Thursday, November 14, 2013

प्रेस दिवस और प्रेस काउंसिल दोनों पर विचार जरूरी

दो दिन बाद यानी 16 नवंबर को हर वर्ष की तरह प्रेस दिवस मनाने की रस्म अदायगी की जाएगी। हर वर्ष 16 नवंबर को यह रस्म अदायगी इसलिए की जाती है कि देश में प्रेस की स्वतंत्रता और उस पर नजर रखने के लिए गठित की गई प्रेस परिषद का इस दिन से गहरा रिश्ता है। प्रथम प्रेस आयोग की सिफारिश पर संसद में पारित प्रेस काउंसिल एक्ट 1965 के तहत स्थापित भारतीय प्रेस परिषद यानी प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने 16 नवंबर 1966 को काम करना शुरू किया था। प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने और उसके स्तर को और बेहतर बनाने के लिए निगरानी तंत्र के रूप में बनाई गई यह वैधानिक संस्था खुद आलोचनाओं से परे नहीं है। यह आरोप लगता रहा है कि प्रेस परिषद अपनी भूमिका को निभाने में पूरी तरह नाकाम रही है, लेकिन इससे सहानुभूति रखने वाले लोग यह भी कहते हैं कि इसको किसी तरह की दंडात्मक शक्ति नहीं दिए जाने के कारण यह अपनी प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रही है। हालांकि प्रेस परिषद को और प्रभावी बनाने के लिए न तो देश का मीडिया गंभीर है और न ही सरकार। प्रेस काउंसिल के गठन को एक लंबा अरसा बीत चुका है और समय की मांग है कि इसको आज के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक बनाया जाए। अब जब देश में न्यूज चैनल भी अखबारों के बराबर आकर खड़े हो गए हैं तो प्रेस काउंसिल प्रमुख जस्टिस मार्कंडेय काट्जू की यह मांग भी अनुचित नहीं है कि समाचार चैनलों को भी प्रेस काउंसिल के दायरे में लाया जाए और प्रेस परिषद का नाम बदलकर मीडिया काउंसिल कर दिया जाए। हालांकि समाचार चैनल इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन समय के साथ  प्रेस परिषद और और उसकी भूमिका को प्रभावी बनाने की जरूतर तो निस्संदेह है।

Tuesday, July 24, 2012

पीएफ खाता धारकों को मिलेगी ई-पासबुक

अब से आप अपने भविष्य निधि (पीएफ) खाते में जमा की गई रकम और इससे जुड़ी सारी जानकारियां ऑनलाइन हासिल कर सकेंगे। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने ईपीएफ सदस्यों को ई-पासबुक मुहैया कराने के लिए मेंबर पोर्टल तैयार किया है। ई-पासबुक में आपका पीएफ खाता खुलने से लेकर आखिरी वित्त वर्ष तक माह-दर-माह हुए ट्रांजैक्शन का ब्यौरा होगा। इसके लिए ईपीएफ सदस्य को ईपीएफओ की वेबसाइट पर जाकर कुछ जरूरी जानकारियों के साथ अपना पंजीकरण करना होगा। पंजीकृत सदस्य स्टैब्लिशमेंट कोड, इंघ्लाई नंबर और पीएफ स्लिप में दर्ज नाम इंटर करके ई-पासबुक हासिल कर सकते हैं।
 ईपीएफओ की ओर से सभी क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्तों को जारी सर्कुलर में कहा गया है कि ई-पासबुक में जमा कराए गए कर्मचारी के हिस्से की राशि, नियोक्ता के हिस्से की राशि और पेंशन फंड में जमा कराई गई राशि का ब्योरा उपलब्ध होगा। ई-पासबुक पीडीएफ फाइल के रूप में ईपीएफओ वेबसाइट के मेंबर पोर्टल पर अपलोड की जाएगी। ई-पासबुक सिर्फ सक्रिय सदस्यों के लिए ही उपलब्ध होगी। ऐसे सदस्य जिनके पीएफ खाते का निस्तारण हो चुका है या जिनका खाता निष्क्रिय है, उन्हें ई-पासबुक की सुविधा नहीं दी जाएगी। ई-पासबुक के लिए यह जरूरी है कि नियोक्ता बैंक स्टेटमेंट व ईसीआर के साथ चालान डाटा जमा कराए।
 अगर कोई कर्मचारी मेंबर पोर्टल के जरिए अपनी पासबुक हासिल नहीं कर पाता है तो वह पासबुक के लिए रिक्वेस्ट दर्ज करा सकता है। अगर सिस्टम में कर्मचारी के बारे में जरूरी जानकारी उपलब्ध है तो उसे ई-पासबुक उपलब्ध करा दी जाएगी। इससे पहले ईपीएफओ ने अपने सभी सदस्यों को बैंक की तर्ज पर पासबुक मुहैया कराने की योजना बनाई थी लेकिन वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण यह योजना रद्द कर दी गई। इसके साथ ही, ईपीएफओ अपने सभी सदस्यों के खातों को पोर्टेबल बनाने की दिशा मे काम कर रहा है। इससे कर्मचारियों को कई पीएफ खातों को मेंटेन करने या स्थानांतरित कराने की दिक्कतों से छुटकारा मिल जाएगा।

