ratan singh
Monday, March 8, 2021
Thursday, November 14, 2013
प्रेस दिवस और प्रेस काउंसिल दोनों पर विचार जरूरी
दो दिन बाद यानी 16 नवंबर को हर वर्ष की तरह प्रेस दिवस मनाने की रस्म अदायगी की जाएगी। हर वर्ष 16 नवंबर को यह रस्म अदायगी इसलिए की जाती है कि देश में प्रेस की स्वतंत्रता और उस पर नजर रखने के लिए गठित की गई प्रेस परिषद का इस दिन से गहरा रिश्ता है। प्रथम प्रेस आयोग की सिफारिश पर संसद में पारित प्रेस काउंसिल एक्ट 1965 के तहत स्थापित भारतीय प्रेस परिषद यानी प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने 16 नवंबर 1966 को काम करना शुरू किया था। प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने और उसके स्तर को और बेहतर बनाने के लिए निगरानी तंत्र के रूप में बनाई गई यह वैधानिक संस्था खुद आलोचनाओं से परे नहीं है। यह आरोप लगता रहा है कि प्रेस परिषद अपनी भूमिका को निभाने में पूरी तरह नाकाम रही है, लेकिन इससे सहानुभूति रखने वाले लोग यह भी कहते हैं कि इसको किसी तरह की दंडात्मक शक्ति नहीं दिए जाने के कारण यह अपनी प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रही है। हालांकि प्रेस परिषद को और प्रभावी बनाने के लिए न तो देश का मीडिया गंभीर है और न ही सरकार। प्रेस काउंसिल के गठन को एक लंबा अरसा बीत चुका है और समय की मांग है कि इसको आज के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक बनाया जाए। अब जब देश में न्यूज चैनल भी अखबारों के बराबर आकर खड़े हो गए हैं तो प्रेस काउंसिल प्रमुख जस्टिस मार्कंडेय काट्जू की यह मांग भी अनुचित नहीं है कि समाचार चैनलों को भी प्रेस काउंसिल के दायरे में लाया जाए और प्रेस परिषद का नाम बदलकर मीडिया काउंसिल कर दिया जाए। हालांकि समाचार चैनल इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन समय के साथ प्रेस परिषद और और उसकी भूमिका को प्रभावी बनाने की जरूतर तो निस्संदेह है।
Tuesday, July 24, 2012
पीएफ खाता धारकों को मिलेगी ई-पासबुक
अब से आप अपने भविष्य निधि (पीएफ) खाते में जमा की गई रकम और इससे जुड़ी सारी जानकारियां ऑनलाइन हासिल कर सकेंगे। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने ईपीएफ सदस्यों को ई-पासबुक मुहैया कराने के लिए मेंबर पोर्टल तैयार किया है। ई-पासबुक में आपका पीएफ खाता खुलने से लेकर आखिरी वित्त वर्ष तक माह-दर-माह हुए ट्रांजैक्शन का ब्यौरा होगा। इसके लिए ईपीएफ सदस्य को ईपीएफओ की वेबसाइट पर जाकर कुछ जरूरी जानकारियों के साथ अपना पंजीकरण करना होगा। पंजीकृत सदस्य स्टैब्लिशमेंट कोड, इंघ्लाई नंबर और पीएफ स्लिप में दर्ज नाम इंटर करके ई-पासबुक हासिल कर सकते हैं।
ईपीएफओ की ओर से सभी क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्तों को जारी सर्कुलर में कहा गया है कि ई-पासबुक में जमा कराए गए कर्मचारी के हिस्से की राशि, नियोक्ता के हिस्से की राशि और पेंशन फंड में जमा कराई गई राशि का ब्योरा उपलब्ध होगा। ई-पासबुक पीडीएफ फाइल के रूप में ईपीएफओ वेबसाइट के मेंबर पोर्टल पर अपलोड की जाएगी। ई-पासबुक सिर्फ सक्रिय सदस्यों के लिए ही उपलब्ध होगी। ऐसे सदस्य जिनके पीएफ खाते का निस्तारण हो चुका है या जिनका खाता निष्क्रिय है, उन्हें ई-पासबुक की सुविधा नहीं दी जाएगी। ई-पासबुक के लिए यह जरूरी है कि नियोक्ता बैंक स्टेटमेंट व ईसीआर के साथ चालान डाटा जमा कराए।
अगर कोई कर्मचारी मेंबर पोर्टल के जरिए अपनी पासबुक हासिल नहीं कर पाता है तो वह पासबुक के लिए रिक्वेस्ट दर्ज करा सकता है। अगर सिस्टम में कर्मचारी के बारे में जरूरी जानकारी उपलब्ध है तो उसे ई-पासबुक उपलब्ध करा दी जाएगी। इससे पहले ईपीएफओ ने अपने सभी सदस्यों को बैंक की तर्ज पर पासबुक मुहैया कराने की योजना बनाई थी लेकिन वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण यह योजना रद्द कर दी गई। इसके साथ ही, ईपीएफओ अपने सभी सदस्यों के खातों को पोर्टेबल बनाने की दिशा मे काम कर रहा है। इससे कर्मचारियों को कई पीएफ खातों को मेंटेन करने या स्थानांतरित कराने की दिक्कतों से छुटकारा मिल जाएगा।
ईपीएफओ की ओर से सभी क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्तों को जारी सर्कुलर में कहा गया है कि ई-पासबुक में जमा कराए गए कर्मचारी के हिस्से की राशि, नियोक्ता के हिस्से की राशि और पेंशन फंड में जमा कराई गई राशि का ब्योरा उपलब्ध होगा। ई-पासबुक पीडीएफ फाइल के रूप में ईपीएफओ वेबसाइट के मेंबर पोर्टल पर अपलोड की जाएगी। ई-पासबुक सिर्फ सक्रिय सदस्यों के लिए ही उपलब्ध होगी। ऐसे सदस्य जिनके पीएफ खाते का निस्तारण हो चुका है या जिनका खाता निष्क्रिय है, उन्हें ई-पासबुक की सुविधा नहीं दी जाएगी। ई-पासबुक के लिए यह जरूरी है कि नियोक्ता बैंक स्टेटमेंट व ईसीआर के साथ चालान डाटा जमा कराए।
अगर कोई कर्मचारी मेंबर पोर्टल के जरिए अपनी पासबुक हासिल नहीं कर पाता है तो वह पासबुक के लिए रिक्वेस्ट दर्ज करा सकता है। अगर सिस्टम में कर्मचारी के बारे में जरूरी जानकारी उपलब्ध है तो उसे ई-पासबुक उपलब्ध करा दी जाएगी। इससे पहले ईपीएफओ ने अपने सभी सदस्यों को बैंक की तर्ज पर पासबुक मुहैया कराने की योजना बनाई थी लेकिन वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण यह योजना रद्द कर दी गई। इसके साथ ही, ईपीएफओ अपने सभी सदस्यों के खातों को पोर्टेबल बनाने की दिशा मे काम कर रहा है। इससे कर्मचारियों को कई पीएफ खातों को मेंटेन करने या स्थानांतरित कराने की दिक्कतों से छुटकारा मिल जाएगा।
Thursday, January 20, 2011
मोबाइल कंपनी नई, नंबर वही
तकरीबन एक साल से भी ज्यादा समय तक टलने के बाद आखिरकार देश में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी (एमएनपी) का आगाज होने जा रहा है। गुरुवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह देश भर में इस सेवा को लांच करेंगे। एमएनपी देशभर में लागू होने से आप मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी को बदल सकते हैं, लेकिन आपको नंबर बदलने की जरूरत नहीं है। आप अपना पुराना नंबर रख सकेंगे। जो ग्राहक अपने टेलीकॉम सेवा प्रदाता की सेवाओं से संतुष्ट नहीं हैं वह बिना अपना नंबर बदले अपनी पसंद के ऑपरेटर के पास जा सकेंगे। एमएनपी से जहां सेवा प्रदाताओं पर दबाव बढ़ेगा कि वह अपनी सुविधाएं और नेटवर्क को बेहतर करें, वहीं ग्राहकों को आजादी होगी कि वह महज 19 रुपये खर्च कर अपना ऑपरेटर बदल सकेंगे। हालांकि, दिल्ली में एमटीएनएल ने यह शुल्क माफ करने की घोषणा कर दी है। इसके बाद उम्मीद है जल्द ही दूसरे ऑपरेटर भी यह शुल्क माफ कर सकते हैं। लेकिन आप मौजूदा सर्कल में ही कंपनी बदलते हुए पुराना नंबर रख जाएंगे। यानी यदि आप दिल्ली में हैें तो दिल्ली में रहकर ही ऐसा संभव है जयपुर या मुंबई जाने पर आपको नया नंबर ही लेना होगा।
Wednesday, July 21, 2010
डाटा रिजेक्ट होने से रुक सकता है लोन
बैंक कई बार सही तरीके से डाटा अपलोड नहीं कर पाते हैं और यह रद्द हो जाता है। ऐसे में सिबिल के पास सही-सही जानकारी नहीं जाती है और क्रेडिट रिपोर्ट अपडेट नहीं हो पाती है, जो लोन रद्द होने का कारण बनती है।एक कंस्ट्रक्शन फर्म में नौकरी कर रहा समीर अपने मकान की मरम्मत के लिए लोन लेना चाहता था। लेकिन उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि प्राइवेट सेक्टर के दो बड़े बैंकों ने लोन संबंधी उसका आवेदन खारिज कर दिया। एक बैंक से उसने जब उसने इसका कारण जानना चाहा तो उसे बताया गया कि आपने पिछले पांच महीनों से अपने क्रेडिट कार्ड का बिल नहीं भरा है। उसको बड़ा झटका लगा। आर्थिक परेशानी की वजह से दो महीने वह बिल नहीं जमा कर पाया था, लेकिन तीसरे महीने उसने पूरा बकाया चुका दिया था।5-6 फीसदी आकंड़े रिजेक्टसमीर की परेशानी का कारण यह हो सकता है कि तीसरे महीने जब उसने पूरा भुगतान किया तब आईटी सिस्टम ने इसे खारिज कर दिया हो। बैंक और नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (एनबीएफसी) ने बात करने पर बताया कि बैंक और एनबीएफसी जो लोन देते हैं उसका रिकॉर्ड रखने वाले क्रेडिट ब्यूरो में जब वे आंकड़े अपडेट करते हैं तो कुछ आंकड़े रिजेक्ट हो जाते हैं। एक अधिकारी ने बताया कि जरूरी फाइल में कुछ कमी होने की वजह से कुछ डाटा अपलोड नहीं हो पाता है। बाद में इसे सही करके फिर से भेजा जाता है तब यह एक महीने बाद अपलोड होता है। कई बार डाटा रिजेक्ट होने का प्रतिशत 5-6 फीसदी तक भी होता है।सरकारी बैंकों का रिकॉर्ड खराबएक अन्य अधिकारी ने बताया कि डाटा रिजेक्ट होने का प्रतिशत अलग-अलग बैंकों में कम या ज्यादा हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में यह ज्यादा होता है। उनका कहना है कि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की डाटा क्वालिटी अच्छी होती है और करीब 80 फीसदी डाटा अपलोड हो जाता है। सार्वजनिक बैंकों की कई शाखाओं में तो ज्यादा बिजनेस होने से केवल 30-40 फीसदी डाटा ही अपलोड हो पाता है और बाकी रद्द हो जाता है। उनका कहना है कि आंकड़ों की गुणवत्ता वैश्विक मानकों के मुताबिक नहीं होने से इतने ज्यादा आंकड़े रद्द हो जाते हैं। ऐसे में जानकारों का कहना है कि लोन के भुगतान की सही तस्वीर क्रेडिट ब्यूरो इसी कारण से नहीं दिखा पाता है।