या तो आप अभी घर खरीद लें और 20 साल तक मासिक किस्त (ईएमआई) चुकाते रहें। दूसरा किराए के घर में रहें और बची रकम से बाद में घर खरीद लें। आपको कौनसा विकल्प वित्तीय दृष्टि से उचित लगता है। घर के लिए किराया देना या घर खरीदना। क्या किराए के घर की अपने घर से कोई तुलना है? यहां दोनों विकल्पों की तुलना की गई है। पहले विकल्प में आप अभी घर खरीद सकते हैं जिसमें डाउन पेमेंट करते हैं और बाकी बैंक से लोन ले सकते हैं। इसमें आप 20 साल तक ईएमआई चुकाते हैं और तब आपको घर का मालिकाना हक मिलता है। दूसरे विकल्प में आप एक कम किराए के मकान में रह सकते हैं। किराया मकान की ईएमआई से काफी कम होता है और इस बची रकम को अच्छी जगह निवेश कर सकते हैं। इस रकम से आप 20 साल बाद मकान खरीद सकते हैं। आंकड़ों की नजर में अपना घरयहां मुंंबई के उपनगर में 2 बीएचके अपार्टमेंट का उदाहरण लेते हैं। मानो यह मकान आपको आज 75 लाख रुपये में उपलब्ध है। इसका 85 फीसदी आपको लोन मिल जाएगा। इसलिए आपको 11.25 लाख रुपये का डाउन पेमेंट करना पड़ेगा और बाकी 63.75 लाख रुपये का आप होम लोन लेते हैं। 20 साल के लिए आपको हर महीने करीब 65,344 रुपये की किस्त चुकानी होगी और बीस साल बाद वह घर आपका हो जाएगा। उस समय आपके घर की कीमत क्या होगी? यदि पिछले रिकॉर्ड पर नजर डालें तो प्रॉपर्टी में निवेश ने लंबी अवधि में 15 फीसदी रिटर्न दिया है। कम से कम 10 फीसदी रिटर्न भी मानें तो 20 साल बाद आपका घर 5.06 करोड़ रुपये का होगा। तब आप एक पांच करोड़ रुपये से भी ज्यादा कीमत वाले घर के मालिक होंगे। किराए पर रहने में क्या स्थितिअब देखें किराए के मकान वाला विकल्प। यदि आप ऐसे ही घर का मासिक किराया फिलहाल 22,000 रुपये चुकाते हैं तो 65,344 रुपये की ईएमआई के मुकाबले रकम बची 43,344 रुपये महीना। क्या आप यह रकम 20 साल के लिए कहीं निवेश कर सकते हैं। नहीं! क्योंकि मकान की कीमत बढऩे के साथ ही किराया भी बढ़ता रहेगा। ऐसे में मान लीजिए किराए में हर साल कम से कम 6 फीसदी की बढ़ोतरी होती है और आपका मासिक निवेश साल-दर साल घटता जाएगा। वास्तव में आप 20 साल ही निवेश कर पाएंगे क्योंकि 20 वें साल तो किराया ईएमआई से भी ज्यादा हो जाएगा। इस हिसाब से 20वें साल में किराया 66,563 रुपये प्रति माह हो जाएगा। 20 साल बाद आपका बचाकर किया गया निवेश कितना हो जाएगा। आप 20 साल की लंबी अवधि के लिए निवेश कर रहे हैं, ऐसे में आप स्टॉक मार्केट में निवेश कर अच्छा रिटर्न ले सकते हैं। मानिए आपको 12 फीसदी रिटर्न मिल जाएगा। ऐसे में 20 साल बाद आपका निवेश बढ़कर 2.82 करोड़ रुपये हो जाएगा, जो 20 साल बाद उस मकान की कीमत 5.06 करोड़ रुपये से काफी कम है। लेकिन रुकिए, हम यहां डाउन पेमेंट के रूप में दिए गए 11.25 लाख रुपये को भूल रहे हैं जो आपको घर खरीदते समय करना पड़ता। जब आप किराए पर रहेंगे तो यह रकम भी आप बचा लेंगे। यदि आप इस रकम को भी 20 साल के लिए निवेश कर देते हैं और 12 फीसदी रिटर्न हासिल करते हैं तो यह बढ़कर 1.09 करोड़ रुपये हो जाएगा। ऐसे में 20 साल बाद आपके पास 3.91 करोड़ रुपये जमा होंगे। दुर्भाग्य से यह रकम भी 20 साल बाद उस मकान की संभावित कीमत 5.06 करोड़ रुपये से काफी कम है। ऐसे में अभी घर खरीदने का विकल्प किराए पर रहकर 20 साल बाद घर खरीदने के मुकाबले कहीं ज्यादा फायदेमंद है। इसलिए जितना जल्दी हो सकता है घर खरीद लीजिए। यह एक ऐसी संपत्ति होगा जिसकी वैल्यू भविष्य में काफी ज्यादा होगी। लंबे समय के लिए प्रॉपर्टी में निवेश काफी बेहतर साबित होगा।