Thursday, January 20, 2011

मोबाइल कंपनी नई, नंबर वही

तकरीबन एक साल से भी ज्यादा समय तक टलने के बाद आखिरकार देश में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी (एमएनपी) का आगाज होने जा रहा है। गुरुवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह देश भर में इस सेवा को लांच करेंगे। एमएनपी देशभर में लागू होने से आप मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी को बदल सकते हैं, लेकिन आपको नंबर बदलने की जरूरत नहीं है। आप अपना पुराना नंबर रख सकेंगे। जो ग्राहक अपने टेलीकॉम सेवा प्रदाता की सेवाओं से संतुष्ट नहीं हैं वह बिना अपना नंबर बदले अपनी पसंद के ऑपरेटर के पास जा सकेंगे। एमएनपी से जहां सेवा प्रदाताओं पर दबाव बढ़ेगा कि वह अपनी सुविधाएं और नेटवर्क को बेहतर करें, वहीं ग्राहकों को आजादी होगी कि वह महज 19 रुपये खर्च कर अपना ऑपरेटर बदल सकेंगे। हालांकि, दिल्ली में एमटीएनएल ने यह शुल्क माफ करने की घोषणा कर दी है। इसके बाद उम्मीद है जल्द ही दूसरे ऑपरेटर भी यह शुल्क माफ कर सकते हैं। लेकिन आप मौजूदा सर्कल में ही कंपनी बदलते हुए पुराना नंबर रख जाएंगे। यानी यदि आप दिल्ली में हैें तो दिल्ली में रहकर ही ऐसा संभव है जयपुर या मुंबई जाने पर आपको नया नंबर ही लेना होगा।