बिना वजह डिफाल्टरअभय काउंसलिंग सेंटर के मुख्य काउंसलर वीएन कुलकर्णी ने बताया कि बहुत सारे ऐसे मामले होते हैं जिनमें बिना कारण के भी किसी को डिफाल्टर दिखा दिया जाता है। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिन्हें बैंक तो कहते हैं कि उनका भुगतान पूरा है, लेकिन रिकवरी एजेंट उन्हें भुगतान के लिए कहते रहते हैं। डाटा रिजेक्ट होना भी इसका प्रमुख कारण है। आखिर डाटा रिजेक्ट ही क्यों होता है। एक कार फाइनेंस कंपनी के प्रमुख ने बताया कि यदि डाटा सही रूप में नहीं भरा जाता है तो वह अपलोड नहीं हो पाता है। उन्होंने बताया कि बहुत सारी ऐसी बातें होती हैं जो ब्यूरो को रिपोर्ट भेजने से पहले भरनी अनिवार्य होती हैं और तकनीकी कारणों से यह रद्द हो जाती है।बैंकों की लापरवाही है कारणक्रेडिट इंफोर्मेशन ब्यूरो ऑफ इंडिया लिमिटेड (सिबिल) के मैनेजिंग डायरेक्टर अरुण ठुकराल के मुताबिक अनिवार्य कॉलम बैंकों की ओर से नहीं भरे जाने की वजह से यदि डाटा रिजेक्ट हो जाता है तो क्रेडिट रिकॉर्ड अपलोड नहीं हो पाता है। उसमें सिबिल भी कुछ नहीं कर पाता है। जन्म तिथि, टेलीफोन नंबर, पैन नंबर, पासपोर्ट नंबर आदि ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें डाटा में भरना जरूरी होता है। कभी-कभी रिकॉर्ड आपस में मिल भी जाते हैं। ऐसे में यदि बैंक जब डाटा अपलोड की परेशानी खुद हल नहीं कर पाते हैं तो सिबिल की टीम भी भेजी जाती है। उन्होंने कहा कि डाटा रिजेक्शन का प्रतिशत अलग-अलग बैंकों का अलग-अलग होता है। सिबिल 95 फीसदी आंकड़े मासिक आधार पर अपडेट करता है, जबकि बाकी साप्ताहिक आधार पर भी बदले जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति की जन्म तिथि आदि पूरी जानकारी नहीं मुहैया कराई जाती तब तक वे रिपोर्ट नहीं दे पाते हैं। यही कारण होता है कि जिस व्यक्ति पर किसी तरह का बकाया नहीं होता है, उसे भी गलती से कई बार डिफाल्टर की सूची में डाल दिया जाता है।
Monday, June 28, 2010
मेडिक्लेम पॉलिसी लेते समय डॉक्यूमेंट को पढऩा न भूलें
मेडिक्लेम पॉलिसी लेकर आप निश्चिंत हो जाते हैं। लेकिन सोचिए आपका अनुभव तब कैसा रहेगा जब अस्पताल में भर्ती होने पर आपकी बीमा कंपनी होने वाले खर्च की भरपाई करने से इनकार कर दे। ऐसी शिकायतें आए दिन सामने आती हैं कि बीमा कंपनी ने या तो मेडिक्लेम की आधी-अधूरी राशि ही दी या उस बीमारी को पॉलिसी से बाहर बताकर किसी तरह का खर्च देने से ही इनकार कर दिया। इसलिए यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि जो मेडिक्लेम पॉलिसी आपने ली है वह किन-किन बीमारियों को कवर करती है और किन परिस्थियों में वह खर्च उठाने से कंपनी इनकार कर सकती है। किन परिस्थितियों में क्लेम नहींसबसे पहले तो यह जानने की जरूरत है कि कुछ बीमारियों या दुर्घटनाओं को स्थायी या अस्थाई रूप से मेडिक्लेम पॉलिसियों से बाहर रखा जाता है। जैसे युद्ध, हमले, विदेशी शत्रुता में किया गया आणविक हमला, रेडियोएक्टिव हमले आदि में होने वाली बीमारियों आदि के इलाज का खर्च देने से कंपनियां इनकार कर सकती हैं। इसके अलावा प्रेग्नेंसी और बच्चे के जन्म पर होने वाले खर्च को भी ज्यादातर कंपनियां लिस्ट में शामिल नहीं रखती हैं, हालांकि कुछ बीमा कंपनियां कॉरपोरेट मेडिक्लेम पॉलिसी में मैटरनिटी पर होने वाले खर्च का भुगतान भी करती हैं। इसके अलावा एचआईवी-एड्स, शराब, ड्रग्स आदि के कारण होने वाले वाला खर्च भी कंपनियां नहीं उठाती हैं। आंख और कान के इलाज पर उपकरणों का खर्च और दांतों से संबंधित बीमारियां भी आमतौर पर लिस्ट से बाहर रहती हैं। किसी भी खतरनाक खेल के दौरान घायल होने पर, आनुवंशिक बीमारी, मानसिक बीमारी का इलाज,जन्मजात बीमारी के इलाज आदि का खर्च भी कंपनियां नहीं उठाती हैं। हालांकि प्रीमियम के हिसाब से भी इनक्लूजन और एक्सक्लूजन कंपनियां तय करती हैं। बीमा एवं वित्तीय मामलों के सलाहकार नवनीत धवन का कहना है कि पूरा मेडिक्लेम नहीं मिलने का कारण पॉलिसी धारकों में जानकारी का अभाव भी होता है। लिमिटेशंस के आधार पर ही रूम रेंट, आईसीयू आदि का खर्च तय होता है। जैसे यदि एक लाख रुपये के मेडिक्लेम पर 1,000 रुपये का रूम रेंट ही मिलता है इससे ज्यादा होने पर कंपनी बाकी बिल पास नहीं करेगी। कैसे-कैसे एक्सक्लूजंसएक्सक्लूजन आमतौर पर तीन प्रकार के होते हैं। स्थाई-जिन बीमारियों को कभी मेडिक्लेम पॉलिसी में शामिल नहीं किया जाता है। अस्थार्ई- जिन बीमारियों को पॉलिसी के पहले कुछ सालों तक शामिल नहीं किया जाता है और लिमिटेड-ऐसी बीमारियां जिनको पॉलिसी में शामिल तो किया जाता है, लेकिन उन पर होने वाले खर्च का पूरा भुगतान बीमा कंपनियां नहंी करती हैं बल्कि एक निश्चित रकम का भुगतान ही करती हैं। आए दिन मिलने वाली शिकायतों से लगता है कि मेडिक्लेम पॉलिसी लेने वाले व्यक्ति इस बात को जानने में शायद कम तवज्जो देते हैं कि किन परिस्थितियों में कंपनी उनको मेडिक्लेम का भुगतान करने से मना कर सकती हैं। बीमा मामलों के जानकार और सलाहकार हर्ष रूंगटा का कहना है कि पॉलिसी लेने से पहले एक्सक्लूजन और इनक्लूजन को ध्यान से पढऩा चाहिए। इसके अलावा लिमिटेशंस को भी ध्यान में रखें। ऐसा करने पर इस तरह की परेशानियों से बचा जा सकता है। डॉक्यूमेंट पढऩे में थोड़ा समय देंऐसा देखा जाता है कि लोग मेडिक्लेम पॉलिसी लेकर ही निश्चिंत हो जाते हैं। यह बात केवल मेडिक्लेम पॉलिसी पर ही लागू नहीं होती बल्कि किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट पर लागू होती है। आप पैसे खर्च कर रहे हैं तो आपको प्रोडक्ट से संबंधित सभी शर्तें और उसमें शामिल सुविधाओं को जानने पर पर्याप्त समय देना चाहिए। मेडिक्लेम पर तो खास ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि यदि जरूरत पडऩे पर कंपनी इलाज का पैसा देने से इनकार कर दे तो आपके लिए वह पॉलिसी बेकार है और आप आर्थिक परेशानी में फंस सकते हैं। ऐसे में मेडिक्लेम पॉलिसी लेते समय यह जानने की जरूर कोशिश करें कि उसमें किन बीमारियों को शामिल किया गया है और किनका खर्च कंपनी नहीं देगी। इसके अलावा बीमा कंपनियों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे पॉलिसी धारकों को इसके बारे में स्पष्ट और पूरी जानकारी दे।
Sunday, June 27, 2010
न्यू पेंशन स्कीम में निवेश अब और फायदेमंद
सरकार ने न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार कोशिश की है। यहां तक कि आम बजट में यह भी घोषणा की गई कि एनपीएस में नया अकाउंट खुलवाने पर सरकार तीन साल तक एक-एक हजार रुपये का योगदान देगी। फिर भी उत्साहजनक परिणाम नहीं मिलते देख सरकार ने अब नए डायरेक्ट टैक्स कोड (डीटीसी) में टैक्स छूट के जरिए इसे और आकर्षक बनाने की कोशिश की है। रिटायरमेंट के लिए सबसे बेहतरयदि डीटीसी का संशोधित डिस्कशन पेपर मंजूर हो जाता है तो एक मई 2009 से सभी नागरिकों के लिए शुरू की गई इस स्कीम में निवेश और फायदेमंद होगा। रिटायरमेंट के लिए पैसा जुटाने के लिए एनपीएस सबसे अच्छा निवेश हो सकता है। डिस्कशन पेपर में एनपीएस को टैक्स की ईईई (एग्जंप्ट-एग्जंप्ट-एग्जंप्ट) श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब यह हुआ कि इस स्कीम में निवेश, उससे मिलने वाले रिटर्न और मैच्योरिटी पर मिलने वाली पूरी पूंजी किसी पर भी कोई टैक्स नहीं देना होगा। फिलहाल एनपीएस में निवेश ईईटी (एग्जंप्ट-एग्जंप्ट-टैक्स) की श्रेणी में आता है यानी इसमें निवेश और निवेश की अवधि के दौरान मिलने वाले रिटर्न पर तो टैक्स नहीं देना होता, लेकिन मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगता है। ऐसे में टैक्स बचत वाली अन्य स्कीमों जो ईईई श्रेणी में आती हैं के मुकाबले एनपीएस टिक नहीं पा रही थी। लेकिन यह स्थिति जल्द ही बदल सकती है। पीएफ, पीपीएफ के साथ ही एनपीएस को भी ईईई श्रेणी में रखने का प्रस्ताव है। एनपीएस को पेंशन फंड रेगुलेटरी अथॉरिटी (पीएफआरडी) देखरेख में रही खा गया है। शुद्ध लाइफ इंश्योरेंस प्रोडक्ट और वार्षिक योजनाओं को भी ईईई श्रेणी में रखा गया है। एनपीएस में किसी तरह का टैक्स नहींएनपीएस एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसमें 18 से 55 साल का कोई भी व्यक्ति कम से कम 500 रुपये साल में चार बार या 6,000 रुपये सालाना निवेश कर सकता है। एनपीएस में निवेश के लिए परमानेंट रिटायरमेंट अकाउंट नंबर (पीआरएएन) की जरूरत होती है और यह पीपीएफ की तरह ही कुछ चुनिंदा बैंकों की शाखाओं और डाकघरों में खोला जा सकता है। एनपीएस की खास बात यह है कि इसमें निवेशकों का कुछ पैसा अच्छे रिटर्न के लिए शेयर मार्केट में भी लगाया जाता है जैसा एम्प्लाइज प्रोविडेंड फंड (ईपीएफ) या पब्लिक प्रोविडेंड फंड (पीपीएफ) में नहीं किया जाता है। इक्विटी बाजार में निवेश करने वाले अन्य प्रोडक्ट्स जैसे टैक्स सेविंग म्यूचुअल फंड्स और यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) को अब ईईटी श्रेणी में रखा गया है यानी उनकी मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगेा। इससे लोगों का आकर्षण एनपीएस की तरफ बढ़ेगा। हालांकि अभी टैक्स सिस्टम को अंतिम रूप दिया जाना है। यूलिप