Wednesday, March 31, 2010

जरूरत के मुताबिक फिक्स्ड डिपॉजिट

किसी भी निवेशक के पोर्टफोलियो में सावधि जमा (एफडी) की हिस्सेदारी काफी ज्यादा होती है। दरअसल सुरक्षित रिटर्न की उम्मीद सबसे ज्यादा इसी में होती है। एफडी का परंपरागत रूप काफी साधारण था, लेकिन अब बाजार में गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से बैंकों ने एफडी के रूप में कई बदलाव किए हैं। एफडी में भी अब कई तरह के विकल्प मौजूद हैं।इंश्योरेंस सुविधा के साथ अपना पैसा के सीईओ हर्ष रूंगटा के मुताबिक कुछ एफडी के साथ इंश्योरेंस भी जुड़ा हुआ होता है। ऐसे में एफडी तो अपने मूल रूप में बनी ही रहती है साथ में इंश्योरेंस का अतिरिक्त फायदा भी मिल जाता है। लेकिन यह फायदा जमा की राशि और एफडी की अवधि पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए कुछ बैंक 25,000 रुपये की तीन साल की एफडी पर 5 लाख रुपये का फ्री एक्सीडेंट कवर भी देते हैं। एफडी पर 7 फीसदी ब्याज आपको मिलेगा। इससे प्रॉडक्ट की वैल्यू बढ़ जाती है। कई बैंक केवल एक्सिडेंट इंश्योरेंस ही देते हैं जिसमें सम एश्योर्ड राशि 3 लाख से 7 लाख रुपये के बीच होगी। आमतौर पर ऐसे कवर में कई शर्तें जुड़ी हुई होती हैं और यह आपकी सभी बीमा जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता।ब्याज का पुनर्निवेशनिवेश सलाहकार नवनीत धवन के मुताबिक कुछ बैंक एफडी से हासिल होने वाले ब्याज की रकम के रीइनवेस्टमेंट की सुविधा भी देते हैं। मानएि आप एफडी पर हर तिमाही में 2,000 रुपये ब्याज के रूप में पा रहे हैं। ऐसे में इस रकम की एक और एफडी बैंक मौजूदा ब्याज दरों पर शुरू कर देगा। फिक्स्ड डिपॉजिट ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स हैं जिनमें रिटर्न तय है और यदि निवेशक अपनी रकम मैच्योरिटी की अवधि से पहले भी निकालता है तो बैंक ऐसे में कुछ जुर्माना लगाते हैं। ऐसे मामलों में रिटर्न कुछ कम हो जाता है। लेकिन कुछ बैंक ऐसे भी हैं जो एफडी को बीच में तोडऩे पर जुर्माना नहीं लगाते हैं। एफडी में ऐसा लचीलापन निवेशकों को काफी आकर्षित करता है।समय सीमा में छूटज्यादातार लोग एफडी किसी निश्चित लक्ष्य के लिए करवाते हैं। जैसे कोई महंगी चीज खरीदनी हो या बच्चे की शादी करनी हो। ऐसे कार्यक्रम तय समय से आगे टल भी सकते हैं। ऐसे में या तो निवेशक को एफडी मैच्योर होने के बाद पैसा निकालना ही पड़ता है, जिससे उसे रिटर्न में नुकसान उठाना पड़ता है। लेकिन अब कई बैंक एफडी में निवेश करने वालों को एफडी की समय सीमा बढ़ाने का विकल्प भी निवेशकों को दे रहे हैं। इसमें वे अपने कार्यक्रम के मुताबिक उसका एफडी की मैच्योरिटी अवधि बढ़ा सकते हैं।जमा को तोडऩे का विकल्पनिवेश सलाहकार अर्णव पंड्या के मुताबिक समान मूल्य वर्ग की कई जमाओं में बड़ी संख्या में कागजी कार्रवाई करनी पड़ती हैं। यह काम आमतौर पर उन निवेशकों को करना पड़ता है जिन्हें भविष्य में भिन्न-भिन्न समय पर पैसे की जरूरत होती है। ऐसे में उनकी इच्छा पूरी रकम को एक साथ एफडी में निवेश करने की नहीं होती है क्योंकि बाद में पैसे की जरूरत पडऩे पर उन्हें एफडी तोडऩी पड़ सकती है जिसमें उनको रिटर्न कम मिलेगा। निवेशकों की इस समस्या को देखते हुए कई बैंक ऐसी व्यवस्था दे रहे हैं जिसमें एफडी की पूरी रकम को निवेशक की जरूरत के हिसाब से अगल-अलग मूल्य वर्ग के कई हिस्सों में बांट देते हैं। ऐसी एफडी में निवेशकों को ज्यादा रिटर्न का फायदा मिल जाता है।

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 ratan singh