Friday, April 2, 2010

पोस्ट ऑफिस की स्कीमों का भी फायदा उठाएं

देश में म्यूचुअल फंड और शेयर मार्केट के निवेश के विकल्प होने के बाद भी कई निवेशक अब भी सुरक्षा को ज्यादा महत्व देते हैं। सुरक्षित रिटर्न देने वाले साधनों में पोस्ट ऑफिस की स्कीमों का बड़ा आकर्षण रहा है। इन स्कीमों के साथ सरकारी जुड़ाव होने की वजह से लाखों निवेशक इनमें अपना पैसा लगाते हैं। पोस्ट ऑफिस की मंथली इनकम स्कीम और रिकरिंग डिपॉजिट बीते कई साल से देश की लोकप्रिय स्कीमों में से एक रही हैं। अगर आप भी ऐसे निवेशकों में हैं, जो परंपरागत उत्पादों को तवज्जो देते हैं, तो फिर ये आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकते हैं। पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम अपना पैसा के सीईओ हर्ष रूंगटा के मुताबिक मंथली इनकम स्कीम के नाम से ही जाहिर होता है कि इसमें ब्याज की रकम हर महीने दी जाती है। ये स्कीम पूरी तरह सरकार की ओर से प्रायोजित है। निवेशक अपनी रकम पोस्ट ऑफिस में जमा करते हैं। और इस पर ८ फीसदी सालाना के हिसाब से ब्याज दिया जाता है। ब्याज की रकम हर महीने आपके बचत खाते में डाल दी जाती है। इससे आपको हर महीने पोस्ट ऑफिस जाने की जरूरत नहीं होती है। एमआईएस की अवधि ६ साल की होती है। आपकी रकम इस समय अवधि के लिए लॉक की जाती है। स्कीम की मैच्योरिटी पर 5 फीसदी बोनस भी मिलता है। इस तरह पूरी स्कीम पर प्रभावी ब्याज दर 8.9 फीसदी के आस-पास हो जाती है। पर एक बात ध्यान रखें इस पर 80सी के तहत इनकम टैक्स छूट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। मंथली इनकम स्कीम के तहत आप ४,50,000 रुपये तक का निवेश कर सकते हैं। संयुक्त खाते में 9,00,000 रुपये तक का निवेश किया जा सकता है। रिकरिंग डिपॉजिट वित्तीय एवं निवेश सलाहकार नवनीत धवन के मुताबिक पोस्ट ऑफिस के रिकरिंग डिपॉजिट के तहत आप हर महीने एक निश्चित रकम जमा करते हैं। इस रकम पर आपको हर महीने ब्याज मिलता रहता है। इस तरह मंथली इनकम स्कीम और आरडी के बीच एक सिस्टम बनाने की जरूरत होती है। मतलब ये कि आप जो पैसा मंथली इनकम स्कीम से अर्जित करेंगे, उसे आरडी में निवेश कर सकते हैं। एक स्कीम आपका हर महीने का आमदनी का जरिया बन जाती है, तो दूसरी में निवेश की जरूरत पड़ती है। आप हर महीने मंथली इनकम स्कीम से मिले ब्याज को रिकरिंग डिपॉजिट में निवेश कर सकते हैं। इससे आपको ज्यादा ब्याज मिलना सुनिश्चित हो जाता है। इसके लिए आपको बार-बार पोस्ट ऑफिस जाने की भी जरूरत नहीं है। बस आपको अपने मंथली इनकम स्कीम और रिकरिंग डिपॉजिट अकाउंट को खोलते वक्त पोस्ट ऑफिस को बताना होगा कि हर महीने आपके एमआईएस के ब्याज को आपके रिकरिंग अकाउंट में डाल दिया जाए। इस तरह इन दोनों के कंबीनेशन से बचत और निवेश का एक बेहतरीन विकल्प बनाया जा सकता है।

 ratan singh