के मौजूदा निवेशकों पर असर नहींशुद्ध रूप से लाइफ इंश्योरेंस वाले प्रोडक्ट्स में मैच्योरिटी पर टैक्स छूट जारी रहेगी। आरएसएम अस्ट्यूट कंसल्टिंग के डायरेक्टर सुरेश सुराणा ने कहा कि नए सिस्टम में यूलिप को ईईटी के दायरे में लाया गया है। ऐसे में जारी होने वाले नए यूलिप पर टैक्स लगेगा। एनपीएस म्यूचुअल फंड्स और यूलिप के मुकाबले च्यादा फायदेमंद हो सकता है। लेकिन इससे यूलिप या टैक्स सेविंग म्यूचुअल फंड्स में पहले ही निवेश शुरू कर चुके लोगों को परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह नए टैक्स कोड के लागू होने के बाद किए जाने वाले निवेश पर लागू होगी। नए टैक्स कोड के अगले वित्त वर्ष से लागू होने की उम्मीद है। फंड मैनेजमेंट चार्ज नाम मात्रएनपीएस में एक फायदा यह भी है कि इसमें निवेश शुल्क आदि की कटौती नाम मात्र करीब 0.0009 फीसदी है। बाजार में उपलब्ध सभी प्रोडक्ट की तुलना में इसमें निवेश पर फंड मैनेजमेंट चार्ज सबसे कम है। यदि कोई 30 साल का व्यक्ति एनपीएस में 10,000 रुपये हर तिमाही निवेश करता है और अगले 30 साल तक निवेश करता रहता है और औसत 10 फीसदी सालाना रिटर्न मिलता है तो 30 साल बाद उसे करीब 70 लाख रुपये मिलेंगे। बिल्कुल इतना ही निवेश यदि यदि यूलिप में किया जाता है तो 30 साल बाद करीब 55.6 लाख रुपये मिलेंगे। इसमें 12.4 लाख रुपये का जो अंतर है वह मात्र एक फीसदी फंड मैनेजमेंट चार्ज का है। पूरा निवेश कोई कटौती नहींयही नहीं, यदि यूलिप को टैक्स के दायरे में लाया जाता है और कोई व्यक्ति अधिकतम टैक्स के स्लैब में आता है तो 55.6 लाख रुपये पर 30 फीसदी की दर से उसे 16.6 लाख रुपये प्लान की मैच्योरिटी पर टैक्स के रूप में देना होगा, यानी उसे 38 से 39 लाख रुपये ही मिलेंगे। ऐसे में उसे एनपीएस के मुकाबले करीब 30 लाख रुपये कम मिलेंगे। हालांकि फिलहाल यूलिप में एंट्री लोड खत्म करने के बाद कुछ राहत निवेशकों को मिली है फिर भी फंड मैनेजमेंट चार्ज तो काफी च्यादा हैं। ऐसे में नया टैक्स सिस्टम लागू होने के बाद यूलिप में निवेश घट सकता है, जबकि एनपीएस की ओर निवेशकों का रुख च्यादा हो सकता है। हालांकि यह जरूरत है कि यूलिप में निवेशकों की पूंजी काफी ज्यादा शेयर बाजार में रहती है और इससे एनपीएस के मुकाबले ज्यादा रिटर्न मिल सकता है। लेकिन जहां तक सवाल रिस्क का है तो एनपीएस में यूलिप के मुकाबले रिस्क बहुत कम होगा।
छोटी बचत-बड़ा फायदा
कहा जाता है कि हमारे देश में वित्तीय साक्षरता यानी वित्तीय योजनाओं की जानकारी काफी कम है। ज्यादातर भारतीय युवाओं खासकर कॉलेज में पढऩे वालों और बेरोजगार युवकों में बचत की प्रवृत्ति बहुत कम होती है, जबकि खर्च करने के मामले में वे बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते। नौकरीपेशा लोगों में भी स्थिति कुछ अच्छी नहीं है। नौकरी लगने के पहले कुछ सालों में वे मौज मस्ती के मूड में होते हैं और बचत करने से परहेज करते हैं। जबकि उन्हें इस बात को समझना चाहिए कि शादी के बाद बचत करना उतना आसान नहीं होता जितना शादी के पहले और नौकरी के पहले कुछ सालों में होता है। उन्हें यही लगता है कि अभी इसकी जरूरत क्या है या फिर इतनी कमाई नहीं हो रही है कि वित्तीय योजना बनाई जा सके। जबकि सच्चाई यही है कि थोड़ी कमाई में थोड़ी बचत की आदत भी डाली जाए तो बाद में यह बचत काफी मदद कर सकती है।वित्तीय योजना बनाने का मतलब यह नहीं है कि एक बार में ज्यादा धन का निवेश किया जाए या फिर कुछ महीनों या कुछ साल के लिए योजना बनाई जाए। कम राशि के निवेश से लंबी अवधि के लिए आसानी से योजना बनाई जा सकती है जिस पर बढिय़ा रिटर्न मिल सकता है। युवा निवेशकों के पास दूसरे निवेशकों की तुलना में निवेश करने का वर्ष ज्यादा होता है। इस वजह से उनके निवेश पर लंबी अवधि में रिटर्न मिलने की दर भी ज्यादा होती है। इसके अलावा वे ज्यादा उम्र के निवेशकों की अपेक्षा ज्यादा जोखिम उठा सकते हैं। मान लें कि कॉलेज जाने वाला आम युवा हर महीने कम से कम 500 रुपये खर्च करता है। अब अगर इसकी गणना करें तो पता चल जाएगा कि पूरी पढ़ाई के दौरान उनका कुल खर्च कितना हुआ। अगर इतनी ही राशि हर महीने बचाई जाए और उसे 30 वर्षों तक निवेश किया जाए जिस पर 12 फीसदी की दर से रिटर्न मिल रहा हो तो आपके पास 30 वर्ष बाद लाखों रुपये का बैलेंस होगा। भारत में युवाओं की तादाद बाकी दूसरे उम्र के लोगों की तुलना में ज्यादा है। पिछले कुछ सालों में भारतीय अर्थव्यस्था में जबर्दस्त उछाल देखने को मिला है। इसकी वजह से लोगों के पास अतिरिक्त धन जमा हुआ है। भविष्य की जिंदगी को ध्यान में रख कर युवा आसानी से वित्तीय योजना अपना सकते हैं। मगर दिक्कत यह है कि ज्यादातर युवा इसकी योजना नहीं बनाते हैं। साथ ही जिन युवाओं की अच्छी खासी कमाई है वे भी बिना योजना के निवेश करते रहते हैं। जबकि उनके लिए बेहतर यही है कि किसी एक साधन में निवेश करने की बजाय अलग-अलग साधनों में निवेश करें। इनमें इक्विटी, डेट, रियल एस्टेट, सोना या फिर फिक्स्ड डिपॉजिट और मासिक बचत योजना कुछ भी हो सकता है। उदाहरण के लिए 23 वर्ष का कोई युवा 60 वर्ष तक हर महीने 2,000 रुपये की बचत करता है और उस पर उसे 15 फीसदी सालाना की दर से रिटर्न मिलता है तो उसके पास 60 वर्ष बाद 3,96,06,204 रुपये की पूंजी होगी। इस लिहाज से अगर उसकी तनख्वाह में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं भी होती है या फिर वह इससे ज्यादा का निवेश नहीं भी करता है तो भी उसे रिटायरमेंट के बाद ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इतनी कम राशि के निवेश से ही उसकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत होगी। कहने का मतलब यही है कि कम राशि को भी अगर कम उम्र से ही व्यवस्थित और योजनाबद्ध तरीके से निवेश किया जाए तो उससे बड़ी पूंजी बनाई जा सकती है। वित्तीय योजना बनाते समय युवा निवेशकों को सबसे पहले उन एसेट को चुनना चाहिए जिनमें वे निवेश कर सकते हैं। एसेट चुनने के बाद उनके उत्पादों को चुन कर निवेश की कर सकते हैं शुरुआत।
Tuesday, May 25, 2010
बुजुर्गों को अब रिवर्स मोर्गेज लोन से ज्यादा सहारा
घर गिरवी रखने के बदले सीनियर सिटीजंस को नियमित मासिक आय की सुविधा देने वाली रिवर्स मोर्गेज स्कीम में अब ज्यादा मासिक आय मिल सकती है। पहले जितनी मासिक आय इस स्कीम में मिलती थी, उससे करीब तीन गुना अब मिल पाएगी। इसका श्रेय स्टार यूनियन दाइची लाइफ इंश्योरेंस को जाता है जिसने रिवर्स मोर्गेज लोन देने वाले बैंकों को एक सुरक्षा चक्र मुहैया करा दिया है। इसके चलते वे सीनियर सिटीजंस ज्यादा मासिक आय दे पाएंगे। क्या है रिवर्स मोर्गेज स्कीम रिवर्स मोर्गेज स्कीम के तहत जिस सीनियर सिटीजन का अपना घर है वह उसे बैंक के पास गिरवी रखकर एक निश्चित राशि हर महीने हासिल कर सकता है, यही नहीं वह उस घर में रह भी सकता है। इसमें लोन की अवधि के दौरान उसे किसी तरह का ब्याज भी नहीं चुकाना होता है। लोन की राशि ब्याज सहित लोन लेने वाले व्यक्ति और उसकी पत्नी या पति की मृत्यु के बाद घर को बेचकर बैंक वसूल लेता है। उम्र के आधार पर लोन की गणनारिवर्स मोर्गेज लोन की स्कीम के लिए दिशा निर्देश तय करने वाले नेशनल हाउसिंग बोर्ड में असिस्टेंट जनरल मैनेजर पीआर जयशंकर ने कहा कि पहले के रिवर्स मोर्गेज प्रोडक्ट में सीनियर सिटीजंस के लिए भुगतान की गणना 20 साल की निश्चित अवधि के आधार पर की जाती थी। इसमें ब्याज भी जोड़ा जाता था। सीनियर सिटीजंस को दी जाने वाली मासिक रकम भी कम थी। अब एक इंश्योरेंस कंपनी बीमांकिक गणना कर रही है। इसमें किसी देश के खास आयु वर्ग की आगे की संभावित जिंदगी के आधार पर गणना की जाती है, जिसमें सीनियर सिटीजंस के लिए मासिक आय तीन गुना तक हो गई है। नया प्रॉडक्ट कुछ अलग है और काफी आसान है। उम्र के साथ बढ़ती जाएगी मासिक आयऐसे में यदि किसी सीनियर सिटीजन के घर की आज बाजार भाव पर कीमत 50 लाख रुपये है तो वह इसका 75 फीसदी यानी 37.5 लाख रुपये लोन मासिक किस्तों के रूप में ले सकता है। अब दाइची ने जो इंश्योरेंस कवर मुहैया करवाया है इससे बैंक उसी प्रॉपर्टी की ज्यादा कीमत आंककर ज्यादा मासिक दे सकेंगे। जो सीनियर सिटीजन 60 साल की उम्र में पहले 10 से 18 हजार रुपये मासिक ही हासिल कर पाता। इसमें वह तय करता है कि या तो उसकी संतान लोन चुका देगी या फिर बैंक प्रॉपर्टी को बेचकर लोन वसूल लेगा। इसमें वह अब 33 हजार रुपये तक मासिक हासिल कर सकेगा। उम्र के साथ-साथ लोन से मासिक आय भी बढ़ती चली जाएगी यानी उसे 60 की उम्र के बजाय 75 की उम्र में ज्यादा मासिक रकम मिलेगी। एक साथ भी ले सकते हैं 25 फीसदी लोनसेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पहले ही स्टार यूनियन दाइची से समझौता कर चुका है। होम लोन देने वाला एक अन्य बैंक जिसने सबसे पहले रिवर्स मोर्गेज लोन दिया था, दाइची से इस तरह का समझौता करने की तैयारी कर रहा है। दाइची से इस तरह के समझौते के तहत सीनियर सिटीजंस अन्य स्रोतों से आय होने के कारण लोन चुका भी सकते हैं और कुछ मासिक आय हासिल भी करते रह सकते हैं। कोई तात्कालिक जरूरत होने पर सीनियर सिटीजन इसमें कुल लोन का 25 फीसदी एक साथ भी ले सकता है। जयशंकर ने कहा कि दुनिया में यह अपनी तरह का पहला प्रोडक्ट है। अमेरिका में रिवर्स मोर्गेज स्कीम काफी लंबे समय से चल रही है, फिर भी रिवर्स मार्गेज लोन को कवर मुहैया कराने वाला कोई प्रोडक्ट वहां नहीं है। अमेरिका का डिपार्टमेंट ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट ने भी इस प्रोडक्ट में काफी रुचि दिखाई है। टीना अंबानी संचालित हारमनी फॉर सिल्वर्स फाउंडेशन और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने रिवर्स मोर्गेज लोन के बारे में ज्यादा जानकारी चाहने वालों के लिए हेल्पलाइन भी शुरू की है। उनसे भी इस बारे में ज्यादा जानकारी हासिल की जा सकती है।