Wednesday, July 21, 2010

डाटा रिजेक्ट होने से रुक सकता है लोन

बैंक कई बार सही तरीके से डाटा अपलोड नहीं कर पाते हैं और यह रद्द हो जाता है। ऐसे में सिबिल के पास सही-सही जानकारी नहीं जाती है और क्रेडिट रिपोर्ट अपडेट नहीं हो पाती है, जो लोन रद्द होने का कारण बनती है।एक कंस्ट्रक्शन फर्म में नौकरी कर रहा समीर अपने मकान की मरम्मत के लिए लोन लेना चाहता था। लेकिन उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि प्राइवेट सेक्टर के दो बड़े बैंकों ने लोन संबंधी उसका आवेदन खारिज कर दिया। एक बैंक से उसने जब उसने इसका कारण जानना चाहा तो उसे बताया गया कि आपने पिछले पांच महीनों से अपने क्रेडिट कार्ड का बिल नहीं भरा है। उसको बड़ा झटका लगा। आर्थिक परेशानी की वजह से दो महीने वह बिल नहीं जमा कर पाया था, लेकिन तीसरे महीने उसने पूरा बकाया चुका दिया था।5-6 फीसदी आकंड़े रिजेक्टसमीर की परेशानी का कारण यह हो सकता है कि तीसरे महीने जब उसने पूरा भुगतान किया तब आईटी सिस्टम ने इसे खारिज कर दिया हो। बैंक और नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (एनबीएफसी) ने बात करने पर बताया कि बैंक और एनबीएफसी जो लोन देते हैं उसका रिकॉर्ड रखने वाले क्रेडिट ब्यूरो में जब वे आंकड़े अपडेट करते हैं तो कुछ आंकड़े रिजेक्ट हो जाते हैं। एक अधिकारी ने बताया कि जरूरी फाइल में कुछ कमी होने की वजह से कुछ डाटा अपलोड नहीं हो पाता है। बाद में इसे सही करके फिर से भेजा जाता है तब यह एक महीने बाद अपलोड होता है। कई बार डाटा रिजेक्ट होने का प्रतिशत 5-6 फीसदी तक भी होता है।सरकारी बैंकों का रिकॉर्ड खराबएक अन्य अधिकारी ने बताया कि डाटा रिजेक्ट होने का प्रतिशत अलग-अलग बैंकों में कम या ज्यादा हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में यह ज्यादा होता है। उनका कहना है कि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की डाटा क्वालिटी अच्छी होती है और करीब 80 फीसदी डाटा अपलोड हो जाता है। सार्वजनिक बैंकों की कई शाखाओं में तो ज्यादा बिजनेस होने से केवल 30-40 फीसदी डाटा ही अपलोड हो पाता है और बाकी रद्द हो जाता है। उनका कहना है कि आंकड़ों की गुणवत्ता वैश्विक मानकों के मुताबिक नहीं होने से इतने ज्यादा आंकड़े रद्द हो जाते हैं। ऐसे में जानकारों का कहना है कि लोन के भुगतान की सही तस्वीर क्रेडिट ब्यूरो इसी कारण से नहीं दिखा पाता है।बिना वजह डिफाल्टरअभय काउंसलिंग सेंटर के मुख्य काउंसलर वीएन कुलकर्णी ने बताया कि बहुत सारे ऐसे मामले होते हैं जिनमें बिना कारण के भी किसी को डिफाल्टर दिखा दिया जाता है। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिन्हें बैंक तो कहते हैं कि उनका भुगतान पूरा है, लेकिन रिकवरी एजेंट उन्हें भुगतान के लिए कहते रहते हैं। डाटा रिजेक्ट होना भी इसका प्रमुख कारण है। आखिर डाटा रिजेक्ट ही क्यों होता है। एक कार फाइनेंस कंपनी के प्रमुख ने बताया कि यदि डाटा सही रूप में नहीं भरा जाता है तो वह अपलोड नहीं हो पाता है। उन्होंने बताया कि बहुत सारी ऐसी बातें होती हैं जो ब्यूरो को रिपोर्ट भेजने से पहले भरनी अनिवार्य होती हैं और तकनीकी कारणों से यह रद्द हो जाती है।बैंकों की लापरवाही है कारणक्रेडिट इंफोर्मेशन ब्यूरो ऑफ इंडिया लिमिटेड (सिबिल) के मैनेजिंग डायरेक्टर अरुण ठुकराल के मुताबिक अनिवार्य कॉलम बैंकों की ओर से नहीं भरे जाने की वजह से यदि डाटा रिजेक्ट हो जाता है तो क्रेडिट रिकॉर्ड अपलोड नहीं हो पाता है। उसमें सिबिल भी कुछ नहीं कर पाता है। जन्म तिथि, टेलीफोन नंबर, पैन नंबर, पासपोर्ट नंबर आदि ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें डाटा में भरना जरूरी होता है। कभी-कभी रिकॉर्ड आपस में मिल भी जाते हैं। ऐसे में यदि बैंक जब डाटा अपलोड की परेशानी खुद हल नहीं कर पाते हैं तो सिबिल की टीम भी भेजी जाती है। उन्होंने कहा कि डाटा रिजेक्शन का प्रतिशत अलग-अलग बैंकों का अलग-अलग होता है। सिबिल 95 फीसदी आंकड़े मासिक आधार पर अपडेट करता है, जबकि बाकी साप्ताहिक आधार पर भी बदले जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति की जन्म तिथि आदि पूरी जानकारी नहीं मुहैया कराई जाती तब तक वे रिपोर्ट नहीं दे पाते हैं। यही कारण होता है कि जिस व्यक्ति पर किसी तरह का बकाया नहीं होता है, उसे भी गलती से कई बार डिफाल्टर की सूची में डाल दिया जाता है।