Thursday, May 6, 2010
फाइनेंशियल प्लानिंग: थोड़े में भी जरूरतें पूरी
फिलहाल रवि की उम्र ३२ साल है और वह 60 साल की उम्र में रिटायर होना चाहता है। उसकी दो बेटियां हैं वह संयुक्त परिवार में रहता है इसलिए माता-पिता की जिम्मेदारी भी उस पर है। वह एक बड़ा घर और कार भी खरीदना चाहता है। यही नहीं वह अपनी दोनों बेटियों को अच्छी उच्च शिक्षा भी देना चाहता है और रिटायर होने तक उनकी शादी के लिए पैसा भी जुटाना है। हालांकि अभी वह अच्छी नौकरी करता है और सालाना 11.50 लाख रुपये कमाता है। वेतन में सालाना 20 फीसदी बढ़ोतरी होती रहे तो वह सभी जरूरतें पूरी करने के बाद सालाना 3.5 लाख रुपये बचा सकता है। इसके लिए उसने फाइनेंशियल प्लानिंग के बारे में सोचा। प्लान के मुताबिक उसे बताया गया कि अगले 28 साल में उसे अपने सभी लक्ष्य पूरे करने के लिए 9.5 करोड़ रुपये की जरूरत होगी तो वह अवाक रह गया। उसका तात्कालिक जवाब था कि यदि वह अगले 28 साल की पूरी सैलरी भी जोड़े तो 9.5 करोड़ रुपये नहीं बनते हैं। लेकिन जब उसे बताया गया कि यदि वह 3.20 लाख रुपये सालाना निवेश करे और सालाना इसमें 10 फीसदी बढ़ोतरी करता रहे तो वह इतनी रकम आसानी से हासिल कर लेगा। रवि अचंभित था क्योंकि उसने पहले यह सोचा ही नहीं था कि नियमित निवेश कर एक बड़ी रकम जुटाई जा सकती है और उसका मौजूदा जीवन स्तर भी बरकरार रहेगा। यह रकम वह अपने सभी मौजूदा जरूरी खर्च पूरे करते हुए जुटा सकता है।निवेश की उचित रणनीति जरूरीइसलिए सबसे जरूरी है कि आप एक अच्छा इन्वेस्टमेंट प्लानर चुनें जो आपको उचित निवेश रणनीति बता सके। फाइनेंशियल प्लानिंग आपके सामने इस बात की तस्वीर साफ कर देती है कि आप फिलहाल कहां हैं और भविष्य में कहां पहुंचना चाहते हैं। भारत में पर्सनल फाइनेंशियल प्लानिंग तुलनात्मक रूप से नया कॉन्सेप्ट है। जो लोग फाइनेंशियल प्लानिंग के बारे में जानते हैं वे भी पूरी प्रक्रिया को लेकर उलझन में रहते हैं, ऐसे में वे भी फाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर अनिच्छुक ही दिखते हैं। सलाहकार भी जिम्मेदारइस स्थिति के लिए फाइनेंशियल सर्विसेज इंडस्ट्री भी जिम्मेदार है। ज्यादातर मामलों में फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स बेचने के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग का दुरुपयोग किया जाता है। बीमा एजेंट, म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर, स्टॉक ब्रोकर या लोन मुहैया कराने वाले जो अपने को फाइनेंशियल प्लानर कहते हैं ये सब फाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर काफी उलझन पैदा करते हैं। पर्सनल फाइनेंशियल प्लानिंग की विस्तृत प्रक्रिया के बारे में कुछ तथ्य इस उलझन को दूर करने में अच्छी मदद कर सकते हैं।अच्छा फाइनेंशियल प्लानर जरूरीएक मान्यता प्राप्त फाइनेंशियल प्लानर जो विशेषज्ञ और अच्छी तरह से प्रशिक्षित है जरूरी वित्तीय आंकड़ों का मूल्यांकन कर आपकी मौजूदा वित्तीय स्थिति के बारे में ठीक से बता पाएगा। वह आपके वित्तीय और निजी लक्ष्य तय करने में मदद करेगा। वह आपकी वित्तीय समस्याओं को भी पकड़ पाएगा जो आपके वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनने में रोड़ा बन सकती हैं, साथ ही आपको वैकल्पिक समाधान भी बता सकेगा। समय-समय पर आपकी वित्तीय योजना का मूल्यांकन और उसमें बदलाव भी वह करने को कहेगा ताकि निर्धारित वित्तीय लक्ष्य हासिल किए जा सकें। आपकी वित्तीय स्थिति का साल में एक बार पुनर्मूल्यांकन होना बहुत जरूरी है। फाइनेंशियल प्लानर आपके लिए आपके लिए फाइनेंशियल हेल्थ डॉक्टर है जिससे समय-समय पर पर्सनल फाइनेंस के बारे में जांच करवाते रहना जरूरी है। आपके लक्ष्यों में कार, घर या प्रॉपर्टी खरीदना या बच्चों की शिक्षा, शादी कुछ भी हो सकता है। निवेश पर अच्छा रिटर्न हासिल करने, टैक्स बचाकर और लोन चुकाने में मदद कर फाइनेंशियल प्लानिंग आपको बढ़ती महंगाई दर से भी बचाती है। फाइनेंशियल प्लानिंग आपकी असामयिक मृत्यु या रिटायर होने पर परिवार को आर्थिक सुरक्षा देती है। फाइनेंशियल प्लानर आपकी सभी वित्तीय समस्याओं का समाधान निकालने में मदद करता है। कब शुरू करें फाइनेंशियल प्लानिंगफाइनेंशियल प्लानिंग को लेकर दूसरी शंका लोगों में यह होती है कि यह उनकी मौजूदा वित्तीय स्थिति पर भार डालती है। यह सही नहीं है और वास्तव में यह आपको निवेश और अपने पैसे का बुद्धिमत्तापूर्वक प्रबंधन सिखाती है। फाइनेंशियल प्लानिंग शुरू नहीं करने के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी है कि 20 साल की उम्र के युवा समझते हैं यह काफी जल्दी है और 40-50 के लोग समझते हैं कि बहुत देर हो चुकी है। निष्कर्ष में मैं यही करना चाहूंगा कि एक विस्तृत वित्तीय योजना आपको आर्थिक रूप से मजबूत बनाएगी और आपके दिमाग में यह स्पष्ट होगा कि आप भविष्य में अपनी योजनाएं कैसे पूरी कर पाएंगे।
Monday, April 19, 2010
फ्रूट बार बनाने से होगी अच्छी आमदनी
विभिन्न क्षेत्रों में तमाम तरह के फसल अलग-अलग मौसम में उगते हैं। नई फसल के समय फलों की मंडियों में सप्लाई इतनी ज्यादा होती है कि उत्पादकों को अच्छे दाम नहीं मिल पाते हैं। फल खराब होने से पहले बेचने के दबाव के कारण उत्पादक सस्ते मूल्य पर बेचने को विवश हो जाते हैं। लेकिन फलों की प्रोसेसिंग करके उत्पाद बनाने से बेहतर मूल्य पाना आसान हो सकता है। कई राज्यों में आम, संतरा, केला, अमरूद, सेब जैसे गूदादार फल पैदा होते हैं। इन फलों से फ्रूट बार बनाई जा सकती है। फ्रूट बार में फलों के सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं। स्वादिष्ट और पोषक होने के कारण फ्रूट बार क अच्छी मांग रहती है। सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएफटीआरआई) मैसूर के वैज्ञानिकों ने फलों से फ्रूट बार बनाने की बेहद सरल विधि तैयार की है। सीएफटीआरआई द्वारा विकसित विधि से तैयार फ्रूट बार को करीब तीन महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इन फ्रूट बार को आकर्षक पैकिंग में पेश करके बाजार में काफी लाभ कमाया जा सकता है। फ्रूट बार बनाने की विधिफ्रूट बार को बनाने की विधि बेहद सरल है और सीएफटीआरआई के वैज्ञानिकों ने इस विधि का पूरी तरह मानकीकरण किया है। फ्रूट बार बनाने के लिए ताजे और पके हुए फलों का उपयोग किया जाता है। सबसे पहले फलों को अच्छी तरह से धोकर उनका गूदा निकाल लिया जाता है। फिर इस गूदे को चीनी की आवश्यक मात्रा में मिला दिया जाता है। आमतौर पर चीनी की मात्रा को गूदे के बराबर रखी जाती है। फिर इस मिश्रण को ट्रे ड्रायर में सुखाया जाता है। ट्रे ड्रायर में इस मिश्रण को करीब 18 से 20 घंटे तक सुखाया जाता है। फिर इसके ठंडा करके तय आकार के छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है। इसके बाद फ्रूट बार को आकर्षक पैकिंग में पैक करने के बाद बाजार में बेचने के लिए भेज दिया जाता है। फ्रूट बार बनाने की मशीनकरीब 60 टन की सालाना क्षमता वाले इस फ्रूट बार बनाने की मशीनरी पर करीब 4.32 लाख रुपये का खर्च आता है और इसके लिए लगभग 100 वर्ग फुट के स्थान की आवश्यकता होती है। अगर जगह अपनी है तो सभी खर्च मिलाकर करीब 5.57 लाख रुपये तक आता है। इसमें उत्पादन के लिए 11 कर्मचारियों की जरूरत होती है। फ्रूट बार बनाने के लिए दो फलों की सफाई के टैंक (करीब 12,000 रुपये), एक गूदा निकालने का उपकरण (करीब 70,000 रुपये), 100 लीटर की क्षमता वाली दो दोहरी परत वाली भांप की कढ़ाइयां (करीब 30,000 रुपये), एक छोटा बॉयलर 100 किलोग्राम (करीब 75,000 रुपये), एक फ्रूट मिल (करीब 80,000 रुपये), 48 ट्रे वाला ट्रे ड्रायर (करीब 1,00,000 रुपये) और वजन तौलने की मशीन व अन्य उपकरण (करीब 65,000 रुपये) की जरूरत होती है। इस प्लांट में उत्पादन करके सभी नियमित खर्च निकालने के बाद सालभर में करीब तीन लाख रुपये तक की आसानी से आय हासिल की जा सकती है। सीएफटीआरआई यह प्लांट लगाने के लिए पूरी जानकारी और मदद देता है। फलों की फ्रूट बार बनाकर उत्पादक आसानी से ज्यादा आय हासिल कर सकते हैं। फ्रूट बार पौष्टिक तत्वों से भरपूर होने के अलावा स्वादिष्ट होती है, इस वजह से इसकी मांग हर छोटे-बड़े शहर होती है। इस वजह से फ्रूट बार बेचने के लिए उत्पादकों को बाजार की तलाश में कहीं भटकना नहीं पड़ेगा। वे अपने शहर-कस्बे में ही छोटे दुकानदारों से इसकी बिक्री के लिए संपर्क कर सकते हैं। उत्पादक फ्रूट बार की कीमत बाजार में उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति के अनुसार तय कर सकते हैं। मसलन छोटे कस्बों में दाम कम रखे जा सकते हैं। लेकिन कम दाम पर भी इसकी बिक्री से अच्छी आय होती है क्योंकि फलों के मुकाबले फ्रूट बार के दाम कई गुना ज्यादा रहते हैं।
Monday, April 5, 2010
सही उम्र में कराएं हेल्थ इंश्योरेंस
अच्छी सेहत को भी वरदान माना जाता है। पर इस वरदान को भी सुरक्षा की जरूरत पडऩे लगी है। आज के जमाने में जीवन शैली और खान-पान के तौर-तरीके बदलने से बीमारियों का नेचर बदल गया है। इसके साथ-साथ हेल्थ केयर के खर्चे भी बेतहाशा बढ़ गए हैं। परिवार के एक सदस्य को भी अगर अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है, तो मेडिकल बिल देखकर दिन में तारे नजर आने लगते हैं। ऐसे ही हालात में आर्थिक सुरक्षा देने का काम करता है हेल्थ इंश्योरेंस। पर लोगों के साथ आमतौर पर एक समस्या आती है कि इसे कब खरीदें? यानी हेल्थ इंश्योरेंस किस उम्र में कराया जाए? जीवन शैली और जरूरत का ध्यान रखें हेल्थ इंश्योरेंस कब कराया जाए? इस सवाल के जवाब के लिए सही तरीका ये है कि आप अपनी जीवन शैली और जरूरत को समझें। हर इंसान को खुद यह निर्णय करना होता है कि उसकी जीवन शैली और उसकी पारिवारिक जरूरतों के आधार पर उसकी आवश्यकताएं क्या हैं। वह किस तरह का लाभ चाहता है। उसे कितनी राशि का कवर चाहिए और यह भी कि उसकी लागत क्या है। इसके बाद वह बाजार में उपलब्ध विभिन्न प्रकार की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों पर नजर डाले व देखें कि उसके मापदंड पर कौन सी हेल्थ इंश्योरेंस योजना खरी उतरती है। कम उम्र में लेने से फायदा आज की उतार-चढ़ाव भरी दुनिया में हेल्थ इंश्योरेंस लेने का फैसला जल्दी करें। सबसे बेहतर तो यह रहेगा कि इसे कम उम्र में ही ले लें। जैसे-जैसे आपकी आयु उम्र बढ़ेगी वैसे-वैसे इसका प्रीमियम भी बढ़ता जाता है। बता दें कि ३ माह से लेकर ६० साल या इससे ज्यादा उम्र का कोई भी इंसान हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ले सकता है। तीन तरह की पॉलिसियां हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट में मौजूदा समय में तीन तरह की कंपनियां सक्रिय हैं- लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां, जनरल इंश्योरेंस कंपनियां और विशुद्ध हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां। इसी तरह से तीन तरह की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियां भी हैं- एक, जिनमें सभी प्रकार के हॉस्पिटलाइजेशन को कवर किया जाता है। दो, जिसमें हॉस्पिटल में भर्ती होने पर क्लेम का भुगतान किया जाता है और तीसरी वह जिनमें क्रिटिकल इलनेस व क्रिटिकल सर्जरी के खर्चों की भरपाई की जाती है। देखें बीमारियों का कवरेज कुछ योजनाओं में जोखिम कवर नहीं होते। और जब जरूरत पडऩे पर पॉलिसी काम न आए तो क्या फायदा? लिहाजा हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी चुनते समय यह जरूर देखें कि किन बीमारियों को कवर के दायरे में रखा गया है और किन बीमारियों को नहीं? रिन्युअल की मैक्सिमम उम्र पॉलिसी में यह भी देखेें कि बीमा कवर के रिन्युअल की अधिकतम आयु सीमा क्या है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है वैसे-वैसे किसी भी इंसान के लिए नई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी हासिल करना मुश्किल होने लगता है। तब सभी प्रकार के वेटिंग पीरियड लागू हो जाते हैं और फिर मौजूदा बीमारियां भी इस कवर के दायरे में नहीं रखी जाती। प्रीमियम के आधार पर नहीं बाजार में तरह-तरह के हेल्थ इंश्योरेंस प्लान मौजूद हैं-बेसिक कवर से लेकर जटिल सर्जिकल प्रोसीजर्स, क्रिटिकल इलनेस और हॉस्पिटलाइजेशन नकद भरपाई तक। लेकिन आप जब भी अपने लिए हेल्थ इंश्योरेंस खरीदें तब अपना फैसला महज बीमा प्रीमियम की राशि के आधार पर न करें। अलग-अलग बीमा कवर आपको भिन्न-भिन्न लाभ देंगे व इन सबकी विशेषताएं अलग होंगी लिहाजा इनके प्रीमियम में भी अंतर होगा। फैमिली फ्लोटर अच्छी हेल्थ इंश्योरेंस की फैमिली फलोटर पॉलिसी को अच्छा विकल्प माना जाता है। दरअसल अगर आप परिवार के हर सदस्य के लिए अलग पॉलिसी लेंगे तो सौदा मंहगा हो सकता है। पर फैमिली फलोटर प्लान में कवर की लागत पूरे परिवार के सदस्यों में बांटी जा सकती है। लिहाजा यह विकल्प सस्ता भी पड़ता है। पर ध्यान रहे इसका प्रीमियम परिवार के सबसे सीनियर मेंबर की उम्र के हिसाब से तय किया जाता है और जैसे जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ेगी वैसे-वैसे इसका प्रीमियम भी बढ़ता जाता है। टॉप-अप प्लान यदि आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है और आप इंश्योरेंस कवर में बढ़ोतरी चाहते हैं तो नई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने से बेहतर रहेगा कि इंश्योरेंस कंपनियों के टॉप-अप प्लान पर ध्यान दें। कई कंपनियां इस तरह के प्लान पेश करती हैं। यह आपके हेल्थ इंश्योरेंस कवर की लागत को कम करने का एक अच्छा जरिया हो सकता है।
घर खरीदने में जितनी देरी उतना नुकसान
अपना घर खरीदना सबका सपना होता है। ऐसे में आपके पास दो विकल्प हैं। या तो आप अभी घर खरीद लें और 20 साल तक मासिक किस्त (ईएमआई) चुकाते रहें। दूसरा किराए के घर में रहें और बची रकम से बाद में घर खरीद लें। आपको कौनसा विकल्प वित्तीय दृष्टि से उचित लगता है। घर के लिए किराया देना या घर खरीदना। क्या किराए के घर की अपने घर से कोई तुलना है? यहां दोनों विकल्पों की तुलना की गई है। पहले विकल्प में आप अभी घर खरीद सकते हैं जिसमें डाउन पेमेंट करते हैं और बाकी बैंक से लोन ले सकते हैं। इसमें आप 20 साल तक ईएमआई चुकाते हैं और तब आपको घर का मालिकाना हक मिलता है। दूसरे विकल्प में आप एक कम किराए के मकान में रह सकते हैं। किराया मकान की ईएमआई से काफी कम होता है और इस बची रकम को अच्छी जगह निवेश कर सकते हैं। इस रकम से आप 20 साल बाद मकान खरीद सकते हैं। आंकड़ों की नजर में अपना घरयहां मुंंबई के उपनगर में 2 बीएचके अपार्टमेंट का उदाहरण लेते हैं। मानो यह मकान आपको आज 75 लाख रुपये में उपलब्ध है। इसका 85 फीसदी आपको लोन मिल जाएगा। इसलिए आपको 11.25 लाख रुपये का डाउन पेमेंट करना पड़ेगा और बाकी 63.75 लाख रुपये का आप होम लोन लेते हैं। 20 साल के लिए आपको हर महीने करीब 65,344 रुपये की किस्त चुकानी होगी और बीस साल बाद वह घर आपका हो जाएगा। उस समय आपके घर की कीमत क्या होगी? यदि पिछले रिकॉर्ड पर नजर डालें तो प्रॉपर्टी में निवेश ने लंबी अवधि में 15 फीसदी रिटर्न दिया है। कम से कम 10 फीसदी रिटर्न भी मानें तो 20 साल बाद आपका घर 5.06 करोड़ रुपये का होगा। तब आप एक पांच करोड़ रुपये से भी ज्यादा कीमत वाले घर के मालिक होंगे। किराए पर रहने में क्या स्थितिअब देखें किराए के मकान वाला विकल्प। यदि आप ऐसे ही घर का मासिक किराया फिलहाल 22,000 रुपये चुकाते हैं तो 65,344 रुपये की ईएमआई के मुकाबले रकम बची 43,344 रुपये महीना। क्या आप यह रकम 20 साल के लिए कहीं निवेश कर सकते हैं। नहीं! क्योंकि मकान की कीमत बढऩे के साथ ही किराया भी बढ़ता रहेगा। ऐसे में मान लीजिए किराए में हर साल कम से कम 6 फीसदी की बढ़ोतरी होती है और आपका मासिक निवेश साल-दर साल घटता जाएगा। वास्तव में आप 20 साल ही निवेश कर पाएंगे क्योंकि 20 वें साल तो किराया ईएमआई से भी ज्यादा हो जाएगा। इस हिसाब से 20वें साल में किराया 66,563 रुपये प्रति माह हो जाएगा। 20 साल बाद आपका बचाकर किया गया निवेश कितना हो जाएगा। आप 20 साल की लंबी अवधि के लिए निवेश कर रहे हैं, ऐसे में आप स्टॉक मार्केट में निवेश कर अच्छा रिटर्न ले सकते हैं। मानिए आपको 12 फीसदी रिटर्न मिल जाएगा। ऐसे में 20 साल बाद आपका निवेश बढ़कर 2.82 करोड़ रुपये हो जाएगा, जो 20 साल बाद उस मकान की कीमत 5.06 करोड़ रुपये से काफी कम है। लेकिन रुकिए, हम यहां डाउन पेमेंट के रूप में दिए गए 11.25 लाख रुपये को भूल रहे हैं जो आपको घर खरीदते समय करना पड़ता। जब आप किराए पर रहेंगे तो यह रकम भी आप बचा लेंगे। यदि आप इस रकम को भी 20 साल के लिए निवेश कर देते हैं और 12 फीसदी रिटर्न हासिल करते हैं तो यह बढ़कर 1.09 करोड़ रुपये हो जाएगा। ऐसे में 20 साल बाद आपके पास 3.91 करोड़ रुपये जमा होंगे। दुर्भाग्य से यह रकम भी 20 साल बाद उस मकान की संभावित कीमत 5.06 करोड़ रुपये से काफी कम है। ऐसे में अभी घर खरीदने का विकल्प किराए पर रहकर 20 साल बाद घर खरीदने के मुकाबले कहीं ज्यादा फायदेमंद है। इसलिए जितना जल्दी हो सकता है घर खरीद लीजिए। यह एक ऐसी संपत्ति होगा जिसकी वैल्यू भविष्य में काफी ज्यादा होगी। लंबे समय के लिए प्रॉपर्टी में निवेश काफी बेहतर साबित होगा।
Friday, April 2, 2010
पोस्ट ऑफिस की स्कीमों का भी फायदा उठाएं