Monday, June 28, 2010

मेडिक्लेम पॉलिसी लेते समय डॉक्यूमेंट को पढऩा न भूलें

मेडिक्लेम पॉलिसी लेकर आप निश्चिंत हो जाते हैं। लेकिन सोचिए आपका अनुभव तब कैसा रहेगा जब अस्पताल में भर्ती होने पर आपकी बीमा कंपनी होने वाले खर्च की भरपाई करने से इनकार कर दे। ऐसी शिकायतें आए दिन सामने आती हैं कि बीमा कंपनी ने या तो मेडिक्लेम की आधी-अधूरी राशि ही दी या उस बीमारी को पॉलिसी से बाहर बताकर किसी तरह का खर्च देने से ही इनकार कर दिया। इसलिए यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि जो मेडिक्लेम पॉलिसी आपने ली है वह किन-किन बीमारियों को कवर करती है और किन परिस्थियों में वह खर्च उठाने से कंपनी इनकार कर सकती है। किन परिस्थितियों में क्लेम नहींसबसे पहले तो यह जानने की जरूरत है कि कुछ बीमारियों या दुर्घटनाओं को स्थायी या अस्थाई रूप से मेडिक्लेम पॉलिसियों से बाहर रखा जाता है। जैसे युद्ध, हमले, विदेशी शत्रुता में किया गया आणविक हमला, रेडियोएक्टिव हमले आदि में होने वाली बीमारियों आदि के इलाज का खर्च देने से कंपनियां इनकार कर सकती हैं। इसके अलावा प्रेग्नेंसी और बच्चे के जन्म पर होने वाले खर्च को भी ज्यादातर कंपनियां लिस्ट में शामिल नहीं रखती हैं, हालांकि कुछ बीमा कंपनियां कॉरपोरेट मेडिक्लेम पॉलिसी में मैटरनिटी पर होने वाले खर्च का भुगतान भी करती हैं। इसके अलावा एचआईवी-एड्स, शराब, ड्रग्स आदि के कारण होने वाले वाला खर्च भी कंपनियां नहीं उठाती हैं। आंख और कान के इलाज पर उपकरणों का खर्च और दांतों से संबंधित बीमारियां भी आमतौर पर लिस्ट से बाहर रहती हैं। किसी भी खतरनाक खेल के दौरान घायल होने पर, आनुवंशिक बीमारी, मानसिक बीमारी का इलाज,जन्मजात बीमारी के इलाज आदि का खर्च भी कंपनियां नहीं उठाती हैं। हालांकि प्रीमियम के हिसाब से भी इनक्लूजन और एक्सक्लूजन कंपनियां तय करती हैं। बीमा एवं वित्तीय मामलों के सलाहकार नवनीत धवन का कहना है कि पूरा मेडिक्लेम नहीं मिलने का कारण पॉलिसी धारकों में जानकारी का अभाव भी होता है। लिमिटेशंस के आधार पर ही रूम रेंट, आईसीयू आदि का खर्च तय होता है। जैसे यदि एक लाख रुपये के मेडिक्लेम पर 1,000 रुपये का रूम रेंट ही मिलता है इससे ज्यादा होने पर कंपनी बाकी बिल पास नहीं करेगी। कैसे-कैसे एक्सक्लूजंसएक्सक्लूजन आमतौर पर तीन प्रकार के होते हैं। स्थाई-जिन बीमारियों को कभी मेडिक्लेम पॉलिसी में शामिल नहीं किया जाता है। अस्थार्ई- जिन बीमारियों को पॉलिसी के पहले कुछ सालों तक शामिल नहीं किया जाता है और लिमिटेड-ऐसी बीमारियां जिनको पॉलिसी में शामिल तो किया जाता है, लेकिन उन पर होने वाले खर्च का पूरा भुगतान बीमा कंपनियां नहंी करती हैं बल्कि एक निश्चित रकम का भुगतान ही करती हैं। आए दिन मिलने वाली शिकायतों से लगता है कि मेडिक्लेम पॉलिसी लेने वाले व्यक्ति इस बात को जानने में शायद कम तवज्जो देते हैं कि किन परिस्थितियों में कंपनी उनको मेडिक्लेम का भुगतान करने से मना कर सकती हैं। बीमा मामलों के जानकार और सलाहकार हर्ष रूंगटा का कहना है कि पॉलिसी लेने से पहले एक्सक्लूजन और इनक्लूजन को ध्यान से पढऩा चाहिए। इसके अलावा लिमिटेशंस को भी ध्यान में रखें। ऐसा करने पर इस तरह की परेशानियों से बचा जा सकता है। डॉक्यूमेंट पढऩे में थोड़ा समय देंऐसा देखा जाता है कि लोग मेडिक्लेम पॉलिसी लेकर ही निश्चिंत हो जाते हैं। यह बात केवल मेडिक्लेम पॉलिसी पर ही लागू नहीं होती बल्कि किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट पर लागू होती है। आप पैसे खर्च कर रहे हैं तो आपको प्रोडक्ट से संबंधित सभी शर्तें और उसमें शामिल सुविधाओं को जानने पर पर्याप्त समय देना चाहिए। मेडिक्लेम पर तो खास ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि यदि जरूरत पडऩे पर कंपनी इलाज का पैसा देने से इनकार कर दे तो आपके लिए वह पॉलिसी बेकार है और आप आर्थिक परेशानी में फंस सकते हैं। ऐसे में मेडिक्लेम पॉलिसी लेते समय यह जानने की जरूर कोशिश करें कि उसमें किन बीमारियों को शामिल किया गया है और किनका खर्च कंपनी नहीं देगी। इसके अलावा बीमा कंपनियों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे पॉलिसी धारकों को इसके बारे में स्पष्ट और पूरी जानकारी दे।