देश में म्यूचुअल फंड और शेयर मार्केट के निवेश के विकल्प होने के बाद भी कई निवेशक अब भी सुरक्षा को ज्यादा महत्व देते हैं। सुरक्षित रिटर्न देने वाले साधनों में पोस्ट ऑफिस की स्कीमों का बड़ा आकर्षण रहा है। इन स्कीमों के साथ सरकारी जुड़ाव होने की वजह से लाखों निवेशक इनमें अपना पैसा लगाते हैं। पोस्ट ऑफिस की मंथली इनकम स्कीम और रिकरिंग डिपॉजिट बीते कई साल से देश की लोकप्रिय स्कीमों में से एक रही हैं। अगर आप भी ऐसे निवेशकों में हैं, जो परंपरागत उत्पादों को तवज्जो देते हैं, तो फिर ये आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकते हैं। पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम अपना पैसा के सीईओ हर्ष रूंगटा के मुताबिक मंथली इनकम स्कीम के नाम से ही जाहिर होता है कि इसमें ब्याज की रकम हर महीने दी जाती है। ये स्कीम पूरी तरह सरकार की ओर से प्रायोजित है। निवेशक अपनी रकम पोस्ट ऑफिस में जमा करते हैं। और इस पर ८ फीसदी सालाना के हिसाब से ब्याज दिया जाता है। ब्याज की रकम हर महीने आपके बचत खाते में डाल दी जाती है। इससे आपको हर महीने पोस्ट ऑफिस जाने की जरूरत नहीं होती है। एमआईएस की अवधि ६ साल की होती है। आपकी रकम इस समय अवधि के लिए लॉक की जाती है। स्कीम की मैच्योरिटी पर 5 फीसदी बोनस भी मिलता है। इस तरह पूरी स्कीम पर प्रभावी ब्याज दर 8.9 फीसदी के आस-पास हो जाती है। पर एक बात ध्यान रखें इस पर 80सी के तहत इनकम टैक्स छूट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। मंथली इनकम स्कीम के तहत आप ४,50,000 रुपये तक का निवेश कर सकते हैं। संयुक्त खाते में 9,00,000 रुपये तक का निवेश किया जा सकता है। रिकरिंग डिपॉजिट वित्तीय एवं निवेश सलाहकार नवनीत धवन के मुताबिक पोस्ट ऑफिस के रिकरिंग डिपॉजिट के तहत आप हर महीने एक निश्चित रकम जमा करते हैं। इस रकम पर आपको हर महीने ब्याज मिलता रहता है। इस तरह मंथली इनकम स्कीम और आरडी के बीच एक सिस्टम बनाने की जरूरत होती है। मतलब ये कि आप जो पैसा मंथली इनकम स्कीम से अर्जित करेंगे, उसे आरडी में निवेश कर सकते हैं। एक स्कीम आपका हर महीने का आमदनी का जरिया बन जाती है, तो दूसरी में निवेश की जरूरत पड़ती है। आप हर महीने मंथली इनकम स्कीम से मिले ब्याज को रिकरिंग डिपॉजिट में निवेश कर सकते हैं। इससे आपको ज्यादा ब्याज मिलना सुनिश्चित हो जाता है। इसके लिए आपको बार-बार पोस्ट ऑफिस जाने की भी जरूरत नहीं है। बस आपको अपने मंथली इनकम स्कीम और रिकरिंग डिपॉजिट अकाउंट को खोलते वक्त पोस्ट ऑफिस को बताना होगा कि हर महीने आपके एमआईएस के ब्याज को आपके रिकरिंग अकाउंट में डाल दिया जाए। इस तरह इन दोनों के कंबीनेशन से बचत और निवेश का एक बेहतरीन विकल्प बनाया जा सकता है।
थोड़ा-थोड़ा निवेश करके बनाएं बड़ी रकम
इक्विटी यानी शेयरों में किए जाने वाले निवेश को लेकर हमारे यहां आज भी आशंका भरी नजरों से देखा जाता है। पर हकीकत में अगर आपको एक बड़ी पूंजी बनानी है, तो शेयर बाजार से बेहतर रास्ता कोई नहीं हो सकता। इक्विटी में लंबे समय तक सावधानी से किया गया छोटा निवेश भी हर हाल में एक बड़ी रकम बन जाता है। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि शेयरों में निवेश के लिए एक बड़ी रकम की जरूरत होती है। पर ऐसा पूरी तरह सच नहीं है। एक निश्चित रकम को अगर किसी तय अवधि तक बाजार में लगाया जाए, तो इसके जरिए एक बड़ी रकम हासिल की जा सकती है। कैसे बनाएं पंूंजी थोड़े-थोड़े पैसे को शेयर बाजार में निवेशक करके एक बड़ी रकम बनाना बहुत मुश्किल भी नहीं है। मान लीजिए आप 40,000 रुपये महीना कमाते हैं। आप अपनी कुल आमदनी का 10 फीसदी निवेश कर सकते हैं। आप अपने पैसे को 30-35 साल तक निवेश कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में आपके रिटायरमेंट तक आपके पास एक बड़ी रकम उपलब्ध होगी। अगर 25 साल के हैं और 60 साल में रिटायर होना चाहते हैं। साथ ही परिवार के 3-4 सदस्य आप पर आश्रित हैं। और आपका मासिक खर्च करीब 25,000 रुपये है। इन हालात में आप इक्विटी में निवेश करके एक बड़ी रकम बनाना चाहते हैं। इसके लिए आपको एक बेहतरीन प्लान पर काम करना होगा। निवेश की योजना बनाएं अपने रिटायरमेंट के लिए आपको पैसा इकट्ठा करना है। चूंकि आपकी उम्र अभी बहुत ज्यादा नहीं है, इसलिए आप इक्विटी में निवेश कर सकते हैं। मान लेते हैं कि आप 5,000 रुपये प्रति माह डायवर्सिफाइड इक्विटी म्यूचुअल फंड में लगा सकते हैं। ये निवेश आप रिटायरमेंट की उम्र तक कर सकते हैं। हालांकि इसमें बाद में बदलाव भी कर सकते हैं। पर मान लेते हैं कि आप ये पैसा रिटायरमेंट तक इसी फंड में लगाते रहेंगे। चूंकि आप 35 साल के लिए निवेश कर रहे हैं, इसलिए इस निवेश में जोखिम बेहद कम है। भले ही ये निवेश इक्विटी में किया जा रहा है, पर जोखिम यहां कम ही माना जाएगा। शेयर बाजार बहुत ज्यादा जोखिम शॉर्ट टर्म के निवेश पर ही होता है। 35 साल जैसी लंबी अवधि के लिए तो यह बिल्कुल भी रिस्की नहीं है। इसमें तो आप बहुत ही आकर्षक रिटर्न हासिल कर सकते हैं। यदि सेंसेक्स को ही लें तो पिछले 30 साल में यानी 1979 से 2009 तक इसने 15 से 17 फीसदी तक रिटर्न दिया है। ऐसे में अगर लांग टर्म के लिए निवेश कर रहे हैं तो कम से कम 15 फीसदी रिटर्न तो आप सुरक्षित मान सकते हैं। अब मूल बात पर आते हैं। निवेशकों को शुरुआती सालों में इतनी रकम का निवेश करने में परेशानी आ सकती है। बाद में उसकी जिम्मेदारियां बढ़ती चली जाएंगी। लेकिन कैरियर आगे बढऩे के साथ-साथ सेलरी भी बढ़ेगी और 5,000 रुपये मासिक निवेश ज्यादा कठिन नहीं होगा। कितना होगा निवेश आप हर महीने 5,000 रुपये निवेश कर सकते हैं। इसका मतलब ये हुआ कि आप साल में 60,000 रुपये इक्विटी में लगाएंगे। आपको चूंकि 35 साल तक निवेश करना है, इसका मतलब ये हुआ कि आप 35 साल में 21 लाख रुपये जमा करेंगे। मान लेते हैं इस पर आपको औसत रिटर्न 15 फीसदी हासिल होगा। इस तरह आपको 3,00,000 रुपये और मिल जाएंगे। इस तरह कुल आपको कुल रिटर्न 24 लाख रुपये मिल जाएगा। अब अगर इस ब्याज दर को जोड़कर रिटर्न निकालें तो 15 फीसदी की दर से ये रकम भी करीब 24 लाख रुपये बनती है। मान लेते हैं कि आपको कुल 50 लाख रुपये मिल जाएंगे। ये आकलन सिर्फ साधारण ब्याज दर के आधार पर निकाला गया है। आमतौर पर लोग इसी तरह सोचते हैं। पर ऐसा होता नहीं है। इसमें वार्षिक कंपाउंड इंटरेस्ट वाला फॉर्मूला नहीं अपनाया गया है, बल्कि एक साधारण सी गणना है जो कोई भी कर सकता है।कंपाउंड इंटरेस्ट रेट का चमत्कारपर ब्याज की गणना ऐसे होती नहीं है। कंपाउंड इंटरेस्ट रेट के आधार पर आकलन करने पर आपकी रकम करोड़ों में बदल जाएगी। सही-सही गणना के मुताबिक उसके पास करीब 7.43 करोड़ रुपये होंगे। आप सोच रहे होंगे कि इतनी बड़ी रकम कैसे संभव है। यह कंपाउंड (चक्रवृद्धि) ब्याज दर का चमत्कार है। ब्याज पर ब्याज मिलता है और यह बढ़ता रहता है। शुरुआत में ब्याज बहुत कम दिखता है, लेकिन समय के साथ यह राशि बढ़ती रहती है और 35 साल जैसी बड़ी अवधि के बाद तो यह राशि आपको अविश्वसनीय सी लगेगी। क्या आप विश्वास करेंगे कि 5,000 रुपये महीना निवेश करने पर आपको 35 साल बाद 1.04 करोड़ रुपये तो केवल ब्याज के मिलेंगे जो आपकी निवेश की गई मूल रकम से भी चार गुना है। यह सब कंपाउंड इंटरेस्ट का कमाल है इसीलिए तो महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने चक्रवृद्धि ब्याज को विश्व का आठवां अजूबा करार दिया था।10 साल बाद करें ऐशयदि आप 35 साल जितनी लंबी अवधि तक निवेश का दर्द नहीं सहन कर सकते तो कोई नहीं आप 10 साल तक निवेश कर मुक्ति पाइए। 5,000 रुपये महीना 10 साल तक निवेश करने के बाद बाकी 25 साल तक वह रकम कंपाउंड ब्याज से बढ़ती हुई एक बड़ी रकम बन जाएगी। ऐसे में आपके पास 2.12 करोड़ रुपये ही होंगे यानी आपको पहले के मुकाबले 5.88 करोड़ रुपये कम मिलेंगे। एक उपाय है, यदि आप चाहते हैं कि केवल 10 साल तक निवेश करके भी आपको 35 साल बाद 7.43 करोड़ रुपये ही मिलें तो मासिक निवेश आपको थोड़ा बढ़ाना पड़ेगा। आपको हर महीने 1,420 रुपये ज्यादा निवेश करना होगा। यानी 6,420 रुपये मासिक निवेश 10 साल तक कीजिए और अगले 25 साल तक उसे बढऩे के लिए छोड़ दीजिए। तब आपका धन 7.43 करोड़ रुपये हो जाएगा।पहले जितना बोझ, बाद में उतना आरामइससे आपको एक बात तो समझ में आ गई होगी कि पहले सालों में निवेश में जितना कष्ट सहन करेंगे बाद में उतना ही फायदा होगा। कैरियर के पहले सालों में कोई भी व्यक्ति ज्यादा निवेश करने की स्थिति में भी होता है क्योंकि तब जिम्मेदारियां कम होती हैं और निर्भर सदस्य भी कम होते हैं। यदि कोई 10 साल के लिए थोड़ा ज्यादा कष्ट लेकर 1,420 रुपये मासिक ज्यादा निवेश करता है तो निवेश से 25 साल भी बचा लेता है और उतनी ही रकम भी बना लेता है। यदि वह अपनी सेलरी का 50 फीसदी यानी 20,000 रुपये प्रति महीना दो साल के लिए निवेश कर सके तो भी वह इतनी रकम हासिल करने में कामयाब हो सकता है। 20,000 रुपये मासिक निवेश 2 साल तक करके अगले 33 साल उसे सुरक्षित छोडऩे पर उसकी रकम 9.24 करोड़ रुपये होगी। यदि आप सोचते हैं कि निवेश का यह मौका तो 5,10 या 20 साल पहले था तो चिंता मत कीजिए अब भी मौका है।
Wednesday, March 31, 2010
खाता बंद करने में भी मुश्किल
निजी बैंकों में बचत खाता खोलने वाले जरा सावधान रहें। बचत खाता बंद कराने पर ज्यादातर निजी बैंक सीधे आपकी जेब पर हमला कर रहे हैं और कुछ शुल्क वसूल रहे हैं। अगर आप बैंक की कार्य और नीतियों को नापसंद कर अपना खाता बंद कराना चाहते हैं तो बैंक उस पर भी एग्जिट चार्ज वसूलकर आपकी जेब हल्की कर सकते हैं। यह चार्ज 100 रुपये से लेकर 500 रुपये तक हो सकता है। निजी बैंकों से पीछा छुड़ाना अब आसान नहीं रह गया है। देश में कार्यरत एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एचएसबीसी जैसे दूसरे निजी बैंक ग्राहकों से उनका खाता बंद करने के लिए अलग से शुल्क ले रहे हैं। एचडीएफसी बैंक के एक अधिकारी मोहम्मद सलीम ने बताया कि हमारे बैंक में जमा खाता खुलवाने वाला व्यक्ति यदि छह महीने के अंदर ही अपना खाता बंद करना चाहता है तो उसे 500 रुपये बतौर एग्जिट चार्ज देना होगा। यह शुल्क उतना ही है जितना किसी ग्राहक को तिमाही न्यूनतम राशि अपने खाते में न रखने पर चुकानी पड़ती है। उन्होंने बताया कि हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि बैंकों को ग्राहक का खाता खुलवाने के दौरान कई तरह के प्रोसेसिंग खर्च चुकाने होते हैं। इसके अलावा एचएसबीसी बैंक के वित्तीय योजना प्रबंधक जयदेव अरोड़ा ने भी बताया कि खाता खुलने के छह माह के अंदर इसे बंद कराया जाए तो ग्राहक को 500 रुपये बैंक को देने होंगे। बैंक
एग्जिट चार्ज
अवधिएचडीएफसी बैंक
500 रुपये
6 माह तकएचएसबीसी
500 रुपये
6 माह तकआईसीआईसीआई बैंक
400 रुपये
1 वर्ष तकएबीएन एमरो
336 रुपये
1वर्ष तकयस बैंक
100 रुपये
कभी भी
एग्जिट चार्ज
अवधिएचडीएफसी बैंक
500 रुपये
6 माह तकएचएसबीसी
500 रुपये
6 माह तकआईसीआईसीआई बैंक
400 रुपये
1 वर्ष तकएबीएन एमरो
336 रुपये
1वर्ष तकयस बैंक
100 रुपये
कभी भी
जरूरत के मुताबिक फिक्स्ड डिपॉजिट
किसी भी निवेशक के पोर्टफोलियो में सावधि जमा (एफडी) की हिस्सेदारी काफी ज्यादा होती है। दरअसल सुरक्षित रिटर्न की उम्मीद सबसे ज्यादा इसी में होती है। एफडी का परंपरागत रूप काफी साधारण था, लेकिन अब बाजार में गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से बैंकों ने एफडी के रूप में कई बदलाव किए हैं। एफडी में भी अब कई तरह के विकल्प मौजूद हैं।इंश्योरेंस सुविधा के साथ अपना पैसा के सीईओ हर्ष रूंगटा के मुताबिक कुछ एफडी के साथ इंश्योरेंस भी जुड़ा हुआ होता है। ऐसे में एफडी तो अपने मूल रूप में बनी ही रहती है साथ में इंश्योरेंस का अतिरिक्त फायदा भी मिल जाता है। लेकिन यह फायदा जमा की राशि और एफडी की अवधि पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए कुछ बैंक 25,000 रुपये की तीन साल की एफडी पर 5 लाख रुपये का फ्री एक्सीडेंट कवर भी देते हैं। एफडी पर 7 फीसदी ब्याज आपको मिलेगा। इससे प्रॉडक्ट की वैल्यू बढ़ जाती है। कई बैंक केवल एक्सिडेंट इंश्योरेंस ही देते हैं जिसमें सम एश्योर्ड राशि 3 लाख से 7 लाख रुपये के बीच होगी। आमतौर पर ऐसे कवर में कई शर्तें जुड़ी हुई होती हैं और यह आपकी सभी बीमा जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता।ब्याज का पुनर्निवेशनिवेश सलाहकार नवनीत धवन के मुताबिक कुछ बैंक एफडी से हासिल होने वाले ब्याज की रकम के रीइनवेस्टमेंट की सुविधा भी देते हैं। मानएि आप एफडी पर हर तिमाही में 2,000 रुपये ब्याज के रूप में पा रहे हैं। ऐसे में इस रकम की एक और एफडी बैंक मौजूदा ब्याज दरों पर शुरू कर देगा। फिक्स्ड डिपॉजिट ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स हैं जिनमें रिटर्न तय है और यदि निवेशक अपनी रकम मैच्योरिटी की अवधि से पहले भी निकालता है तो बैंक ऐसे में कुछ जुर्माना लगाते हैं। ऐसे मामलों में रिटर्न कुछ कम हो जाता है। लेकिन कुछ बैंक ऐसे भी हैं जो एफडी को बीच में तोडऩे पर जुर्माना नहीं लगाते हैं। एफडी में ऐसा लचीलापन निवेशकों को काफी आकर्षित करता है।समय सीमा में छूटज्यादातार लोग एफडी किसी निश्चित लक्ष्य के लिए करवाते हैं। जैसे कोई महंगी चीज खरीदनी हो या बच्चे की शादी करनी हो। ऐसे कार्यक्रम तय समय से आगे टल भी सकते हैं। ऐसे में या तो निवेशक को एफडी मैच्योर होने के बाद पैसा निकालना ही पड़ता है, जिससे उसे रिटर्न में नुकसान उठाना पड़ता है। लेकिन अब कई बैंक एफडी में निवेश करने वालों को एफडी की समय सीमा बढ़ाने का विकल्प भी निवेशकों को दे रहे हैं। इसमें वे अपने कार्यक्रम के मुताबिक उसका एफडी की मैच्योरिटी अवधि बढ़ा सकते हैं।जमा को तोडऩे का विकल्पनिवेश सलाहकार अर्णव पंड्या के मुताबिक समान मूल्य वर्ग की कई जमाओं में बड़ी संख्या में कागजी कार्रवाई करनी पड़ती हैं। यह काम आमतौर पर उन निवेशकों को करना पड़ता है जिन्हें भविष्य में भिन्न-भिन्न समय पर पैसे की जरूरत होती है। ऐसे में उनकी इच्छा पूरी रकम को एक साथ एफडी में निवेश करने की नहीं होती है क्योंकि बाद में पैसे की जरूरत पडऩे पर उन्हें एफडी तोडऩी पड़ सकती है जिसमें उनको रिटर्न कम मिलेगा। निवेशकों की इस समस्या को देखते हुए कई बैंक ऐसी व्यवस्था दे रहे हैं जिसमें एफडी की पूरी रकम को निवेशक की जरूरत के हिसाब से अगल-अलग मूल्य वर्ग के कई हिस्सों में बांट देते हैं। ऐसी एफडी में निवेशकों को ज्यादा रिटर्न का फायदा मिल जाता है।
Tuesday, March 30, 2010
अब अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में घर खरीदने पर देना होगा सर्विस टैक्स
अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी की खरीद पर अब आपको सर्विस टैक्स से भी जूझना होगा। नए बजट में इसका प्रावधान किया गया है। सर्विस टैक्स पहली अप्रैल से लागू होगा। अब किसी भी बन रहे मकान या फ्लैट के खरीदने पर बिल्डर को 10.3 फीसदी सर्विस टैक्स देना होगा। जाहिर है इसका बोझ ग्राहकों के सिर ही आएगा। नियम के मुताबिक जब तक किसी प्रॉपर्टी पर लोकल अथॉरिटी से कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिल जाता है, उसे अंडर कंस्ट्रक्शन (निर्माणाधीन) प्रोजेक्ट माना जाएगा। इस तरह जब तक किसी प्रॉपर्टी पर अथॉरिटी से कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा, तब तक वो सर्विस टैक्स के दायरे में रहेगी। अगर आप प्रॉपर्टी काम पूरा हो जाने का सर्टिफिकेट मिलने के बाद खरीदते हैं, तब सर्विस टैक्स का कोई चक्कर नहीं होगा। जरा गौर से समझें टैक्स को सर्विस टैक्स को लेकर बिल्डर आपके साथ मनमानी कर सकते हैं। ऐसे में कुछ समझदारी आपको दिखानी होगी। आप ये न सोचें कि अगर किसी निर्माणाधीन अपार्टमेंट में 30 लाख रुपये का फ्लैट खरीदेंगे, तो आपको 10.3 फीसदी के हिसाब से 3.09 लाख रुपये सर्विस टैक्स के तौर पर देने होंगे । यहां ध्यान देने की बात ये है कि सर्विस टैक्स पूरे अमाउंट पर नहीं देना है। कोई भी बिल्डर किसी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में 67 फीसदी अमाउंट जमीन की कीमत और मैटेरियल आदि की वसूल करता है। बाकी 33 चार्ज बिल्डर की सर्विस का होता है। इसका मतलब ये हुआ कि बिल्डर को 10.3 फीसदी की दर से सर्विस टैक्स सिर्फ 33 फीसदी अमाउंट पर ही देना होगा। इस तरह पूरे अमाउंट पर सर्विस टैक्स की प्रभावी दर 3.34 फीसदी ही होगी। कब देना होगा टैक्स अमूमन ज्यादातर लोग होम लोन के जरिए घर खरीदते हैं। यही नहीं घर भी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में ही खरीदा जाता है। ज्यादातर लोग किसी नए प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक कराते हैं। इसके पैसे का भुगतान कुछ अंतराल पर स्टेज आधारित होता है। इसका मतलब ये हुआ कि ज्यादातर लोग बिल्डर को पैसे का भुगतान बिल्डिंग पूरी बनने से पहले ही करते हैं। दरअसल बिल्डिंग पूरी हो जाने के बाद ही बिल्डर को कंप्लीशन सर्टिफिकेट मिलता है। इस तरह इस पूरे भुगतान पर सर्विस टैक्स लगेगा। इस टैक्स का भुगतान बिल्डर को ही करना होगा। पर मुश्किल ये है कि बिल्डर इस टैक्स का बोझ ग्राहकों के सिर डालेंगे। इस तरह पहली अप्रैल से जब आप घर खरीदने जाएंगे, तो ज्यादा रकम चुकानी होगी। लोकेशन पर भी चार्ज सर्विस टैक्स के लिए कुछ और प्रावधान किए गए हैं। अगर आप किसी बेहतरीन लोकेशन पर फ्लैट या घर खरीदते हैं, तो इसके लिए भी बिल्डर को 10.3 फीसदी सर्विस टैक्स देना होगा। अगर आप बिल्डर से किसी खास नंबर का फ्लैट या पार्क फेसिंग-स्वीमिंग पूल फेसिंग या फिर वास्तु आदि की सुविधा के मुताबिक फ्लैट मांगते हैं, तो आपको सर्विस टैक्स देना होगा। पर एक चीज ध्यान रखें पार्किंग या गैराज आदि की सुविधा पर सर्विस टैक्स नहीं लिया जा सकता है। इसके लिए साफ-साफ निर्देश हैं। कैसे लगेगा टैक्स मान लीजिए आपने 1000 वर्ग फुट का फ्लैट खरीदा। इस फ्लैट का रेट 3,000 रुपये प्रति वर्ग फुट है। आपने पांचवें फ्लोर पर बेहतरीन सुविधाओं के लिए 100 रुपये प्रति वर्ग फुट का अतिरिक्त भुगतान किया। आपने 2 लाख रुपये में पार्किंग स्पेश खरीदा। इस तरह आपने कुल 33 लाख रुपये का भुगतान किया। ये पूरा पैसा आपने बिल्डिंग का निर्माण पूरा होने से पहले बिल्डर को दे दिया। इस तरह अब सर्विस टैक्स कुछ इस तरह बनेगा। पहले तो पार्किंग स्पेश के 2 लाख रुपये पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। पांचवीं मंजिल पर बेहतरीन सुविधाओं के लिए आपने 100 रुपये प्रति वर्ग फुट ज्यादा दिए हैं। 1000 वर्ग फुट के फ्लैट पर 10.3 फीसदी की दर से ये टैक्स बनेगा 10,300 रुपये। फ्लैट की असल कीमत 30 लाख रुपये है। इसकी 67 फीसदी आप जमीन की कीमत और बिल्डिंग मैटेरियल का कास्ट निकाल दीजिए। 30 लाख का 67 फीसदी 20,10,000 रुपये बनेगा। अब बाकी 9,90,000 रुपये पर आपको 10.3 फीसदी की दर से सर्विस टैक्स देना होगा। इस तरह ये रकम बनेगी 1,01,970 रुपये। इस तरह आपको कुल 10,300 और 1,01,970 यानी 1,12,270 रुपये बतौर सर्विस टैक्स देने होंगे।