Sunday, June 27, 2010

न्यू पेंशन स्कीम में निवेश अब और फायदेमंद

सरकार ने न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार कोशिश की है। यहां तक कि आम बजट में यह भी घोषणा की गई कि एनपीएस में नया अकाउंट खुलवाने पर सरकार तीन साल तक एक-एक हजार रुपये का योगदान देगी। फिर भी उत्साहजनक परिणाम नहीं मिलते देख सरकार ने अब नए डायरेक्ट टैक्स कोड (डीटीसी) में टैक्स छूट के जरिए इसे और आकर्षक बनाने की कोशिश की है। रिटायरमेंट के लिए सबसे बेहतरयदि डीटीसी का संशोधित डिस्कशन पेपर मंजूर हो जाता है तो एक मई 2009 से सभी नागरिकों के लिए शुरू की गई इस स्कीम में निवेश और फायदेमंद होगा। रिटायरमेंट के लिए पैसा जुटाने के लिए एनपीएस सबसे अच्छा निवेश हो सकता है। डिस्कशन पेपर में एनपीएस को टैक्स की ईईई (एग्जंप्ट-एग्जंप्ट-एग्जंप्ट) श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब यह हुआ कि इस स्कीम में निवेश, उससे मिलने वाले रिटर्न और मैच्योरिटी पर मिलने वाली पूरी पूंजी किसी पर भी कोई टैक्स नहीं देना होगा। फिलहाल एनपीएस में निवेश ईईटी (एग्जंप्ट-एग्जंप्ट-टैक्स) की श्रेणी में आता है यानी इसमें निवेश और निवेश की अवधि के दौरान मिलने वाले रिटर्न पर तो टैक्स नहीं देना होता, लेकिन मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगता है। ऐसे में टैक्स बचत वाली अन्य स्कीमों जो ईईई श्रेणी में आती हैं के मुकाबले एनपीएस टिक नहीं पा रही थी। लेकिन यह स्थिति जल्द ही बदल सकती है। पीएफ, पीपीएफ के साथ ही एनपीएस को भी ईईई श्रेणी में रखने का प्रस्ताव है। एनपीएस को पेंशन फंड रेगुलेटरी अथॉरिटी (पीएफआरडी) देखरेख में रही खा गया है। शुद्ध लाइफ इंश्योरेंस प्रोडक्ट और वार्षिक योजनाओं को भी ईईई श्रेणी में रखा गया है। एनपीएस में किसी तरह का टैक्स नहींएनपीएस एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसमें 18 से 55 साल का कोई भी व्यक्ति कम से कम 500 रुपये साल में चार बार या 6,000 रुपये सालाना निवेश कर सकता है। एनपीएस में निवेश के लिए परमानेंट रिटायरमेंट अकाउंट नंबर (पीआरएएन) की जरूरत होती है और यह पीपीएफ की तरह ही कुछ चुनिंदा बैंकों की शाखाओं और डाकघरों में खोला जा सकता है। एनपीएस की खास बात यह है कि इसमें निवेशकों का कुछ पैसा अच्छे रिटर्न के लिए शेयर मार्केट में भी लगाया जाता है जैसा एम्प्लाइज प्रोविडेंड फंड (ईपीएफ) या पब्लिक प्रोविडेंड फंड (पीपीएफ) में नहीं किया जाता है। इक्विटी बाजार में निवेश करने वाले अन्य प्रोडक्ट्स जैसे टैक्स सेविंग म्यूचुअल फंड्स और यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) को अब