Monday, March 29, 2010
मक्का की प्रोसेसिंग से कमाएं मुनाफा
भारत में जिन खाद्य फसलों का उत्पादन किया जाता हैं, उनमें गेहूं और चावल के बाद मक्का का स्थान तीसरे नंबर पर आता है। पर इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के बावजूद भी इसके प्रसंस्करण और उससे बनने वाले उत्पादों के बारे में कम ही लोगों को जानकारी है। खास बात तो यह है कि देश में टेक्सटाइल इंडस्ट्री स्टार्च के लिए मुख्य तौर पर मक्का पर ही निर्भर है। इस तरह मक्का की प्रोसेसिंग कर स्टार्च, कॉर्न फ्लोर, कॉर्न ऑयल, कॉर्न फ्लैक्स, पशुहार, बेबी कार्न आदि उत्पाद बनाए जा सकते हैं।देश में आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र मक्का के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। वहीं, अन्य प्रदेशों की तुलना में मध्यप्रदेश मक्का उत्पादन में चौथे नंबर पर आता है। इसके अलावा पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, बिहार, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, मेघालय, मनीपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा आदि राज्यों में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। मौजूदा समय में मक्का का लगभग 55 प्रतिशत उपयोग भोजन, 14 प्रतिशत पशुहार, 18 प्रतिशत मुर्गीदाना, 12 प्रतिशत स्टार्च और करीब डेढ़ प्रतिशत का उपयोग बीज के रूप में किया जाता है। इसके दाने में करीब 30 प्रतिशत तेल, 18 प्रतिशत प्रोटीन और बड़ी मात्रा में स्टार्च पाया जाता है। मक्का की प्रोसेसिंग कर जहां इसके विभिन्न प्रकार के स्नैक्स बनाए जा सकते हैं, वही अच्छी मात्रा में प्रोटीन होने के कारण इसके बिस्किट सहित अन्य बेकिंग उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं। इसके अलावा रेडी टू ईट प्रोडक्ट के रूप में भी मक्का के विभिन्न उत्पाद इन दिनों प्रचलन में हैं। साथ ही कॉर्न फ्लैक्स और बेबी कॉर्न मक्का के खाद्य उत्पादों में लोकप्रिय हो रहे हैं। इस क्षेत्र में कई बड़ी कंपनियों के ब्रांड भी बाजार में आसानी से दिखाई दे सकते हैं। इन सबके अलावा मक्का का स्टार्च द्रव्य अथवा पावडर रूप में बड़ी खपत वाला उत्पाद है। इस समय टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज में मक्का के स्टार्च की बड़ी डिमांड हैं। टेक्सटाइल के अलावा अनेक खाद्य पदार्थो भी मक्का का स्टार्च इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह प्रोसेसिंग कर इसका तेल भी बनाया जा सकता है, जो कि विभिन्न दवाओं के साथ मालिश आदि में प्रयुक्त होता है। साथ ही मक्का लिक्विड शुगर के तौर सोरविटॉल, ग्लूकोज सहित कई अन्य उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं। केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान भोपाल के वरिष्ठ वरिष्ठ वैज्ञानिक (खाद्य प्रसंस्करण) डा. एसपी सिंह बताते हैं कि लघु एवं कुटीर उद्योग के रूप में मक्का प्रसंस्करण की इकाई लगाने के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। इसमें स्टार्च पावडर, कॉर्न फ्लेक्स, कॉर्न फ्लोर की छोटी इकाई लगाने के लिए अलग-अलग रूप से करीब पांच लाख रुपये निवेश की जरूरत होती है। ऑटोमेटिक संयंत्र लगाने के लिए लगभग 20 लाख रुपये तक खर्चा आता है। इसके लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के तहत सब्सिडी पर वित्त का प्रबंध किया जा सकता है। मक्का प्रसंस्करण में करीब 200 मीट्रिक टन प्रति दिन क्षमता की स्टार्च उत्पादन क्षमता वाली इकाई की स्थापना में लगभग 30 करोड़ रुपये निवेश की जरूरत होती है। इस इकाई में मक्का के ग्लूकोज, जर्मस, फाइबर, ग्लूटेन आदि का उत्पादन भी किया जा सकता है।
Tuesday, March 23, 2010
बेची गई प्रॉपर्टी पर कैसे बचाएं टैक्स
सब जानते हैं कि प्रॉपर्टी बाजार काफी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हर साल बड़ी संख्या में प्रॉपर्टी बिक्री संबंधी सौदे होते हैं। जो व्यक्ति प्रॉपर्टी बेचता है उसे काफी मोटी रकम हासिल होती है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति यह जानने का इच्छुक जरूर होता है कि प्रॉपर्टी बेचने से हासिल रकम को वह कैसे टैक्स से बचा सकता है। साथ ही जिसने भी प्रॉपर्टी खरीदी है वह भी संभव है कभी इसे किसी दूसरे को बेचे, ऐसे में वह भी टैक्स बचत की बारीकियां सीखना चाहेगा। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि बेची गई प्रॉपर्टी पर लगने वाले कैपिटल गेन टैक्स से कैसे बचा जा सकता है।लांग टर्म कैपिटल गेन ज्यादा महत्वपूर्णसबसे पहले तो यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि हम केवल लांग टर्म कैपिटल गेन टैक्स के बारे में बात कर रहे हैं। कैपिटल गेन उस प्रॉपर्टी की बिक्री पर लगता है जो आपके पास तीन साल से ज्यादा समय से थी। ऐसी प्रॉपर्टी जो आपके पास तीन साल से कम समय से थी उसकी बिक्री शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन के तहत आती है और उस पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है। इस तरह के शॉर्ट टर्म गेन को आपकी अन्य आय में गिना जाता है जिसके चलते इस पर लगने वाले टैक्स को आप आयकर की धारा 80 सी के तहत मिलने वाली छूट के तहत निवेश कर बचा सकते हैं। 80 सी के तहत पीपीएफ, ईएलएसएस, एनएससी आदि में निवेश किया जाता है।एनएचएआई या आरईसी के बांड्स में निवेशइसके अलावा लांग टर्म कैपिटल गेन पर टैक्स आप दो तरीकों से बचा सकते हैं। टैक्स बचाने का पहला रास्ता है प्रॉपर्टी बेचने से प्राप्त पूंजी को छह महीनों के भीतर एनएचएआई या आरईसी के बांड्स में निवेश किया जाए। यह टैक्स बचाने का सबसे सरल रास्ता है। इसमें परेशानी केवल यह है कि निवेश के लिए दिए गए समय में आपके लिए बांड्स उपलब्ध हो पाएं। दूसरी बात यह है कि इस निवेश पर एक वित्त वर्ष में केवल 50 लाख रुपये की निवेश लिमिट है। ऐसे में यदि आपने प्रॉपर्टी बेचकर इससे भी ज्यादा रकम हासिल की है तो यह रास्ता आपके के लिए ज्यादा फायदेमंद नहीं हो सकता। हां, यह हो सकता है कि आप प्रॉपर्टी बेचने का समय ऐसा चुनें जब छह महीनों के भीतर वित्त वर्ष बदल जाए। ऐसे में आप निवेश की लिमिट को एक करोड़ रुपये तक ले जाए पाएंगे। उदाहरण के लिए यदि कोई प्रॉपर्टी जनवरी में बेची जाती है तो उसके लिए निवेश की छह महीनों की समय सीमा जून में समाप्त होगी। जून अगले वित्त वर्ष में पड़ेगा, ऐसे में आप छह महीनों के भीतर ही एक करोड़ रुपये का निवेश इन बांड्स में कर सकेंगे।दूसरी प्रॉपर्टी में निवेश से बचतलांग टर्म प्रॉपर्टी गेन टैक्स से बचने का दूसरा तरीका है प्राप्त पूंजी को किसी दूसरी प्रॉपर्टी में निवेश करना। इस तरीके से टैक्स छूट हासिल करने के लिए कई शर्तें हैं। इनमें पहली है जो पॉपर्टी बेची गई है वह रेजिडेंशियल होनी चाहिए, कॉमर्शियल नहीं। कॉमर्शियल प्रॉपर्टी की स्थिति में आपको सेक्शन 54एफ का सहारा लेना पड़ेगा। इसके मुताबिक आपको बिक्री से प्राप्त शुद्ध प्राप्ति को निवेश करना होगा न कि केवल कैपिटल गेन अमाउंट। हां यहां रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी का मतलब यह नहीं है कि वह आपकी खुद की हो। रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी किराए पर ली गई भी हो सकती है। दूसरी शर्त के मुताबिक यह छूट व्यक्ति विशेष और हिंदू अधिनियम के तहत अविभाजित परिवार को ही मिल सकती है। ऐसे में यदि कोई कंपनी या हिस्सेदार फर्म प्रॉपर्टी बेचती है तो उसे यह छूट नहीं मिलेगी। करदाता को तैयार रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी या अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी या तो एक साल पहले या बिक्री से दो साल बाद तक खरीदनी होगी। अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी बिक्री के तीन साल बाद तक खरीदी जा सकती है। कंस्ट्रक्शन की शुरुआत को लेकर इसमें कोई प्रतिबंध नहीं है। इसके अलावा यह भी जरूरी नहीं है कि कैपिटल गेन अमाउंट और नए घर की कीमत के बीच कोई संबंध हो। उदाहरण के लिए करदाता प्रॉपर्टी बेचने से हासिल रकम को निवेश करने के बाद बाकी रकम के लिए लोन भी ले सकता है। यदि लोन की वैल्यू कैपिटल गेन के बराबर है तो टैक्स छूट मिल सकती है। यदि लोन वैल्यू कैपिटल गेन से कम है तो भी छूट लोन वैल्यू की हद तक मिल सकती है।तीन साल नहीं बेच सकते नई प्रॉपर्टीनए घर की बिक्री पर तीन साल का लॉक इन है। ऐसे में यदि तीन साल से पहले घर को बेचा गया तो पहले दी गई टैैक्स छूट वापस ले ली जाएगी। ऐसे में कैपिटल गेन टैक्स से बचने के लिए नई प्रॉपर्टी में निवेश के लिए दो से तीन साल का समय मिल जाता है। ऐसे में एक परेशानी है। किसी भी वित्त वर्ष में टैक्स रिटर्न की आखिरी तारीख 31 जुलाई है। ऐसे में यदि डील टैक्स रिटर्न की आखिरी तारीख से पहले नहीं हुई तो क्या होगा। ऐसे में करदाता को नए मकान के लिए रखी रकम को एक स्पेशल डिपॉजिट में रखना होता है जिसे कैपिटल गेन्स डिपॉजिट अकाउंट स्कीम (सी-डिपॉजिट) कहा जाता है। आमतौर पर यह सुविधा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देते हैं।
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