ईईटी श्रेणी में रखा गया है यानी उनकी मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगेा। इससे लोगों का आकर्षण एनपीएस की तरफ बढ़ेगा। हालांकि अभी टैक्स सिस्टम को अंतिम रूप दिया जाना है। यूलिप के मौजूदा निवेशकों पर असर नहींशुद्ध रूप से लाइफ इंश्योरेंस वाले प्रोडक्ट्स में मैच्योरिटी पर टैक्स छूट जारी रहेगी। आरएसएम अस्ट्यूट कंसल्टिंग के डायरेक्टर सुरेश सुराणा ने कहा कि नए सिस्टम में यूलिप को ईईटी के दायरे में लाया गया है। ऐसे में जारी होने वाले नए यूलिप पर टैक्स लगेगा। एनपीएस म्यूचुअल फंड्स और यूलिप के मुकाबले च्यादा फायदेमंद हो सकता है। लेकिन इससे यूलिप या टैक्स सेविंग म्यूचुअल फंड्स में पहले ही निवेश शुरू कर चुके लोगों को परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह नए टैक्स कोड के लागू होने के बाद किए जाने वाले निवेश पर लागू होगी। नए टैक्स कोड के अगले वित्त वर्ष से लागू होने की उम्मीद है। फंड मैनेजमेंट चार्ज नाम मात्रएनपीएस में एक फायदा यह भी है कि इसमें निवेश शुल्क आदि की कटौती नाम मात्र करीब 0.0009 फीसदी है। बाजार में उपलब्ध सभी प्रोडक्ट की तुलना में इसमें निवेश पर फंड मैनेजमेंट चार्ज सबसे कम है। यदि कोई 30 साल का व्यक्ति एनपीएस में 10,000 रुपये हर तिमाही निवेश करता है और अगले 30 साल तक निवेश करता रहता है और औसत 10 फीसदी सालाना रिटर्न मिलता है तो 30 साल बाद उसे करीब 70 लाख रुपये मिलेंगे। बिल्कुल इतना ही निवेश यदि यदि यूलिप में किया जाता है तो 30 साल बाद करीब 55.6 लाख रुपये मिलेंगे। इसमें 12.4 लाख रुपये का जो अंतर है वह मात्र एक फीसदी फंड मैनेजमेंट चार्ज का है। पूरा निवेश कोई कटौती नहींयही नहीं, यदि यूलिप को टैक्स के दायरे में लाया जाता है और कोई व्यक्ति अधिकतम टैक्स के स्लैब में आता है तो 55.6 लाख रुपये पर 30 फीसदी की दर से उसे 16.6 लाख रुपये प्लान की मैच्योरिटी पर टैक्स के रूप में देना होगा, यानी उसे 38 से 39 लाख रुपये ही मिलेंगे। ऐसे में उसे एनपीएस के मुकाबले करीब 30 लाख रुपये कम मिलेंगे। हालांकि फिलहाल यूलिप में एंट्री लोड खत्म करने के बाद कुछ राहत निवेशकों को मिली है फिर भी फंड मैनेजमेंट चार्ज तो काफी च्यादा हैं। ऐसे में नया टैक्स सिस्टम लागू होने के बाद यूलिप में निवेश घट सकता है, जबकि एनपीएस की ओर निवेशकों का रुख च्यादा हो सकता है। हालांकि यह जरूरत है कि यूलिप में निवेशकों की पूंजी काफी ज्यादा शेयर बाजार में रहती है और इससे एनपीएस के मुकाबले ज्यादा रिटर्न मिल सकता है। लेकिन जहां तक सवाल रिस्क का है तो एनपीएस में यूलिप के मुकाबले रिस्क बहुत कम होगा।

 ratan singh